पाठ्यक्रम: GS3/पर्यावरण/ऊर्जा
संदर्भ
- आइसलैंड भारत के विकसित होते भूतापीय ऊर्जा परिदृश्य में उभरते अवसरों को लेकर आश्वस्त है और उसका मानना है कि नियामक चुनौतियों का समाधान किया जा सकता है।
प्रमुख बिंदु
- आइसलैंड ने अपनी कार्बफिक्स (Carbfix) तकनीक के उपयोग की संभावनाओं की ओर संकेत किया, जो अवशोषित कार्बन डाइऑक्साइड को पत्थर में परिवर्तित करती है।
- आइसलैंड ‘आगामी पीढ़ी की भूतापीय ऊर्जा के उपयोग’ की दिशा में भी कार्य कर रहा है। इस तकनीक में पृथ्वी के भीतर अधिक गहराई तक ड्रिलिंग की जाती है, जिससे प्रत्येक कुएँ की उत्पादकता लगभग दस गुना तक बढ़ सकती है।
- आइसलैंड अपनी लगभग 70% विद्युत जलविद्युत से और शेष 30% भूतापीय ऊर्जा से प्राप्त करता है।
- वहीं, भारत में भूतापीय ऊर्जा की अनुमानित क्षमता लगभग 10.6 गीगावाट है।
भूतापीय ऊर्जा
- भूतापीय ऊर्जा नवीकरणीय ऊर्जा का एक प्रकार है, जो पृथ्वी के भीतर संचित ऊष्मा से प्राप्त होती है।
- यह ऊष्मा प्राकृतिक रूप से रेडियोधर्मी पदार्थों के क्षय तथा पृथ्वी के निर्माण के समय बची हुई ऊष्मा से उत्पन्न होती है।
भूतापीय ऊर्जा के दोहन के तरीके
- भूतापीय विद्युत संयंत्र: ये संयंत्र पृथ्वी की सतह के नीचे स्थित गर्म जल के भंडारों से प्राप्त भाप का उपयोग करते हैं। यह भाप विद्युत जनित्रों से जुड़ी टरबाइनों को चलाती है। इसके तीन प्रमुख प्रकार हैं:
- शुष्क भाप संयंत्र: भूतापीय भंडार से प्राप्त भाप का सीधे उपयोग करके टरबाइनों को चलाया जाता है।
- फ्लैश भाप संयंत्र: उच्च दाब वाले गर्म जल को कम दाब वाले टैंकों में लाया जाता है, जिससे भाप उत्पन्न होती है।
- द्विआधारी चक्र संयंत्र: भूतापीय गर्म जल की ऊष्मा को ऐसे दूसरे द्रव में स्थानांतरित किया जाता है जिसका क्वथनांक कम होता है। यह द्रव वाष्पीकृत होकर टरबाइन को चलाता है।
- भूतापीय ऊष्मा पंप: ये प्रणालियाँ भवनों को गर्म और शीत ठंडा रखने के लिए पृथ्वी के अपेक्षाकृत स्थिर तापमान का उपयोग करती हैं। सर्दियों में ये भूमि से ऊष्मा लेकर भवनों तक पहुँचाती हैं, जबकि गर्मियों में भवनों की ऊष्मा को वापस भूमि में स्थानांतरित करती हैं।
- प्रत्यक्ष उपयोग: भूतापीय ऊर्जा का उपयोग भवनों को गर्म रखने, हरितगृहों में पौधे उगाने, फसलों को सुखाने तथा कुछ औद्योगिक प्रक्रियाओं में सीधे किया जा सकता है।
- सीमाएँ एवं दुष्प्रभाव: भूतापीय ऊर्जा के उपयोग से कुछ पर्यावरणीय प्रभाव उत्पन्न हो सकते हैं, जैसे भूमि का धँसना और मानव गतिविधियों के कारण भूकंपीय गतिविधियों में वृद्धि होना।
- भूतापीय संसाधन प्रायः विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्रों तक सीमित होते हैं। इसलिए इनका उपयोग उन क्षेत्रों में अधिक प्रभावी होता है जहाँ भूतापीय गतिविधियाँ पर्याप्त मात्रा में होती हैं, जैसे आइसलैंड।
कार्बफिक्स
- कार्बफिक्स कार्बन अवशोषण, उपयोग एवं भंडारण की एक तकनीक है, जो कार्बन डाइऑक्साइड को खनिजीकृत करके पत्थर में परिवर्तित करती है।
- व्यावहारिक रूप से, यह प्रक्रिया अवशोषित कार्बन उत्सर्जन को भूमिगत स्थायी रूप से रोक देती है। इस प्रकार, यह अस्थायी भंडारण के बजाय दीर्घकालिक और सतत भंडारण का एक माध्यम उपलब्ध कराती है।
- यह तकनीक भारत में सीमेंट और इस्पात जैसे उद्योगों के लिए विशेष रूप से उपयोगी हो सकती है।
कार्बन अवशोषण, उपयोग एवं भंडारण (CCUS)
- कार्बन अवशोषण, उपयोग एवं भंडारण से आशय ऐसी तकनीकों के समूह से है, जिनके माध्यम से औद्योगिक प्रक्रियाओं या विद्युत संयंत्रों से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित किया जाता है। इसके बाद इस गैस का पुनः उपयोग किया जाता है या इसे सुरक्षित रूप से भूमिगत भंडारित किया जाता है। इससे वायुमंडल में जलवायु परिवर्तन को बढ़ाने वाली गैसों की मात्रा कम करने में सहायता मिलती है।
- व्यावहारिक रूप से, इस प्रक्रिया में उत्सर्जन के स्रोत पर कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करना, उसे पाइपलाइनों या अन्य माध्यमों से परिवहन करना तथा औद्योगिक उपयोग में लाना या वायुमंडल में उसके उत्सर्जन को रोकने के लिए पृथ्वी के भीतर गहराई में भंडारित करना शामिल है।

- भारत में वर्तमान स्थिति: भारत में समर्पित कार्बन अवशोषण, उपयोग एवं भंडारण तकनीकों का विकास अभी मुख्यतः अनुसंधान एवं विकास, प्रायोगिक परियोजनाओं तथा प्रदर्शन परियोजनाओं के चरण में है।
- भारत में वर्तमान कार्बन अवशोषण का संबंध विशेष रूप से यूरिया उत्पादन जैसी प्रक्रियाओं से है। इसके अतिरिक्त, इस्पात और तेल शोधन जैसे क्षेत्रों में भी प्रायोगिक परियोजनाएँ संचालित की गई हैं।
- वर्ष 2025 में ‘कार्बन अवशोषण, उपयोग एवं भंडारण के माध्यम से भारत के शुद्ध-शून्य लक्ष्यों को सक्षम बनाने हेतु प्रथम अनुसंधान एवं विकास रूपरेखा’ प्रारंभ की गई। इसमें भारत में इन तकनीकों के विकास के लिए तीन चरणों वाली अनुसंधान एवं विकास रणनीति प्रस्तुत की गई है।
- प्रथम चरण — निकट अवधि: औद्योगिक क्षेत्रों में पहले से उपलब्ध और प्रमाणित कार्बन अवशोषण एवं भंडारण तकनीकों का विस्तार करना तथा उनका व्यापक उपयोग सुनिश्चित करना।
- द्वितीय चरण — मध्यम अवधि: अगली पीढ़ी की कार्बन अवशोषण, उपयोग एवं भंडारण तकनीकों का प्रदर्शन और सत्यापन करना, ताकि उनकी कार्यक्षमता बढ़े तथा लागत कम हो।
- तृतीय चरण — दीर्घ अवधि: ऐसे नवीन विचारों और परिवर्तनकारी नवाचारों पर मौलिक अनुसंधान में निवेश करना, जो भविष्य में इन तकनीकों की क्षमताओं में व्यापक सुधार कर सकें और लागत घटा सकें।
भारत के लिए कार्बन अवशोषण, उपयोग एवं भंडारण क्यों महत्त्वपूर्ण है?
- उत्सर्जन कम करना कठिन वाले क्षेत्रों का कार्बन उत्सर्जन घटाना: इस्पात, सीमेंट, रसायन, उर्वरक और तेल शोधन उद्योगों में उत्पादन प्रक्रियाओं के दौरान पर्याप्त मात्रा में कार्बन उत्सर्जन होता है। केवल विद्युतीकरण के माध्यम से इन उत्सर्जनों को समाप्त करना कठिन है।
- वर्ष 2070 तक शुद्ध-शून्य लक्ष्य प्राप्त करने में सहायता: कार्बन अवशोषण, उपयोग एवं भंडारण तकनीकें वर्ष 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन प्राप्त करने की भारत की रणनीति में नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता और विद्युतीकरण की पूरक बन सकती हैं।
- कम कार्बन वाले उत्पादों को बढ़ावा: अवशोषित कार्बन डाइऑक्साइड का संभावित रूप से औद्योगिक कच्चे माल के रूप में उपयोग किया जा सकता है। इससे उत्सर्जन में कमी के साथ आर्थिक मूल्य भी उत्पन्न हो सकता है।
- कोयला-आधारित संक्रमण तकनीकों को समर्थन: ये तकनीकें संबंधित उत्सर्जन को कम करते हुए कम कार्बन वाले हाइड्रोजन उत्पादन और कोयला गैसीकरण को बढ़ावा देने में सहायक हो सकती हैं।
- व्यापक भंडारण क्षमता: नीति आयोग के आकलन में लवणीय जलभृतों, बेसाल्टिक चट्टानी संरचनाओं, उन्नत तेल निष्कर्षण तथा कोयले की परतों से मीथेन की उन्नत पुनर्प्राप्ति में पर्याप्त भंडारण क्षमता की पहचान की गई है।
इस सहयोग से भारत को क्या लाभ हो सकता है?
- स्वच्छ ऊर्जा के विकल्पों में विविधता: आइसलैंड के साथ यह चर्चा ऐसे समय में हो रही है, जब भारत अपने स्वच्छ ऊर्जा विकल्पों में विविधता लाने का प्रयास कर रहा है।
- सौर और पवन ऊर्जा प्रमुख क्षेत्र बने हुए हैं, लेकिन नीति-निर्माता और उद्योग जगत अब उन तकनीकों पर भी अधिक ध्यान दे रहे हैं, जो निरंतर एवं विश्वसनीय ऊर्जा आपूर्ति, औद्योगिक ताप तथा उन क्षेत्रों में उत्सर्जन में कमी सुनिश्चित कर सकती हैं जहाँ कार्बन उत्सर्जन घटाना अपेक्षाकृत कठिन है।
- यदि भारत के औद्योगिक उत्सर्जक पारंपरिक कार्बन अवशोषण और संपीड़न-आधारित मॉडलों से आगे बढ़कर दीर्घकालिक भंडारण के विकल्प तलाशते हैं, तो कार्बन के खनिजीकरण की तकनीक अधिक आकर्षक हो सकती है।
- भूतापीय ऊर्जा पूरे भारत में व्यापक स्तर पर उपयोगी समाधान नहीं बन पाएगी, लेकिन उन विशिष्ट क्षेत्रों, औद्योगिक क्षेत्रों और अनुप्रयोगों में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका हो सकती है, जहाँ भूमिगत ऊष्मा संसाधनों का उपयोग व्यावहारिक हो।
निष्कर्ष
- आइसलैंड केवल सामान्य स्वच्छ ऊर्जा सहयोग का प्रस्ताव नहीं दे रहा है, बल्कि उन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है जहाँ उसे विशिष्ट तकनीकी बढ़त प्राप्त है। इनमें भूतापीय ऊर्जा से संबंधित नियमन, अधिक गहराई तक ड्रिलिंग की विधियाँ तथा कार्बन का खनिजीकरण शामिल हैं।
- भारत के लिए अवसर इस बात पर निर्भर करेगा कि इन विशिष्ट तकनीकों को उसकी कहीं अधिक विशाल और जटिल ऊर्जा व्यवस्था के अनुरूप किस प्रकार विकसित एवं अनुकूलित किया जा सकता है।
- यदि यह सहयोग आगे बढ़ता है, तो इससे भारत की कार्बन उत्सर्जन कम करने की रणनीति को एक नया आयाम मिल सकता है। यह विशेष रूप से उन औद्योगिक क्षेत्रों के लिए महत्त्वपूर्ण होगा, जिन्हें पारंपरिक नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से आगे बढ़कर अतिरिक्त समाधानों की आवश्यकता है।
स्रोत: TH
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