पाठ्यक्रम: GS3/कृषि
संदर्भ
- भारत में शाकनाशी-सहिष्णु बीटी (HTBt) कपास की खेती को अभी तक स्वीकृति प्रदान नहीं की गई है, फिर भी ऐसा प्रतीत होता है कि किसान बड़े पैमाने पर इसे अपना रहे हैं।
परिचय
- साउथ एशिया बायोटेक्नोलॉजी सेंटर (SABC) द्वारा फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (FSII) तथा नेशनल सीड एसोसिएशन ऑफ इंडिया (NSAI) के सहयोग से एक नया क्षेत्रीय अध्ययन किया गया।
- इस अध्ययन के अनुमान के अनुसार, वर्ष 2025-26 के खरीफ मौसम के दौरान लगभग 65–72 लाख एकड़ भूमि पर अनधिकृत कपास की खेती की गई, जो भारत के कुल कपास क्षेत्र का लगभग 24–30 प्रतिशत है।
भारत में बीटी कपास की शुरुआत
- वर्ष 2002 में सरकार ने आनुवंशिक अभियांत्रिकी मूल्यांकन समिति (GEAC) की मंजूरी के बाद बीटी कपास की व्यावसायिक खेती को स्वीकृति प्रदान की।
- प्रारंभ में cry1Ac जीन युक्त बीटी संकर किस्मों को कपास में बॉलवर्म की विभिन्न प्रजातियों से सुरक्षा प्रदान करने के लिए स्वीकृति दी गई।
- वर्ष 2006 तक GEAC ने बोलगार्ड-II को स्वकृति दे दी थी। यह दूसरी पीढ़ी की संकर किस्म थी, जिसमें दो जीनों को एक साथ समाविष्ट किया गया था।
बीटी कपास
- बीटी कपास में मृदा जीवाणु बैसिलस थुरिंगिएंसिस (Bt) के दो बाह्य जीन समाविष्ट किए जाते हैं, जो फसल को ऐसा प्रोटीन उत्पन्न करने में सक्षम बनाते हैं, जो सामान्यतः कपास पर आक्रमण करने वाले गुलाबी सुंडी नामक प्रमुख कीट के लिए विषैला होता है।
- अब तक भारत में व्यावसायिक खेती के लिए स्वीकृत यह एकमात्र आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) फसल है।
शाकनाशी-सहिष्णु बीटी कपास (HTBt Cotton)
- HTBt कपास, बीटी कपास का ऐसा रूप है, जिसमें शाकनाशी-सहिष्णुता का अतिरिक्त गुण शामिल किया जाता है। इससे किसानों को खरपतवार नियंत्रण के लिए ग्लाइफोसेट का उपयोग करने की सुविधा मिलती है।
- मूलतः HTBt कपास, बीटी कपास में एक अतिरिक्त गुण अर्थात् शाकनाशी-सहिष्णुता जोड़ता है।
- भारत में HTBt कपास की व्यावसायिक खेती को स्वीकृति प्राप्त नहीं है। हालाँकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी व्यापक वैज्ञानिक निष्कर्ष ने इस तकनीक को स्वाभाविक रूप से असुरक्षित घोषित कर दिया है।
HTBt कपास के उपयोग से संबंधित चिंताएँ
- अनधिकृत खेती : एक प्रमुख चिंता गैर-स्वीकृत HTBt बीजों की अवैध खेती, बिक्री तथा वितरण है। इससे भारत के जैव-सुरक्षा नियामक ढाँचे की अनदेखी होती है और बीजों की गुणवत्ता, सुरक्षा तथा उनके स्रोत का पता लगाने की क्षमता सुनिश्चित करना कठिन हो जाता है।
- शाकनाशियों का अत्यधिक उपयोग : शाकनाशी-सहिष्णुता से खरपतवार नियंत्रण के लिए रासायनिक पदार्थों, विशेषकर ग्लाइफोसेट, पर निर्भरता बढ़ सकती है।
- शाकनाशियों के बार-बार उपयोग से शाकनाशी-प्रतिरोधी खरपतवार विकसित हो सकते हैं तथा कृषि क्षेत्रों और उनके आसपास की वनस्पति प्रभावित हो सकती है।
- जैव विविधता पर प्रभाव : व्यापक प्रभाव वाले शाकनाशी उन पौधों को भी नष्ट कर सकते हैं, जिन्हें सामान्यतः खरपतवार माना जाता है, लेकिन जो पशुओं के चारे, भोजन तथा कीटों एवं अन्य जीवों के आवास के रूप में उपयोगी हो सकते हैं।
- इससे कृषि-जैव विविधता में कमी आ सकती है तथा कृषि परिदृश्य में विभिन्न जीवों के बीच पारिस्थितिक अंतःक्रियाएँ प्रभावित हो सकती हैं।
- प्रतिरोध का विकास : किसी एक शाकनाशी अथवा बीटी-आधारित कीट नियंत्रण तकनीक पर अत्यधिक निर्भरता से चयनात्मक दबाव उत्पन्न हो सकता है। इसके परिणामस्वरूप प्रतिरोधी खरपतवारों अथवा कीटों का विकास होने की आशंका बढ़ सकती है।
प्रतिबंध के बावजूद किसान इसका उपयोग क्यों कर रहे हैं?
- कपास की खेती करने वाले अनेक किसानों के लिए HTBt तकनीक मुख्यतः खरपतवार प्रबंधन की तकनीक है।
- कृषि श्रमिकों की कमी तथा हाथों से निराई-गुड़ाई करने की बढ़ती लागत ने पारंपरिक खरपतवार नियंत्रण को लगातार महँगा बना दिया है।
- FSII और NSAI के सहयोग से किए गए नवीनतम अध्ययन के अनुसार, ग्लाइफोसेट के दो से तीन छिड़कावों पर प्रति एकड़ लगभग ₹750–850 का व्यय आता है, जबकि हाथों से निराई-गुड़ाई कराने पर प्रति एकड़ लगभग ₹12,000–15,000 व्यय हो सकते हैं।
- इसलिए किसानों के लिए इसका आकर्षण आवश्यक रूप से आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) फसल होने में नहीं, बल्कि श्रम पर निर्भरता कम करने तथा कम लागत पर खरपतवारों को नियंत्रित करने की संभावना में निहित है।
नियामक ढाँचा
- भारत के नियामक ढाँचे के अंतर्गत, आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों को पर्यावरण में छोड़े जाने के लिए पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम के अंतर्गत गठित आनुवंशिक अभियांत्रिकी मूल्यांकन समिति (GEAC) की स्वीकृति आवश्यक होती है। इस संबंध में आनुवंशिक रूप से अभियांत्रित जीवों को नियंत्रित करने वाले वर्ष 1989 के नियम भी लागू होते हैं।
- बीटी कपास भारत में व्यावसायिक खेती के लिए स्वीकृत एकमात्र GM फसल है। इसलिए, गैर-स्वीकृत आनुवंशिक रूप से संशोधित कपास की खेती, उत्पादन अथवा बिक्री अनधिकृत है।
निष्कर्ष
- इस विषय पर बहस अब धीरे-धीरे केवल ‘प्रतिबंध बनाम अनुमति’ के प्रश्न से आगे बढ़कर इस ओर केंद्रित हो रही है कि भारत पहले से उपयोग में लाई जा रही किसी तकनीक का विनियमन किस प्रकार और किन शर्तों के अंतर्गत करे।
- इसलिए, भारत के कपास क्षेत्र के समक्ष अब सबसे बड़ा प्रश्न केवल HTBt कपास की वैधानिकता तक सीमित नहीं है। वास्तविक चुनौती यह है कि क्या देश कृषि नियमन और किसानों द्वारा वास्तव में अपने खेतों में बोई जा रही फसलों के बीच बढ़ती खाई को पाटने में सक्षम होगा।
स्रोत: IE