भारत की अंतरिक्ष एवं विमानन संप्रभुता 

पाठ्यक्रम: GS3/विज्ञान और प्रौद्योगिकी

समाचार में

  • रक्षा मंत्री ने इस बात पर बल दिया कि अंतरिक्ष एवं विमानन तथा रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए अभिकल्पना, विकास, परीक्षण, विनिर्माण, सामग्री तथा रखरखाव, मरम्मत एवं जीर्णोद्धार सहित सभी क्षेत्रों में स्वदेशी विमान इंजन क्षमताओं का विकास आवश्यक है, विशेष रूप से उन्नत मध्यम लड़ाकू विमान कार्यक्रम के लिए।

भारत का अंतरिक्ष एवं विमानन तथा रक्षा क्षेत्र

  • भारत में अंतरिक्ष एवं विमानन उद्योग विकास का एक विशाल अवसर प्रस्तुत करता है और वर्ष 2029 तक भारत में रक्षा उत्पादन में ₹3 लाख करोड़ का योगदान दे सकता है।
  • बढ़ती अंतरराष्ट्रीय मांग के कारण अकेले अंतरिक्ष एवं विमानन बाजार में आगामी 20 वर्षों में अनुमानित 43,000 नए विमानों की आवश्यकता होने की संभावना है।

दृष्टिकोण एवं पहल

  • आत्मनिर्भरता पर ध्यान: विमान इंजनों में आत्मनिर्भरता भारत की पूर्ण अंतरिक्ष एवं विमानन संप्रभुता की आधारशिला है।
    • देश में स्वदेशी उच्च-प्रणोदन क्षमता वाले इंजनों, परीक्षण अवसंरचना, कच्चे माल तथा सुदृढ़ रखरखाव, मरम्मत एवं जीर्णोद्धार क्षमताओं पर कार्य चल रहा है, जिससे देश में एक मजबूत इंजन पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण हो रहा है।
  • रक्षा अधिग्रहण परिषद: यह भारत का प्रमुख रक्षा खरीद संगठन है, जो आत्मनिर्भर भारत के लिए स्वदेशी अधिग्रहण को आगे बढ़ा रहा है।
    • इसने लगभग ₹6 लाख करोड़ की लागत वाली रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन द्वारा अभिकल्पित तथा भारतीय उद्योग द्वारा निर्मित प्रणालियों के लिए आवश्यकता की स्वीकृति प्रदान की है।
  • स्वदेशी खरीद से युद्धक क्षमताएँ सुदृढ़ हो रही हैं: 
    • स्वीकृतियों में ₹62,000 करोड़ की लागत वाले 97 तेजस एमके-1ए लड़ाकू विमान तथा ₹62,700 करोड़ की लागत वाले 156 एलसीएच प्रचंड हेलीकॉप्टर शामिल हैं। इन खरीदों से भारत की स्वदेशी अंतरिक्ष एवं विमानन तथा रक्षा विनिर्माण क्षमताओं को बढ़ावा मिल रहा है।
  • रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया, 2020 ने स्वदेशी खरीद और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा दिया।
    • इसने रक्षा क्षेत्र में भारतीय उद्यमों की अभिकल्पना, विकास और विनिर्माण में भागीदारी का दायरा भी व्यापक किया।
  • रक्षा खरीद प्रक्रिया, 2016 ने रक्षा खरीद को सुव्यवस्थित किया और मेक इन इंडिया को भी आगे बढ़ाया।
    • इसने रक्षा खरीद में भविष्य के सुधारों के लिए एक रूपरेखा स्थापित की।
  • रक्षा खरीद नियमावली, 2025 में लगभग ₹1 लाख करोड़ की राजस्व खरीद को सरल बनाया गया।
    • इससे स्वीकृति प्रक्रिया में तीव्रता आई, स्वदेशी परियोजनाओं पर दंड कम किए गए तथा दीर्घकालिक आदेश सुनिश्चित किए गए।
  • स्वदेशी उच्च-प्रणोदन क्षमता वाला इंजन: सरकार का लक्ष्य घरेलू उच्च-प्रणोदन क्षमता वाले विमान इंजन के विकास के लिए ₹5,000 करोड़ से अधिक का निवेश करना है, विशेष रूप से उन्नत मध्यम लड़ाकू विमान कार्यक्रम के लिए।
  • परीक्षण एवं सामग्री: भारत अपनी प्रथम स्वदेशी उच्च-प्रणोदन क्षमता वाले इंजन की परीक्षण सुविधा स्थापित करेगा तथा महत्वपूर्ण कच्चे माल के स्वदेशीकरण के लिए मिधानी के साथ सहयोग करेगा।
  • एचएएल कोरापुट की उपलब्धि: हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमानों के लिए 2,000वाँ विमान इंजन, एएल-31एफपी, सौंपा है। इसके अतिरिक्त, उसने 9,000 से अधिक इंजनों का पुनरुद्धार किया है।
    • एचएएल का कोरापुट कारखाना प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के माध्यम से रूसी मूल के इंजनों का विनिर्माण कर रहा है, हालांकि कुछ कलपुर्जे, फोर्जिंग तथा ढलाई अभी भी आयात की जाती हैं।
    • भारतीय वायु सेना के पास लगभग 260 सुखोई-30 विमान सेवा में हैं और एचएएल के अनुमान के अनुसार इनके पूरे सेवा-काल में लगभग 900 इंजनों की आवश्यकता होगी।
  • शक्ति इंजन: सफ्रान के साथ मिलकर विकसित शक्ति इंजन के लिए दूसरी उत्पादन लाइन स्थापित की जा रही है। इससे उत्पादन क्षमता 80 से बढ़कर प्रति वर्ष 180 इंजन हो जाएगी। इस पर ₹218 करोड़ का निवेश किया जाएगा।
  • वैश्विक साझेदारियाँ: भारत घरेलू विमान इंजन क्षमताओं के विकास में सहायता के लिए सफ्रान और रोल्स-रॉयस को भी शामिल कर रहा है।
  • आईडीईएक्स परियोजना: ₹498.78 करोड़ के व्यय के साथ आईडीईएक्स परियोजना में मार्च 2026 तक 676 नवोदित उद्यमों, लघु एवं मध्यम उद्यमों तथा नवोन्मेषकों को शामिल किया गया, जिसके परिणामस्वरूप 551 अभिकल्पना एवं विकास अनुबंध हुए।
  • अदिति पहल: यह रक्षा नवाचार संगठन की वित्तीय सहायता पहल है, जिसका उद्देश्य सैन्य क्षेत्र में महत्वपूर्ण नवाचारों को शीघ्र विकसित करना है। वर्ष 2023-24 से 2025-26 की अवधि के लिए इसके अंतर्गत ₹750 करोड़ का प्रावधान किया गया है।
  • प्रौद्योगिकी विकास निधि: इस पहल के अंतर्गत महत्वपूर्ण रक्षा प्रौद्योगिकी के विकास के लिए ₹50 करोड़ तक की वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।
    • इसके अतिरिक्त, गहन प्रौद्योगिकी और नई प्रौद्योगिकियों के लिए ₹500 करोड़ की निधि प्रदान की गई तथा जून 2026 तक ₹334 करोड़ मूल्य की 80 परियोजनाएँ कार्यान्वित की जा रही थीं।

भारत के अंतरिक्ष एवं विमानन तथा रक्षा क्षेत्र का महत्व

  • रणनीतिक स्वायत्तता और राष्ट्रीय सुरक्षा: विमान विनिर्माण से भू-राजनीतिक संकट के समय अस्थिर विदेशी आपूर्ति शृंखलाओं पर निर्भरता कम होती है और रक्षा बलों की निरंतर परिचालन तत्परता सुनिश्चित होती है।
  • आर्थिक विकास और उच्च-मूल्य वाले रोजगार: अंतरिक्ष एवं विमानन उत्पादन सूक्ष्म एवं सटीक अभियांत्रिकी पर आधारित है।
    • यह प्रशिक्षित तकनीशियनों, सॉफ्टवेयर अभियंताओं और सामग्री वैज्ञानिकों की मांग को बढ़ाता है तथा उच्च-प्रौद्योगिकी आधारित सकल घरेलू उत्पाद में योगदान को बढ़ावा देता है।
  • प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण: वैश्विक अंतरिक्ष एवं विमानन कंपनियों के साथ सहयोग से भारतीय औद्योगिक तंत्र को उन्नत विनिर्माण विधियों, उन्नत मिश्रित पदार्थों तथा सटीक मशीनिंग प्रौद्योगिकी तक पहुँच प्राप्त होती है।
  • निर्यात क्षमता और सॉफ्ट पावर: मित्र देशों की सरकारों को रक्षा प्रणालियों, जैसे ब्रह्मोस मिसाइल, एचएएल के हल्के लड़ाकू हेलीकॉप्टर और रडार प्रणालियों की आपूर्ति से आर्थिक तथा भू-राजनीतिक संबंध मजबूत होते हैं।
  • वाणिज्यिक अंतरिक्ष और अनुप्रयुक्त क्षेत्र: अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियाँ उपग्रह संचार, आपदा प्रबंधन, कृषि उपज मानचित्रण और शहरी नियोजन जैसी महत्वपूर्ण नागरिक अवसंरचनाओं को सक्षम बनाती हैं।

क्या आप जानते हैं?

  • भारतीय सेना ने अपने लगभग 91 प्रतिशत गोला-बारूद भंडार का स्वदेशीकरण कर लिया है। 175 में से 159 प्रकार के गोला-बारूद का उत्पादन देश में ही किया जा रहा है।
    • भारत ने मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल अग्नि-4 और लंबी दूरी की सतह से सतह पर मार करने वाली बैलिस्टिक मिसाइल अग्नि-5 के परिचालन एवं तकनीकी पहलुओं का सफल परीक्षण किया है।
    • बुनियादी लक्ष्यों के विरुद्ध स्वदेशी सटीक प्रहार क्षमताओं का परीक्षण तारा ग्लाइड हथियार और रुद्र-एम2 वायु से सतह पर मार करने वाली मिसाइल के माध्यम से भी किया गया है।
    • रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन ने कुशा लंबी दूरी की वायु रक्षा मिसाइल और अत्यंत कम दूरी की वायु रक्षा प्रणाली जैसे कई स्वदेशी रूप से विकसित प्रणालियों के विकास में प्रगति की है।
    • रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन ने अति-ध्वनिक मिसाइल के विकास के लिए सक्रिय रूप से शीतलित स्क्रैमजेट दहनक का 12 मिनट का सफल भू-परीक्षण किया है।
  • भारतीय नौसेना ने आईएनएस सूरत, आईएनएस नीलगिरि और आईएनएस वाग्शीर सहित 12 पोतों और पनडुब्बियों को सेवा में शामिल किया है।
    • आईएनएस महेंद्रगिरि, एक स्टील्थ फ्रिगेट, को 75 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री के साथ नौसेना में शामिल किया गया है।
    • शाची को 11 आगामी पीढ़ी के अपतटीय गश्ती पोतों में से पहले पोत के रूप में जलावतरण किया गया है। आईएनएस दुनागिरि, आईएनएस संशोधक और आईएनएस अग्रय के सेवा में शामिल होने से स्वदेशी संध्याक श्रेणी के सर्वेक्षण बेड़े का गठन पूरा हुआ है तथा समुद्री निगरानी और सर्वेक्षण क्षमताओं में वृद्धि हुई है।
    • रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन ने नौसैनिक पोत-रोधी मध्यम दूरी की मिसाइल का सफल परीक्षण किया है और बहु-स्तरीय बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा क्षमता का प्रदर्शन किया है।

चुनौतियाँ और चिंताएँ

  • महत्वपूर्ण घटकों पर अत्यधिक निर्भरता: विमान इंजन, उन्नत रडार इलेक्ट्रॉनिक्स और विशेष मिश्रधातुओं जैसे आवश्यक घटक अभी भी बड़े पैमाने पर आयात किए जाते हैं।
  • उच्च लागत: अंतरिक्ष एवं विमानन क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास के लिए अत्यधिक पूंजी की आवश्यकता होती है और इसकी विकास अवधि कई दशकों की होती है।
    • घरेलू निजी क्षेत्र की कंपनियों को सामान्यतः उच्च पूंजीगत लागत और महत्वपूर्ण जोखिम का सामना करना पड़ता है।
  • उभरता रखरखाव, मरम्मत एवं जीर्णोद्धार पारिस्थितिकी तंत्र: भारतीय वाणिज्यिक विमानों को बड़े रखरखाव निरीक्षणों के लिए विदेश भेजा जा रहा है। कर व्यवस्था, प्रमाणन संबंधी बाधाओं और स्थानीय अवसंरचना की कमी के कारण इससे पूंजी का बाह्य प्रवाह होता है।
  • नियामकीय और नौकरशाही बाधाएँ: प्रमाणन प्रक्रियाओं, खरीद प्रक्रियाओं और रक्षा अधिग्रहण नियमों के आधुनिकीकरण में समय लग सकता है, जिससे उत्पादों के एकीकरण में अक्सर देरी होती है।
  • विशेषज्ञता में संरचनात्मक कमी: भारत बड़ी संख्या में सामान्य अभियंताओं को तैयार करता है, लेकिन उड़ान नियंत्रण अभिकल्पना, प्रणोदन अभियांत्रिकी और स्टील्थ प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में विशेष अनुभव रखने वाले विशेषज्ञों की संरचनात्मक कमी है।

निष्कर्ष

  • भारतीय अंतरिक्ष एवं विमानन उद्योग स्वदेशी प्लेटफॉर्म, निजी क्षेत्र की भागीदारी और अंतरिक्ष क्षमताओं के माध्यम से अधिक आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रहा है। वास्तविक तकनीकी स्वायत्तता के लिए विमान इंजनों, उन्नत सामग्रियों, वैमानिकी, संवेदकों और स्वायत्त प्रणालियों में विशेषज्ञता हासिल करना आवश्यक है।
  • अनुसंधान एवं विकास के लिए निरंतर वित्तपोषण, उद्योग–शैक्षणिक संस्थानों–रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन–भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के बीच सुदृढ़ सहयोग, सुदृढ़ परीक्षण एवं प्रमाणन अवसंरचना, लघु एवं मध्यम उद्यमों तथा नवोदित उद्यमों का वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में एकीकरण, नागरिक–सैन्य प्रौद्योगिकी का अभिसरण तथा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और आत्मसात करने पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों की आवश्यकता है।
  • अंतरिक्ष एवं विमानन क्षेत्र को एक व्यापक राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए, जिसमें भारत एक वैश्विक रखरखाव, मरम्मत एवं जीर्णोद्धार तथा अंतरिक्ष एवं विमानन विनिर्माण केंद्र बने और साथ ही विशेष रूप से प्रशिक्षित कुशल कार्यबल का निर्माण किया जाए।

स्रोत  :IE

 

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