ब्रिक्स को CBAM के प्रभावों का समाधान करने की आवश्यकता 

पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीयसंबंध; GS 3/जलवायु परिवर्तन

संदर्भ

  • भारत की वर्ष 2026 की ब्रिक्स अध्यक्षता ने एकतरफा जलवायु-संबद्ध व्यापार उपायों, विशेषकर यूरोपीय संघ के कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM), तथा साझा कार्बन लेखांकन मानकों की आवश्यकता पर बहस को पुनः गति प्रदान की है।

जलवायु एजेंडा और वैश्विक व्यापार के बारे में 

  • जलवायु नीति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के बीच संबंध लगातार अधिक घनिष्ठ होते जा रहे हैं।
  • पर्यावरणीय विनियमन प्रत्यक्ष रूप से बाज़ार तक पहुँच, प्रतिस्पर्धात्मकता और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को प्रभावित कर सकता है। ऐसा तब होता है, जब देश कार्बन मूल्य निर्धारण, वनों की कटाई से संबंधित नियम, स्थिरता संबंधी समुचित सावधानी की आवश्यकताएँ तथा उत्पाद-स्तरीय उत्सर्जन मानक लागू करते हैं।
  • ब्रिक्स अर्थव्यवस्थाओं के लिए, जो उत्सर्जन की तीव्रता कम करते हुए तीव्र औद्योगीकरण को आगे बढ़ा रही हैं, जलवायु और व्यापार संबंधी खंडित नियम एक विशेष चुनौती प्रस्तुत करते हैं।
  • समान लेकिन विभेदित उत्तरदायित्व और संबंधित क्षमताओं का सिद्धांत ( CBDR-RC) देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारियों तथा विकास संबंधी क्षमताओं में अंतर को मान्यता देता है।

नियम-आधारित सहयोग के लिए ब्रिक्स का जलवायु एजेंडा

  • ब्रिक्स घोषणा-पत्र (2026) में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय (UNFCCC), पेरिस समझौते, CBDR-RC, जलवायु वित्त, जैव विविधता, वनों तथा एकतरफा जलवायु उपायों के विरोध से संबंधित पारंपरिक रुख को दोहराया गया है।
  • हालाँकि, पूर्ववर्ती घोषणाओं की बातों को व्यापक रूप से दोहराने से ठोस कार्यान्वयन योग्य परिणामों पर ध्यान कम होने का जोखिम है।
  • घोषणा-पत्र पारंपरिक ज्ञान, स्वदेशी एवं स्थानीय प्रथाओं तथा सामुदायिक अनुभव को मान्यता देता है। इसमें जन-केंद्रित और समुदाय-आधारित अनुकूलन पर बल दिया गया है। यह भारत, ब्राज़ील और चीन जैसे देशों के लिए एक महत्त्वपूर्ण दृष्टिकोण है, जहाँ पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान अब भी महत्त्वपूर्ण है।
  • ब्रिक्स घोषणाओं से आगे बढ़कर साझा कार्यप्रणालियों, पारस्परिक मान्यता और तकनीकी सहयोग को प्रोत्साहित करके इस दिशा में प्रगति कर सकता है।

एकतरफा जलवायु उपाय और संरक्षणवाद: यूरोपीय संघ एवं ब्रिक्स

  • ब्रिक्स ने ऐसे एकतरफा जलवायु-संबंधी व्यापार उपायों पर आपत्ति व्यक्त की है, जो भेदभावपूर्ण या संरक्षणवादी बन सकते हैं।
  • रियो घोषणा-पत्र (2025) में वनों की कटाई संबंधी विनियमन, समुचित सावधानी की आवश्यकताओं, करों और अन्य एकतरफा उपायों से जुड़ी चिंताओं को विशेष रूप से रेखांकित किया गया था।
  • यूरोपीय संघ का वनों की कटाई संबंधी विनियमन (EUDR) तथा स्थिरता संबंधी समुचित सावधानी की आवश्यकताएँ इस प्रवृत्ति को दर्शाती हैं, जिसके अंतर्गत पर्यावरणीय अनुपालन को आपूर्ति शृंखलाओं में गहराई तक शामिल किया जा रहा है।
  • निर्यातकों के लिए इससे उत्पादों की उत्पत्ति एवं आपूर्ति शृंखला का पता लगाने की क्षमता (Traceability), दस्तावेज़ीकरण, सत्यापन और उत्सर्जन संबंधी आँकड़े उपलब्ध कराने की आवश्यकताएँ बढ़ जाती हैं।
  • मुख्य चुनौती वैध जलवायु कार्रवाई और उन उपायों के बीच अंतर करना है, जो विकासशील देशों के उत्पादकों पर असंगत रूप से अधिक लागत का भार डालते हैं।

कार्बन लेखांकन क्यों महत्त्वपूर्ण है?

  • कार्बन लेखांकन, ब्रिक्स के जलवायु-व्यापार एजेंडे की एक प्रमुख अनुपस्थित कड़ी है।
  • रियो घोषणा-पत्र (2025) में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के आकलन के लिए पारस्परिक रूप से मान्यता प्राप्त कार्यप्रणालियों और मानकों का प्रस्ताव रखा गया था। इसमें उत्पादों तथा उत्पादन सुविधाओं के कार्बन पदचिह्न के लिए निष्पक्ष, समावेशी और पारदर्शी कार्बन लेखांकन के सिद्धांतों का भी स्वागत किया गया था।
  • यह इसलिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि अलग-अलग क्षेत्राधिकारों में एक ही उत्पाद में अंतर्निहित उत्सर्जन की गणना अलग-अलग तरीकों से की जा सकती है।
  • इस प्रकार का विखंडन समान वस्तुओं के लिए अलग-अलग कार्बन मूल्य निर्धारित होने का कारण बन सकता है, जिससे निर्यातकों के लिए अनिश्चितता और अनुपालन लागत बढ़ जाती है।
  • ब्रिक्स का एक साझा ढाँचा निम्नलिखित के लिए तुलनीय नियम निर्धारित कर सकता है:
    • प्रणाली की सीमाएँ और उत्सर्जन के दायरे;
    • प्रारंभिक उत्पादन प्रक्रियाओं से संबंधित उत्सर्जन अथवा उत्पाद में अंतर्निहित उत्सर्जन का आकलन;
    • सत्यापन और प्रमाणन;
    • अनुपलब्ध या अपूर्ण आँकड़ों का प्रबंधन; तथा
    • कार्यप्रणालियों की पारस्परिक मान्यता।

उत्सर्जन सीमा एवं व्यापार प्रणाली: एक ही व्यवस्था सभी के लिए उपयुक्त नहीं 

  • पारंपरिक उत्सर्जन सीमा एवं व्यापार प्रणालियाँ विकसित अर्थव्यवस्थाओं में उत्सर्जन भत्तों की सीमित उपलब्धता को ध्यान में रखकर विकसित की गई थीं। इन्हें विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में सीधे लागू नहीं किया जा सकता, क्योंकि इन देशों के सामने उत्पादन बढ़ाने और उत्सर्जन की तीव्रता कम करने की चुनौतियाँ एक साथ विद्यमान हैं।
  • भारत की कार्बन क्रेडिट व्यापार योजना (CCTS) उत्सर्जन की तीव्रता पर केंद्रित एक वैकल्पिक दृष्टिकोण का उदाहरण प्रस्तुत करती है।
  • पात्र घरेलू कार्बन मूल्य निर्धारण व्यवस्थाओं को मान्यता देने से प्रक्रियाओं की अनावश्यक पुनरावृत्ति कम हो सकती है। हालाँकि, निर्यातकों को अब भी उत्सर्जन संबंधी आँकड़े, प्रणाली की सीमाएँ और स्वतंत्र सत्यापन प्रस्तुत करना आवश्यक होगा।
  • इसलिए, जलवायु सहयोग में समान नीतिगत संरचनाएँ थोपने के बजाय समतुल्य परिणामों को मान्यता दी जानी चाहिए।

CBAM और भारत के निर्यात की चुनौती

  • यूरोपीय संघ का कार्बन सीमा समायोजन तंत्र ( CBAM) जनवरी 2026 में अपने निर्णायक चरण में प्रवेश कर गया।
  • प्रारंभिक रूप से इसके दायरे में लोहा एवं इस्पात, एल्युमीनियम, सीमेंट, उर्वरक, विद्युत और हाइड्रोजन जैसे क्षेत्र शामिल हैं। यह आयात संबंधी दायित्वों को उत्पादों में अंतर्निहित उत्सर्जन से जोड़ता है।
  • भारतीय निर्यातकों के लिए चिंता का विषय केवल कार्बन मूल्य नहीं, बल्कि उससे जुड़ी अनुपालन व्यवस्था भी है।
  • छोटी कंपनियों को उत्सर्जन की निगरानी, रिपोर्टिंग और तृतीय-पक्ष सत्यापन पर पर्याप्त लागत वहन करनी पड़ सकती है।
  • CBAM के अंतर्गत शामिल उत्पादों के दायरे में प्रस्तावित विस्तार से भारतीय निर्यात पर प्रभाव और बढ़ सकता है, विशेषकर इस्पात एवं एल्युमीनियम के क्षेत्र में।
  • इसलिए, भारत को अपनी घरेलू कार्बन बाज़ार संबंधी क्षमता विकसित करने के साथ-साथ अपनी कार्यप्रणालियों की मान्यता के लिए अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं में भी सक्रिय भूमिका निभाने की आवश्यकता है।

ब्रिक्स के लिए आगे की राह

  • ब्रिक्स को COP31 और अन्य बहुपक्षीय मंचों का उपयोग करके खंडित जलवायु-व्यापार विनियमन के स्थान पर सहयोगात्मक विकल्प विकसित करना चाहिए।
  • क्षेत्र-विशेष के आधार पर ब्रिक्स के कार्बन लेखांकन सिद्धांतों को कार्यान्वित किया जाना चाहिए।
  • उत्सर्जन संबंधी आँकड़ों और सत्यापन प्रणालियों की पारस्परिक मान्यता स्थापित की जानी चाहिए।
  • विभिन्न कार्बन मूल्य निर्धारण व्यवस्थाओं के बीच समतुल्यता निर्धारित करने के लिए ढाँचे विकसित किए जाने चाहिए।
  • सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) तथा विकासशील देशों के निर्यातकों के लिए तकनीकी सहायता उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
  • यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि जलवायु-व्यापार उपाय पेरिस समझौते के सिद्धांतों, CBDR-RC और विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों के अनुरूप हों।
  • अनुकूलन संबंधी सहयोग को पारंपरिक ज्ञान और समुदाय-आधारित प्रथाओं से जोड़ा जाना चाहिए।

निष्कर्ष 

  • ब्रिक्स के सामने दो विकल्प हैं—वह एकतरफा जलवायु उपायों का बार-बार विरोध करने वाले मंच के रूप में बना रहे अथवा वैश्विक दक्षिण के लिए नियम-निर्माण करने वाले गठबंधन के रूप में उभरे।
  • एक विश्वसनीय, पारदर्शी और पारस्परिक रूप से मान्यता प्राप्त कार्बन लेखांकन ढाँचा ब्रिक्स को जलवायु संबंधी महत्त्वाकांक्षाओं तथा विकास, प्रतिस्पर्धात्मकता और अधिक न्यायसंगत वैश्विक व्यापार व्यवस्था के बीच संतुलन स्थापित करने में सक्षम बना सकता है।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न]: ब्रिक्स को एकतरफा जलवायु उपायों का विरोध करने से आगे बढ़कर यूरोपीय संघ के कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM) के प्रभावों से निपटने के लिए विश्वसनीय एवं सहयोगात्मक विकल्प विकसित करने की आवश्यकता है। चर्चा कीजिए। 

स्रोत: BL

 

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