पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था
संदर्भ
- सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में विधायी विशेषाधिकार और वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच टकराव से संबंधित दो दशक से अधिक पुराने विवाद का निपटारा किया।
पृष्ठभूमि
- यह मामला वर्ष 2003 में तमिलनाडु विधान सभा द्वारा पत्रकारों के विरुद्ध पारित एक प्रस्ताव से उत्पन्न हुआ था। यह प्रस्ताव राज्य सरकार और तत्कालीन मुख्यमंत्री की आलोचना करने वाली समाचार रिपोर्टों तथा एक संपादकीय के प्रकाशन के संबंध में था।
- विधान सभा ने उक्त प्रकाशन को विशेषाधिकार का उल्लंघन माना और पाँच पत्रकारों को 15 दिनों के कारावास की सजा देने का आदेश दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने गिरफ्तारी वारंट पर रोक लगा दी थी।
- इस मामले ने अनुच्छेद 194(3) के अंतर्गत विधायी विशेषाधिकार के दायरे तथा अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ उसके संबंध से जुड़े प्रश्न उठाए, विशेष रूप से तब, जब विशेषाधिकार का प्रयोग विधानमंडल के गैर-सदस्यों के विरुद्ध किया जाता है।
सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय
- न्यायालय ने मामले का निपटारा इस आधार पर कर दिया कि यह अब निष्फल हो चुका था, क्योंकि तमिलनाडु विधान सभा ने वर्ष 2004 में वर्ष 2003 के प्रस्ताव को वापस ले लिया था।
- न्यायालय ने विधायी विशेषाधिकार के दायरे तथा अनुच्छेद 19(1)(a) के साथ उसके संबंध से जुड़े व्यापक संवैधानिक प्रश्नों पर कोई निर्णय नहीं दिया।
- न्यायालय ने विधि के इन प्रश्नों को भविष्य में किसी उपयुक्त मामले में विचार किए जाने के लिए खुला रखा।
विधायी विशेषाधिकार क्या हैं?
- विधायी विशेषाधिकार: अनुच्छेद 105 संसद और उसके सदस्यों को विशेषाधिकार एवं उन्मुक्तियाँ प्रदान करता है।
- अनुच्छेद 194(3) के अनुसार, किसी राज्य के विधानमंडल और उसके सदस्यों की शक्तियों, विशेषाधिकारों एवं उन्मुक्तियों को विधानमंडल कानून द्वारा परिभाषित कर सकता है।
- इन विशेषाधिकारों का उद्देश्य विधानमंडलों और उनके सदस्यों को अनुचित बाहरी हस्तक्षेप से मुक्त रखते हुए स्वतंत्र एवं प्रभावी ढंग से कार्य करने में सक्षम बनाना है।
- इनमें विधानमंडल के अंदर दिए गए वक्तव्यों और उसकी कार्यवाही के संबंध में संरक्षण तथा सदन के अधिकार और कार्यप्रणाली की रक्षा के लिए आवश्यक शक्तियाँ शामिल हैं।
वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार
- अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार प्रदान करता है।
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(2), अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत प्रदत्त वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार पर लगाए जा सकने वाले युक्तिसंगत प्रतिबंधों से संबंधित है।
- वे आधार जिन पर राज्य द्वारा वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित किया जा सकता है:
- राज्य की सुरक्षा, लोक व्यवस्था, शिष्टता या नैतिकता, न्यायालय की अवमानना, मानहानि तथा अपराध के लिए उकसावा।
प्रमुख न्यायिक हस्तक्षेप
- एम.एस.एम. शर्मा बनाम श्री कृष्ण सिन्हा (1959), जिसे सर्चलाइट केस के नाम से भी जाना जाता है, में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 194(3) के अंतर्गत राज्य विधानमंडलों की शक्तियाँ, विशेषाधिकार और उन्मुक्तियाँ, अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार पर प्रभावी होती हैं।
- तेज किरण जैन बनाम एन. संजीव रेड्डी (1970) में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 105(2) संसद के सदस्यों को संसद की कार्यवाही के दौरान कही गई किसी बात या दिए गए किसी मत के संबंध में न्यायालयीय कार्यवाही से उन्मुक्ति प्रदान करता है, बशर्ते वह संसदीय कार्यवाही के दौरान किया गया हो।
आगे की राह
- विधायी विशेषाधिकार प्रतिनिधि संस्थाओं की स्वतंत्रता और प्रभावी कार्यप्रणाली की रक्षा के लिए आवश्यक हैं, किंतु उनका प्रयोग संविधान की मौलिक अधिकारों और लोकतांत्रिक जवाबदेही के प्रति प्रतिबद्धता के अनुरूप होना चाहिए।
- अतः अंततः न्यायिक निर्धारण में विधायी स्वायत्तता, प्रेस की स्वतंत्रता और न्यायिक समीक्षा के बीच एक सिद्धांतसम्मत संतुलन स्थापित करना आवश्यक होगा। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि विशेषाधिकार संस्थागत कार्यप्रणाली के लिए एक संवैधानिक साधन बने रहें, न कि सार्वजनिक आलोचना के विरुद्ध प्रयोग की जाने वाली असीमित शक्ति।
स्रोत: TH
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