पाठ्यक्रम: GS4/ एथिक्स
संदर्भ
- प्रधानमंत्री ने एक संस्कृत सुभाषित का उल्लेख किया, जिसके अनुसार किसी व्यक्ति के नैतिक मूल्य का निर्धारण करने में ज्ञान, वाक्पटुता और उपलब्धियों की तुलना में चरित्र और आचरण अधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं।
चरित्र और आचरण के बारे में
- चरित्र से आशय उन आंतरिक नैतिक गुणों, मूल्यों और प्रवृत्तियों से है, जो किसी व्यक्ति के निर्णयों को दिशा देते हैं। इनमें सत्यनिष्ठा, ईमानदारी, साहस, सहानुभूति, निष्पक्षता एवं आत्मानुशासन शामिल हैं। यह इस प्रश्न का उत्तर देता है—“मैं कैसा व्यक्ति हूँ?”
- आचरण से आशय वास्तविक परिस्थितियों में उन मूल्यों की अभिव्यक्ति करने वाले व्यवहार और कार्यों से है। यह इस प्रश्न का उत्तर देता है—“मैं किस प्रकार व्यवहार करता हूँ तथा कार्य करता हूँ?”
- इस प्रकार, चरित्र आंतरिक आधार है, जबकि आचरण उसकी बाह्य अभिव्यक्ति है। चरित्र आचरण को दिशा देता है और निरंतर उचित आचरण चरित्र का प्रमाण प्रस्तुत करता है।
- उदाहरण: कोई अधिकारी आंतरिक रूप से सत्यनिष्ठा को महत्त्व दे सकता है, लेकिन राजनीतिक या व्यक्तिगत दबाव के बावजूद किसी अवैध लाभ को अस्वीकार करना उसके आचरण में सत्यनिष्ठा की अभिव्यक्ति है।
नैतिक प्राधिकार के आधार के रूप में चरित्र और आचरण
- नैतिक प्राधिकार उस अधिकार से भिन्न है, जो किसी पद, कानून, धन या सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण प्राप्त होता है।
- किसी व्यक्ति के पास अपने पद के कारण औपचारिक अधिकार हो सकता है, लेकिन नैतिक प्राधिकार विश्वसनीयता, सत्यनिष्ठा, निष्पक्षता तथा कथनी और करनी के बीच सामंजस्य से अर्जित होता है।
चरित्र और आचरण के दार्शनिक आधार
- सद्गुण नैतिकता (अरस्तू): नैतिक जीवन का आधार उचित कार्यों के नियमित अभ्यास के माध्यम से सद्गुणों का विकास करना है। चरित्र आचरण को दिशा देता है और अधिकारी को उन परिस्थितियों में भी नैतिक व्यवहार करने में सक्षम बनाता है, जहाँ नियम मौन हों।
- कांटवादी नैतिकता: किसी कार्य का नैतिक मूल्य उसके परिणामों के बजाय कर्तव्यबोध और सदिच्छा से प्रेरित होकर कार्य करने में निहित होता है। इसलिए, यदि बेईमानी से व्यक्तिगत लाभ प्राप्त हो सकता हो, तब भी ईमानदारी नैतिक कर्तव्य बनी रहती है।
- भगवद्गीता और निष्काम कर्म: कर्मफल के प्रति आसक्ति त्यागकर कर्तव्य का पालन करने से लोभ, पक्षपात और स्वार्थ का प्रभाव कम होता है तथा नैतिक आचरण सुदृढ़ होता है।
- गांधीवादी नैतिकता: “चरित्र के बिना ज्ञान” और “सिद्धांतों के बिना राजनीति” जैसे विचार यह स्पष्ट करते हैं कि नैतिक आधार के बिना दक्षता या उपलब्धियाँ नैतिक वैधता से रहित होती हैं।
- कौटिल्य का अर्थशास्त्र: शासक का आत्मानुशासन और आचरण जनकल्याण से जुड़े होते हैं। इसलिए, व्यक्तिगत सत्यनिष्ठा उत्तरदायी शासन का एक अनिवार्य पक्ष है।
लोक सेवा में नैतिकता
- संस्थागत सत्यनिष्ठा: राष्ट्रीय पात्रता-सह-प्रवेश परीक्षा (NEET) से संबंधित विवाद ने यह स्पष्ट किया कि परीक्षा की निष्पक्षता केवल एक प्रशासनिक आवश्यकता नहीं, बल्कि समान अवसर सुनिश्चित करने का नैतिक आधार भी है।
- संस्थागत विश्वसनीयता: वर्ष 2025 में उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश के आवास पर कथित रूप से बेहिसाब नकदी मिलने से जुड़े विवाद ने उजागर किया कि किसी व्यक्ति का आचरण संस्थागत वैधता को सीधे प्रभावित कर सकता है।
- न्यायपालिका का प्राधिकार अंततः केवल उसकी संवैधानिक स्थिति पर ही नहीं, बल्कि न्यायिक सत्यनिष्ठा में जनता के विश्वास पर भी निर्भर करता है।
- जनहित: भारतीय अभियंत्रण सेवा के अधिकारी सत्येंद्र दुबे द्वारा राजमार्ग निर्माण में अनियमितताओं को उजागर करना नैतिक दृढ़ता का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा से ऊपर जनहित को प्राथमिकता दी।
- नेतृत्व के माध्यम से जवाबदेही: भीषण रेल दुर्घटना के बाद रेल मंत्री के पद से लाल बहादुर शास्त्री का त्यागपत्र देना मंत्रिस्तरीय जवाबदेही का उदाहरण है। यह दर्शाता है कि सार्वजनिक पद व्यक्तिगत दोष सिद्ध होने के प्रश्न से आगे बढ़कर उत्तरदायित्व का निर्वहन करने की अपेक्षा करता है।
समकालीन संदर्भ में चरित्र और आचरण की प्रासंगिकता
- संस्थागत विश्वास में गिरावट: भ्रष्टाचार और अधिकारों के दुरुपयोग की बार-बार होने वाली घटनाएँ दर्शाती हैं कि संस्थाओं की वैधता तीव्रता से उत्तरदायित्वपूर्ण पदों पर आसीन व्यक्तियों की सत्यनिष्ठा और व्यवहार पर निर्भर होती जा रही है।
- सार्वजनिक निर्णय-निर्माण की जटिलता: आधुनिक शासन प्रतिस्पर्धी हितों, प्रौद्योगिकी से जुड़े जोखिमों और ऐसी परिस्थितियों का जटिल क्षेत्र है, जहाँ नियम स्पष्ट उत्तर नहीं देते। चरित्र केवल नियमों के पालन तक सीमित रहने के बजाय नैतिक निर्णय लेने में सहायता करता है।
- डिजिटल शासन: कृत्रिम बुद्धिमत्ता, विशाल आँकड़ा-संग्रह और डिजिटल मंचों ने संगठनों की क्षमताओं को बढ़ाया है।
- इनका उत्तरदायी उपयोग सुनिश्चित करने के लिए केवल तकनीकी दक्षता पर्याप्त नहीं है। इसके लिए नैतिक विवेक, जवाबदेही तथा निजता और न्याय के प्रति सम्मान भी आवश्यक हैं।
- नियम-पालन से आगे नैतिक शासन की ओर: वर्तमान प्रशासन में स्थापित प्रक्रियाओं का पालन करने से अधिक अपेक्षित है। जब नियम अस्पष्ट, परस्पर असंगत या अपर्याप्त हों, तब चरित्र आंतरिक नैतिक दिशा-सूचक का कार्य करता है।
आगे की राह
- सिविल सेवा प्रशिक्षण में वास्तविक प्रशासनिक चुनौतियों को शामिल किया जाना चाहिए, ताकि नैतिक जागरूकता, नैतिक साहस और नैतिक तर्कशक्ति का विकास हो सके।
- सेवा में पदोन्नति और व्यावसायिक प्रगति में दक्षता तथा प्रमाणित उपलब्धियों के साथ-साथ नैतिक आचरण को भी समान महत्त्व दिया जाना चाहिए।
- व्यक्तिगत सत्यनिष्ठा को सामाजिक अंकेक्षण, सत्यनिष्ठा सुनिश्चित करने वाली प्रक्रियाओं, खुले आँकड़ों और पारदर्शी निर्णय-निर्माण जैसे संस्थागत उपायों के माध्यम से सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
स्रोत: PIB