पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- हालिया रिपोर्टों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2024-25 में 29,500 कंपनियों ने 72,000 परियोजनाओं को समर्थन देते हुए कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के अंतर्गत 40,794 करोड़ रुपये व्यय किए।
- महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और दिल्ली को संयुक्त रूप से 20,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि प्राप्त हुई।
कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) क्या है?
- कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व से आशय कंपनियों के उस दायित्व से है, जिसके अंतर्गत वे लाभ अर्जित करने के अतिरिक्त सामाजिक एवं पर्यावरणीय विकास में योगदान देती हैं।
- कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 135 के अनुसार, निर्धारित तीन मानदंडों में से किसी एक को पूरा करने वाली कंपनियों के लिए CSR पर व्यय करना अनिवार्य है। ये मानदंड हैं:
- शुद्ध संपत्ति कम-से-कम 500 करोड़ रुपये।
- वार्षिक कारोबार कम-से-कम 1,000 करोड़ रुपये।
- शुद्ध लाभ कम-से-कम 5 करोड़ रुपये।
- ऐसी कंपनियों को विगत तीन वित्तीय वर्षों के औसत शुद्ध लाभ का 2% CSR गतिविधियों पर व्यय करना होता है।
- इन गतिविधियों का उल्लेख अधिनियम की अनुसूची VII में किया गया है। इनमें शिक्षा, स्वास्थ्य, भूख उन्मूलन, ग्रामीण विकास, पर्यावरण संरक्षण और कौशल विकास शामिल हैं।
- भारत उन कुछ देशों में शामिल है, जहाँ कंपनियों के लिए सामाजिक उत्तरदायित्व के अंतर्गत अनिवार्य व्यय का प्रावधान है।
CSR का महत्त्व
- विकास के लिए अतिरिक्त पूँजी: CSR सार्वजनिक व्यय को बढ़ाने में सहायता करता है, विशेषकर उन सामाजिक क्षेत्रों में जहाँ सरकारी वित्तीय संसाधन सीमित हैं। यह सरकारी व्यय का पूरक है, उसका विकल्प नहीं।
- विकास में निजी क्षेत्र की भागीदारी: यह लाभ अर्जित करने की प्रक्रिया को सामाजिक उद्देश्य से जोड़ता है तथा कंपनियों के प्रति समाज के विश्वास और उनकी सामाजिक स्वीकार्यता को सुदृढ़ करता है।
- सतत विकास लक्ष्यों के अनुरूप: स्वास्थ्य, शिक्षा और आजीविका पर किया गया व्यय सतत विकास लक्ष्यों 3, 4 और 8 की प्राप्ति में सहायता करता है।
- नवाचार को प्रोत्साहन: हजारों परियोजनाओं के माध्यम से स्थानीय समस्याओं के समाधान का परीक्षण किया जा सकता है। सफल समाधानों को सरकार द्वारा व्यापक स्तर पर लागू किया जा सकता है।
- सहयोग की संभावनाएँ: वर्तमान कानून कंपनियों को वित्तीय संसाधनों और प्रयासों को एकत्रित करने की अनुमति देता है। इससे जिला स्तर पर व्यापक परिवर्तन लाने में सहायता मिल सकती है।
प्रमुख चिंताएँ
- क्षेत्रीय असमानता: CSR निधि का आवंटन प्रायः कंपनियों के भौगोलिक स्थान पर निर्भर करता है, न कि विकास की वास्तविक आवश्यकता पर। परिणामस्वरूप, आकांक्षी जिले और पूर्वोत्तर क्षेत्र पर्याप्त वित्तीय सहायता से वंचित रह जाते हैं।
- परियोजनाओं का विखंडन: छोटी और अलग-अलग संचालित परियोजनाएँ उपयोगी परिणाम तो देती हैं, लेकिन व्यापक व्यवस्थागत परिवर्तन लाने में प्रायः असफल रहती हैं।
- उदाहरण के लिए, यदि दस कंपनियाँ अलग-अलग उद्देश्यों वाली परियोजनाओं पर 10-10 करोड़ रुपये व्यय करती हैं, तो उनका सामूहिक प्रभाव एक ही उद्देश्य के लिए एकत्रित 100 करोड़ रुपये के सुव्यवस्थित निवेश से कम हो सकता है।
- निवेश-आधारित जवाबदेही: परिणामों को मापने वाले संकेतक कमजोर हैं और उनके लिए एक समान मानक उपलब्ध नहीं हैं। प्रतिवेदनों में इस बात पर अधिक ध्यान दिया जाता है कि कितना धन व्यय हुआ, न कि उससे क्या परिवर्तन आया।
- विशेषज्ञता और निवेश के बीच असंगति: कंपनियाँ कई बार ऐसे क्षेत्रों में धन लगाती हैं, जो उनकी विशेषज्ञता से संबंधित नहीं होते। इससे उनके ज्ञान, अनुभव और संपर्क तंत्र का पूरा उपयोग नहीं हो पाता।
- उदाहरण के लिए, खाद्य या कृषि क्षेत्र की कोई कंपनी सामान्य शिक्षा परियोजना की तुलना में किसानों की उत्पादकता बढ़ाने वाली परियोजना में अधिक योगदान दे सकती है।
- केवल अनुपालन पर ध्यान: अनिवार्य 2% व्यय की व्यवस्था कंपनियों को केवल कानूनी औपचारिकताएँ पूरी करने के लिए प्रेरित कर सकती है, जिससे वास्तविक परिणामों की तुलना में निर्धारित लक्ष्य पूरा करने को अधिक महत्त्व मिलने लगता है।
आगे की राह
- परिणाम-आधारित ढाँचा: उदाहरण के लिए, कंपनियों को केवल निर्मित 50 कक्षाओं की संख्या बताने के बजाय विद्यार्थियों के सीखने के स्तर में हुए सुधार की जानकारी देनी चाहिए। बड़ी परियोजनाओं के लिए प्रभाव आकलन अनिवार्य किया जाना चाहिए।
- संयुक्त वित्तपोषण: जिला परिवर्तन जैसे व्यापक उद्देश्यों के लिए समान विषयों और भौगोलिक क्षेत्रों पर केंद्रित कंपनियों के समूहों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
- क्षेत्रीय संतुलन स्थापित करना: प्रोत्साहनों या राष्ट्रीय CSR मंच के माध्यम से आकांक्षी जिलों और पूर्वोत्तर क्षेत्र की ओर अधिक वित्तीय संसाधन निर्देशित किए जाने चाहिए। इससे महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और दिल्ली में निधि के संकेंद्रण को कम किया जा सकेगा।
- कंपनियों की विशेषज्ञता के अनुरूप निवेश: कंपनियों को वित्तीय योगदान के साथ अपने ज्ञान, संपर्क तंत्र और प्रबंधकीय क्षमताओं का भी उपयोग करना चाहिए।
- सरकारी योजनाओं के साथ समन्वय: संसाधनों के दोहराव और अनावश्यक व्यय को रोकने के लिए CSR गतिविधियों को प्रमुख सरकारी मिशनों तथा जिला विकास योजनाओं के अनुरूप बनाया जाना चाहिए।
- कार्यान्वयन तंत्र को सुदृढ़ करना: गैर-सरकारी संगठनों की निगरानी एवं मूल्यांकन संबंधी क्षमताओं को विकसित किया जाना चाहिए। साथ ही, परियोजनाओं और उनके परिणामों से संबंधित आँकड़ों को पारदर्शी एवं सार्वजनिक बनाया जाना चाहिए, ताकि विभिन्न क्षेत्रों में प्राप्त अनुभवों और सफल कार्यप्रणालियों को साझा किया जा सके।
स्रोत: IE
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संक्षिप्त समाचार 14-10-2026