रसायन विज्ञान में 2026 का नोबेल पुरस्कार: कायरैलिटी और होमोकायरैलिटी 

पाठ्यक्रम: GS3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

संदर्भ

  • रसायन विज्ञान में वर्ष 2026 के नोबेल पुरस्कार ने कायरैलिटी (Chirality) और होमोकायरैलिटी (Homochirality) की ओर वैश्विक ध्यान आकर्षित किया है। यह इस बात को रेखांकित करता है कि किस प्रकार रासायनिक अभिक्रियाएँ किसी अणु के दर्पण-प्रतिबिंबीय रूपों में से किसी एक रूप का चयनात्मक रूप से उत्पादन कर सकती हैं।

रसायन विज्ञान में नोबेल पुरस्कार एवं वर्ष 2026 के सम्मानित वैज्ञानिकों के बारे में

  • अल्फ्रेड नोबेल की वसीयत के अंतर्गत स्थापित रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार, रसायन विज्ञान के क्षेत्र में मानवता के लिए सर्वाधिक लाभकारी खोजों अथवा सुधारों को मान्यता प्रदान करता है।
  • वर्ष 2026 में हेनरी बी. कागन (Henri B. Kagan) और केन्सो सोआई (Kenso Soai) को ऐसे कार्यों के लिए सम्मानित किया गया, जिनमें यह स्पष्ट किया गया कि रासायनिक अभिक्रियाएँ किस प्रकार किसी एक एनैन्टियोमर का उसके दर्पण-प्रतिबिंबीय रूप की तुलना में अधिक उत्पादन कर सकती हैं तथा उसकी मात्रा में वृद्धि कर सकती हैं।
  • उनका कार्य मूलभूत त्रिविम रसायन को जीवन की रसायनिकी से जोड़ता है। इसके औषधि निर्माण, कृषि, स्वाद तथा सुगंध उद्योगों में महत्त्वपूर्ण अनुप्रयोग हैं।

कायरैलिटी 

  • कायरैलिटी किसी वस्तु अथवा अणु का वह गुण है, जिसके कारण उसे उसके दर्पण-प्रतिबिंब पर पूर्णतः अध्यारोपित नहीं किया जा सकता। इसे बाएँ और दाएँ हाथों के उदाहरण से समझा जा सकता है।
    • किसी अणु के दो दर्पण-प्रतिबिंबीय रूपों को एनैन्टियोमर कहा जाता है।
  • यद्यपि एनैन्टियोमरों में समान परमाणु तथा उनके बीच समान संयोजकता होती है, फिर भी उनकी त्रिविमीय व्यवस्थाएँ भिन्न होती हैं।
  • जीवविज्ञान में यह अंतर अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि जीवित प्रणालियों में होमोकायरैलिटी पाई जाती है, अर्थात् वे सामान्यतः किसी एक एनैन्टियोमर को प्राथमिकता देती हैं।
  • उदाहरण के लिए, प्रोटीनों में मुख्यतः L-अमीनो अम्ल पाए जाते हैं, जबकि जैविक शर्कराएँ मुख्यतः D-विन्यास में उपस्थित होती हैं।
  • आणविक ‘हस्तता’ की इस विशेषता का लंबे समय तक बने रहना, जीवन की उत्पत्ति से संबंधित प्रमुख वैज्ञानिक प्रश्नों में से एक रहा है।

असममित उत्प्रेरण से एनैन्टियोचयनात्मकता तक 

  • किसी काइरल यौगिक के सामान्य संश्लेषण से प्रायः दोनों एनैन्टियोमर लगभग समान मात्रा में उत्पन्न होते हैं। इस मिश्रण को रेसमिक मिश्रण कहा जाता है।
  • 1980 के दशक में कागन ने असममित उत्प्रेरण में अरैखिक प्रभावों को प्रदर्शित किया। इसका अर्थ यह था कि यदि किसी उत्प्रेरक में एनैन्टियोमर आधिक्य अपेक्षाकृत कम हो, तो भी उससे उत्पन्न उत्पाद में एनैन्टियोमर आधिक्य असंगत रूप से अधिक हो सकता है।
  • इस प्रकार, उत्प्रेरक की कायरैलिटी और उत्पाद की चयनात्मकता के बीच संबंध आनुपातिक होने के बजाय अरैखिक पाया गया।
  • इसने आधुनिक असममित संश्लेषण की नींव रखने में योगदान दिया, जिसमें रासायनिक अभिक्रियाओं को जानबूझकर इस प्रकार अभिकल्पित किया जाता है कि वे किसी एक एनैन्टियोमर के निर्माण को प्राथमिकता दें।

सोआई अभिक्रिया: कायरैलिटी का स्व-प्रतिकृतिकरण

  • केन्सो सोआई ने असममित स्व-उत्प्रेरण के माध्यम से इस अवधारणा को और आगे बढ़ाया। स्व-उत्प्रेरक अभिक्रिया में उत्पन्न उत्पाद स्वयं ही अधिक उत्पादों के निर्माण को प्रोत्साहित करता है।
  • सोआई अभिक्रिया में कायरैलिटी का प्रारंभिक असंतुलन बढ़ सकता है, क्योंकि उत्पन्न काइरल उत्पाद अपने ही निर्माण के लिए असममित उत्प्रेरक के रूप में कार्य करता है।
    • इस प्रक्रिया से आणविक हस्तता के स्व-प्रतिकृतिकरण का एक रूप उत्पन्न होता है।
  • इस अभिक्रिया के माध्यम से अत्यंत उच्च एनैन्टियोमर आधिक्य प्राप्त किया जा सकता है। इससे यह प्रदर्शित होता है कि जैविक प्रणालियों के बाहर भी कायरैलिटी का प्रभावशाली प्रवर्धन संभव है।

जीवन की उत्पत्ति के संदर्भ में महत्त्व 

  • कागन और सोआई का कार्य जीवन की उत्पत्ति से जुड़ी समस्या का पूर्ण समाधान प्रस्तुत नहीं करता। हालाँकि, यह अवश्य प्रदर्शित करता है कि होमोकायरैलिटी केवल जैविक प्रणालियों तक सीमित नहीं है।
  • उनके निष्कर्ष एक संभावित रासायनिक तंत्र की ओर संकेत करते हैं, जिसके माध्यम से प्रारंभिक अवस्था में विद्यमान अत्यंत सूक्ष्म असममिति को प्रवर्धित करके किसी एक आणविक हस्तता को प्रमुख बनाया जा सकता है।
  • यह अवधारणा अजैविक परिस्थितियों में होने वाली पूर्व-जैविक रसायनिकी तथा जैविक होमोकायरैलिटी के उद्भव से संबंधित सिद्धांतों को समझने में महत्त्वपूर्ण अंतर्दृष्टि प्रदान करती है।

औषधीय एवं औद्योगिक अनुप्रयोग 

  • औषधि निर्माण में कायरैलिटी का अत्यधिक महत्त्व है, क्योंकि विभिन्न एनैन्टियोमर जैविक ग्राहियों के साथ अलग-अलग प्रकार से अंतःक्रिया कर सकते हैं।
    • इनमें से एक एनैन्टियोमर चिकित्सीय दृष्टि से उपयोगी हो सकता है, जबकि दूसरा कम प्रभावी अथवा हानिकारक भी हो सकता है।
  • पूर्व में निर्माता प्रायः रेसमिक मिश्रणों का उत्पादन करते थे और उसके बाद वांछित एनैन्टियोमर को अलग करते थे। इस प्रक्रिया से लागत, अपशिष्ट तथा तकनीकी जटिलताओं में वृद्धि होती थी।
  • असममित संश्लेषण के माध्यम से अभिक्रिया के चरण में ही वांछित एनैन्टियोमर का प्राथमिकता के साथ उत्पादन संभव हो जाता है।
    • इसलिए यह सिद्धांत केवल औषधियों के निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि कृषि-रसायनों, कीटनाशकों, स्वाद प्रदान करने वाले पदार्थों तथा सुगंधित यौगिकों के उत्पादन में भी उपयोगी है।

स्रोत: IE

 

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