पाठ्यक्रम: GS3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
संदर्भ
- वर्ष 2026 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार फ्रांसिस हाल्ज़ेन को आइसक्यूब न्यूट्रिनो वेधशाला में उनके अग्रणी योगदान तथा खगोलीय स्रोत से उत्पन्न उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो की खोज के लिए प्रदान किया गया है।
दक्षिणी ध्रुव पर आइसक्यूब न्यूट्रिनो वेधशाला

- अंटार्कटिका के दक्षिणी ध्रुव पर स्थित आइसक्यूब न्यूट्रिनो वेधशाला का मुख्य उद्देश्य उच्च-ऊर्जा खगोलीय न्यूट्रिनो का पता लगाना है।
- यह लगभग एक घन किलोमीटर अंटार्कटिक बर्फ में स्थापित है और इसमें 5,160 प्रकाशीय संवेदक लगे हैं, जिन्हें डिजिटल प्रकाशीय मॉड्यूल कहा जाता है।
- वेधशाला का निर्माण वर्ष 2010 में पूरा हुआ। हाल्ज़ेन ने वर्ष 1988 में प्रथम बार अंटार्कटिक बर्फ को न्यूट्रिनो संसूचक के रूप में उपयोग करने का प्रस्ताव दिया था।
- वर्ष 2013 में आइसक्यूब ने प्रथम बार उच्च-ऊर्जा ब्रह्मांडीय न्यूट्रिनो के प्रमाण प्रस्तुत किए। इनमें दो न्यूट्रिनो ऐसे थे, जिन्हें अनौपचारिक रूप से ‘बर्ट’ और ‘अर्नी’ नाम दिया गया।
- वर्ष 2018 में एक उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो के स्रोत का संबंध एक दूरस्थ ब्लेज़ार से स्थापित किया गया। ब्लेज़ार एक सक्रिय आकाशगंगा है, जिसके केंद्र में एक अतिविशाल कृष्ण विवर होता है और जिसकी सापेक्षतावादी धार पृथ्वी की दिशा में उन्मुख होती है।

आइसक्यूब कैसे कार्य करता है?
- जब कोई न्यूट्रिनो कभी-कभार बर्फ में स्थित किसी परमाणु के नाभिक से अंतःक्रिया करता है, तो एक आवेशित कण उत्पन्न होता है।
- यदि यह कण बर्फ में प्रकाश के संचरण की गति से अधिक गति से चलता है, तो वह चेरेंकोव विकिरण उत्पन्न करता है। प्रकाशीय संवेदक इसे हल्की नीली चमक के रूप में दर्ज करते हैं।
- अत्यंत स्वच्छ और स्थिर अंटार्कटिक बर्फ का विशाल आयतन न्यूट्रिनो की खोज के लिए आवश्यक अत्यधिक बड़े संसूचन माध्यम की सुविधा प्रदान करता है, क्योंकि न्यूट्रिनो की पदार्थ के साथ अंतःक्रिया अत्यंत दुर्लभ होती है।
न्यूट्रिनो क्या हैं और वे क्यों महत्वपूर्ण हैं?
- न्यूट्रिनो मूलभूत उपपरमाण्विक कण हैं, जो मानक प्रतिरूप के लेप्टॉन परिवार से संबंधित हैं।
- इसका अर्थ है कि इन्हें क्वार्क, प्रकाशकण और इलेक्ट्रॉन की तरह किसी और छोटे घटक में विभाजित नहीं किया जा सकता।
- न्यूट्रिनो सूर्य, नाभिकीय अभिक्रियाओं, अधिनवतारों, ब्रह्मांडीय किरणों की अंतःक्रियाओं तथा अन्य उच्च-ऊर्जा खगोलीय प्रक्रियाओं में उत्पन्न होते हैं।
- इन पर कोई विद्युत आवेश नहीं होता, इसलिए ये विद्युतचुंबकीय बलों से प्रभावित नहीं होते।
- न्यूट्रिनो का द्रव्यमान शून्य नहीं, बल्कि अत्यंत अल्प होता है। न्यूट्रिनो दोलन की खोज के माध्यम से इनके द्रव्यमान के अस्तित्व की पुष्टि हुई।
- ये मुख्यतः दुर्बल नाभिकीय बल और गुरुत्वाकर्षण के माध्यम से अंतःक्रिया करते हैं, जिसके कारण इनका पता लगाना अत्यंत कठिन होता है।
- न्यूट्रिनो तीन प्रकार के होते हैं, जिन्हें प्रकार कहा जाता है। ये इलेक्ट्रॉन न्यूट्रिनो, म्यूऑन न्यूट्रिनो और टाऊ न्यूट्रिनो हैं। ये तीनों प्रकारों के बीच परिवर्तित हो सकते हैं।
- यात्रा करते समय एक न्यूट्रिनो एक प्रकार से दूसरे प्रकार में परिवर्तित हो सकता है। इसे न्यूट्रिनो दोलन कहा जाता है।
- प्रत्येक सेकंड खरबों न्यूट्रिनो पृथ्वी और मानव शरीर से होकर गुजरते हैं, लेकिन उनमें से बहुत कम ही पदार्थ के साथ अंतःक्रिया करते हैं।
- आवेशित ब्रह्मांडीय किरणों के विपरीत न्यूट्रिनो चुंबकीय क्षेत्रों से विचलित नहीं होते। इसलिए वे अत्यधिक ऊर्जावान ब्रह्मांडीय घटनाओं के स्रोतों की पहचान करने में सहायता कर सकते हैं।
- चूंकि न्यूट्रिनो की अंतःक्रियाएँ अत्यंत दुर्लभ होती हैं, इसलिए आइसक्यूब जैसे संसूचकों में पानी या बर्फ के विशाल आयतन का उपयोग किया जाता है। न्यूट्रिनो की अंतःक्रिया से चेरेंकोव विकिरण उत्पन्न हो सकता है, जिसे विशिष्ट नीली चमक के रूप में देखा जाता है।
- न्यूट्रिनो कण भौतिकी, खगोल भौतिकी, ब्रह्मांड विज्ञान तथा ब्रह्मांड के अत्यंत चरम वातावरण को समझने में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं।
न्यूट्रिनो भौतिकी में भारत का योगदान
- 1950–60 के दशक: टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने कर्नाटक के कोलार स्वर्ण क्षेत्र की गहरी भूमिगत सुविधाओं का उपयोग ब्रह्मांडीय किरणों के अध्ययन के लिए किया।
- 1964–65: लगभग 2.3 किलोमीटर भूमिगत स्थापित संसूचकों ने वायुमंडलीय न्यूट्रिनो का अभिलेखन किया। लगभग इसी समय दक्षिण अफ्रीका की एक स्वर्ण खदान में किए गए एक प्रयोग में भी ऐसे न्यूट्रिनो दर्ज किए गए।
- कोलार स्वर्ण क्षेत्र के प्रयोग कई दशकों तक जारी रहे, लेकिन वर्ष 1992 में खदानों के बंद होने के बाद इन्हें समाप्त कर दिया गया।
- बाद में भारत ने तमिलनाडु के थेनी जिले के पोट्टीपुरम में भारत-आधारित न्यूट्रिनो वेधशाला स्थापित करने का प्रस्ताव रखा।
- इसके लिए प्रस्तावित 50,000 टन क्षमता वाले चुंबकीय लौह कैलोरीमीटर का उद्देश्य वायुमंडलीय न्यूट्रिनो के दोलनों तथा पृथ्वी के अंदर पदार्थ के प्रभावों का अध्ययन करना था।
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