पाठ्यक्रम: GS2/ शासन/सामाजिक न्याय
संदर्भ
- भारत में अधिकांश देशों की तुलना में प्रति व्यक्ति जेल में बंद लोगों की संख्या कम है। भारत में प्रति एक लाख जनसंख्या पर लगभग 41 लोग जेल में बंद हैं, फिर भी वर्ष 2022 में यहाँ के तीन-चौथाई से अधिक बंदी विचाराधीन थे।
परिचय
- जेलों में बंद कुल बंदियों में विचाराधीन बंदियों की हिस्सेदारी के मामले में भारत विश्व में चौथे स्थान पर है।
- विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के अंतर्गत समाज के कमजोर वर्गों को निःशुल्क विधिक सेवाएँ प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण की स्थापना की गई।
- हालाँकि, सीमित पहुँच, जागरूकता की कमी और विधिक सहायता की असमान गुणवत्ता के कारण अनेक विचाराधीन बंदियों को अब भी समय पर सहायता नहीं मिल पाती है।
- राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो द्वारा जारी नवीनतम जेल सांख्यिकी रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 में भारतीय जेलों की अधिभोग दर घटकर एक दशक के निम्नतम स्तर 112.7% पर पहुँच गई।
- इसके बावजूद, मुख्यतः विचाराधीन बंदियों की अधिक संख्या के कारण भारतीय जेलों में अत्यधिक भीड़ की समस्या बनी हुई है।
प्रमुख बिंदु
- जेलों में अत्यधिक भीड़: वर्ष 2024 के अंत तक भारत में लगभग 1,333 जेलें थीं, जिनकी स्वीकृत क्षमता 4.53 लाख बंदियों की थी।
- हालाँकि, जेलों में 5.11 लाख से अधिक बंदियों की उपस्थिति के कारण वहाँ अत्यधिक भीड़ बनी रही।
- राज्यों में अधिभोग दर: वर्ष 2024 में आधे से अधिक राज्यों की जेलों की अधिभोग दर 100% से अधिक थी। दिल्ली में देश की सर्वाधिक अधिभोग दर 194% दर्ज की गई।
- किसी जेल की अधिभोग दर से आशय उसकी प्रति 100 बंदियों की स्वीकृत क्षमता की तुलना में वहाँ वास्तव में बंद व्यक्तियों की संख्या से है। यदि यह दर 100% से अधिक हो, तो जेल को क्षमता से अधिक भरी हुई माना जाता है।
- विचाराधीन बंदियों की अधिक संख्या: जेलों में अत्यधिक भीड़ का प्रमुख कारण विचाराधीन बंदियों की असमान रूप से अधिक हिस्सेदारी है। वर्ष 2024 में कुल बंदियों में इनकी हिस्सेदारी लगभग 73% थी।
- दिल्ली और बिहार में जेलों के 87% से अधिक बंदी विचाराधीन थे। इस प्रकार, इन दोनों राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में विचाराधीन बंदियों की हिस्सेदारी सर्वाधिक थी।
भारत में जेलों में बढ़ती भीड़ के प्रमुख कारण
- न्यायिक प्रक्रिया में विलंब: आपराधिक मामलों के बड़ी संख्या में लंबित रहने के कारण विचाराधीन बंदियों को लंबे समय तक कारावास में रहना पड़ता है।
- अपराधों का अत्यधिक अपराधीकरण: छोटे अपराधों के लिए भी कारावास का अत्यधिक उपयोग जेलों में भीड़ बढ़ाता है।
- जमानत संबंधी चुनौतियाँ: आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लोग धन की कमी के कारण जमानत प्राप्त करने में असमर्थ रहते हैं। जागरूकता की कमी और अपर्याप्त विधिक सहायता भी उनकी हिरासत की अवधि बढ़ाती है।
- अपर्याप्त जेल अवसंरचना: जेलों की क्षमता बढ़ाने की गति बंदियों की बढ़ती संख्या के अनुरूप नहीं रही है।
प्रमुख चिंताएँ
- मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति में बाधा: अत्यधिक भीड़ के कारण जेल प्रशासन बंदियों को स्वास्थ्य देखभाल, भोजन और आवास जैसी मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध कराने में कठिनाई का सामना करता है।
- मौलिक अधिकारों का उल्लंघन: इससे बंदियों के पर्याप्त जीवन स्तर तथा शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के उच्चतम संभव स्तर का अधिकार भी प्रभावित होता है।
- सुरक्षा एवं स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ: अत्यधिक भीड़ न केवल सुरक्षा संबंधी समस्याएँ उत्पन्न करती है, बल्कि आवश्यक सेवाओं पर भी गंभीर दबाव डालती है। इससे स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ते हैं तथा बंदियों के सुधार और पुनर्वास कार्यक्रम बाधित होते हैं।
- प्रशासनिक समस्याएँ: अत्यधिक भीड़ वाली जेलों में आदतन गंभीर अपराध करने वाले बंदियों को कम गंभीर अपराधों के बंदियों से अलग रखना कठिन हो जाता है।
- अंतरराष्ट्रीय मानकों का उल्लंघन: जेलों में अत्यधिक भीड़ के कारण बंदियों को ऐसी परिस्थितियों में रखा जाता है, जो संयुक्त राष्ट्र के बंदियों के साथ व्यवहार के लिए मानक न्यूनतम नियमों के अनुरूप नहीं हैं। भारत इन नियमों के प्रति प्रतिबद्ध है।
जेल सुधारों से संबंधित समितियाँ
- न्यायमूर्ति ए.एन. मुल्ला समिति: औपचारिक रूप से अखिल भारतीय जेल सुधार समिति (1980-83) के रूप में जानी जाने वाली इस समिति ने विचाराधीन बंदियों को दोषसिद्ध बंदियों से अलग रखने तथा जेलों की परिस्थितियों, पोषण और स्वच्छता में सुधार की सिफारिश की।
- न्यायमूर्ति अमिताव राय समिति: इस समिति ने जेलों में भीड़ कम करने, त्वरित सुनवाई, विधिक सहायता में सुधार और जेल प्रबंधन में प्रौद्योगिकी के उपयोग की सिफारिश की।
- कृष्णा अय्यर समिति: इस समिति ने महिलाओं के शोषण को रोकने के लिए महिला बंदियों हेतु पृथक जेल सुविधाओं का समर्थन किया।
न्यायिक हस्तक्षेप
- हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य: सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि त्वरित सुनवाई का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मौलिक अधिकार है।
- राजस्थान राज्य बनाम बलचंद: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने यह मूलभूत विधिक सिद्धांत स्थापित किया कि “जमानत नियम है और जेल अपवाद”। इस सिद्धांत के माध्यम से व्यक्तिगत स्वतंत्रता से संबंधित अनुच्छेद 21 को सुदृढ़ किया गया।
सरकारी पहल
- आदर्श जेल एवं सुधारात्मक सेवाएँ अधिनियम, 2023: गृह मंत्रालय ने वर्ष 2023 में आदर्श जेल एवं सुधारात्मक सेवाएँ अधिनियम तैयार किया।
- इस आदर्श अधिनियम में बंदियों के सुधार, पुनर्वास और समाज में पुनः एकीकरण के लिए उपयुक्त प्रावधान किए गए हैं।
- इसमें संस्थागत देखभाल के अभिन्न अंग के रूप में ‘बंदियों के कल्याण कार्यक्रम’ तथा ‘रिहाई के बाद देखभाल एवं पुनर्वास सेवाओं’ का भी प्रावधान है।
- विचाराधीन बंदी समीक्षा समितियाँ (UTRCs): सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद प्रत्येक जिले में इन समितियों की स्थापना की गई है।
- ये समितियाँ समय-समय पर उन विचाराधीन बंदियों के मामलों की समीक्षा करती हैं, जो जमानत या निजी मुचलके पर रिहाई के पात्र हैं। इससे लंबे समय तक हिरासत और जेलों में भीड़ कम करने में सहायता मिलती है।
- ई-जेल परियोजना: यह राष्ट्रीय ई-शासन योजना के अंतर्गत एक मिशन आधारित परियोजना है।
- इसके माध्यम से जेल अभिलेखों का डिजिटलीकरण किया जाता है तथा जेलों को न्यायालयों, पुलिस और विधिक सेवा प्राधिकरणों से जोड़ा जाता है।
- इससे जमानत, पैरोल और रिहाई संबंधी आदेशों के शीघ्र निपटान में सहायता मिलती है तथा विलंब कम होता है।
- खुली जेलें एवं खुले सुधारात्मक संस्थान: इनके माध्यम से पात्र बंदियों को कम प्रतिबंधात्मक परिस्थितियों में अपनी सजा पूरी करने का अवसर दिया जाता है।
- इससे पारंपरिक जेलों पर दबाव कम होता है तथा बंदियों के पुनर्वास और सामाजिक पुनः एकीकरण को बढ़ावा मिलता है।
- विधिक सहायता एवं जमानत सुधार: राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण और राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों के माध्यम से निर्धन बंदियों को निःशुल्क विधिक सहायता प्रदान की जाती है।
- निर्धन बंदियों को सहायता योजना के अंतर्गत उन बंदियों की सहायता की जाती है, जो जमानत के लिए मुचलका प्रस्तुत करने या जुर्माना भरने में असमर्थ हैं। इससे उनकी रिहाई संभव हो पाती है।
- जेल अवसंरचना का विस्तार: अनेक राज्यों ने नई सुधारात्मक सुविधाओं के निर्माण और वर्तमान जेलों के आधुनिकीकरण के लिए परियोजनाएँ शुरू की हैं।
आगे की राह
- प्रौद्योगिकी का एकीकरण: अभिलेखों के बेहतर रखरखाव, निगरानी और पारदर्शिता के लिए डिजिटल जेल प्रबंधन प्रणालियाँ लागू की जानी चाहिए।
- न्यायालयों में सुनवाई की सुविधा बढ़ाने और विलंब कम करने के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का व्यापक उपयोग किया जाना चाहिए।
- बंदियों का सामाजिक पुनः एकीकरण: जेल प्रणालियों में व्यावसायिक प्रशिक्षण और कौशल विकास कार्यक्रमों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, ताकि रिहाई के बाद बंदियों की रोजगार प्राप्त करने की क्षमता बढ़ सके।
- विधिक सहायता को सुदृढ़ करना: बंदियों, विशेषकर विचाराधीन बंदियों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को समय पर तथा प्रभावी विधिक प्रतिनिधित्व उपलब्ध कराने के लिए विधिक सहायता तंत्र को मजबूत किया जाना चाहिए।
- कारावास के विकल्पों को बढ़ावा: छोटे अपराधों के मामलों में सामुदायिक सेवा, परिवीक्षा और कारावास से इतर दंड के अन्य विकल्पों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
- जेलों में भीड़ कम करने और बंदियों के पुनर्वास को बढ़ावा देने के लिए सभी राज्यों में खुली जेलों की व्यवस्था का विस्तार किया जाना चाहिए।
स्रोत: TH
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