भारत में विद्युत माँग बढ़ने के कारण कोयला भंडार गंभीर रूप से निम्न स्तर पर 

पाठ्यक्रम: GS3/ऊर्जा

संदर्भ

  • इस वर्ष घरेलू कोयला-आधारित विद्युत संयंत्रों में कोयले के भंडार में कमी विगत तीन वर्षों में सर्वाधिक रही है।

प्रमुख तथ्य

  • घरेलू कोयला-आधारित विद्युत संयंत्रों में ईंधन भंडार में इस वर्ष लगभग 66% की कमी आई है।
    • इसी अवधि के दौरान वर्ष 2024 में यह कमी 31.8% तथा वर्ष 2023 में 36.8% थी।
    • विगत कुछ वर्षों में नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार के बावजूद, कोयला अभी भी देश में विद्युत उत्पादन का सबसे बड़ा स्रोत बना हुआ है।

भारत विद्युत उत्पादन के लिए कोयले पर निर्भर क्यों है?

  • घरेलू कोयला भंडार: भारत में पर्याप्त कोयला भंडार उपलब्ध हैं, विशेष रूप से झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में। इससे आयातित ईंधनों पर निर्भरता कम होती है।
  • ऊर्जा की विश्वसनीय आपूर्ति: कोयला-आधारित विद्युत संयंत्र निरंतर विद्युत उत्पादन कर सकते हैं, जबकि सौर एवं पवन ऊर्जा का उत्पादन परिवर्तनशील होता है।
  • बढ़ती विद्युत माँग: औद्योगीकरण, शहरीकरण, विद्युतीकरण तथा विद्युत उपकरणों और शीतलन प्रणालियों के बढ़ते उपयोग के कारण विद्युत की माँग लगातार बढ़ रही है।
  • नवीकरणीय ऊर्जा की अनिरंतरता: सौर ऊर्जा मुख्यतः दिन के समय उपलब्ध होती है, जबकि पवन ऊर्जा का उत्पादन हवा की परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
    • जब तक पर्याप्त बैटरी भंडारण, पंप्ड-स्टोरेज जलविद्युत तथा लचीले विद्युत ग्रिड उपलब्ध नहीं हो जाते, तब तक नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन में कमी आने पर कोयला विद्युत आपूर्ति बनाए रखने में सहायता करता है।

भारत की कोयला निर्भरता से संबंधित चिंताएँ

  • पर्यावरणीय प्रदूषण: कोयला-आधारित विद्युत संयंत्र कणीय पदार्थ , सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसे प्रदूषक उत्सर्जित करते हैं, जिससे वायु प्रदूषण बढ़ता है।
  • उच्च ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन: कोयला एक उच्च-कार्बन ईंधन है और भारत के CO₂ उत्सर्जन में महत्वपूर्ण योगदान देता है, जिससे जलवायु परिवर्तन के शमन की प्रक्रिया अधिक कठिन हो जाती है।
  • जल की खपत: ताप विद्युत संयंत्रों को शीतलन के लिए बड़ी मात्रा में जल की आवश्यकता होती है, जिससे जल संसाधनों पर दबाव बढ़ता है।
  • पर्यावरणीय क्षति: कोयला खनन से वनों की कटाई, भूमि क्षरण, समुदायों का विस्थापन तथा जैव-विविधता की हानि हो सकती है।
    • कोयले के दहन से बड़ी मात्रा में फ्लाई ऐश उत्पन्न होती है, जिसका अनुचित निपटान भूमि और जल को प्रदूषित कर सकता है।
  • ऊर्जा संक्रमण में कठिनाई: कोयले पर अत्यधिक निर्भरता से कोयला-आधारित बुनियादी ढाँचे पर दीर्घकालिक निर्भरता स्थापित हो सकती है, जिससे स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों की ओर संक्रमण अधिक चुनौतीपूर्ण और महँगा हो सकता है।

सरकारी पहल

  • राष्ट्रीय सौर मिशन (NSM): इसे वर्ष 2010 में शुरू किया गया था। इसके अंतर्गत ग्रिड-संबद्ध तथा ऑफ-ग्रिड सौर ऊर्जा परियोजनाओं सहित सौर ऊर्जा क्षमता की स्थापना के लिए महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं।
  • राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन: यह नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग करके उत्पादित हरित हाइड्रोजन को बढ़ावा देता है, जिसका उद्देश्य ऐसे क्षेत्रों में जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करना है, जहाँ कार्बन उत्सर्जन में कमी लाना कठिन है।
  • राष्ट्रीय स्वच्छ ऊर्जा कोष (NCEF): इसकी स्थापना स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों और ऐसी परियोजनाओं में अनुसंधान एवं नवाचार को समर्थन देने के लिए की गई थी, जो ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने में सहायता करती हैं।
  • राष्ट्रीय पवन ऊर्जा मिशन: यह भारत में पवन ऊर्जा के विकास और विस्तार पर केंद्रित है। वर्ष 2030 तक पवन ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य 140 GW निर्धारित किया गया है।
  • वित्तीय सहायता एवं प्रोत्साहन: बड़े पैमाने की सौर एवं हाइब्रिड परियोजनाओं के लिए व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण (VGF)।
    • सौर PV विनिर्माण के लिए उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन योजना।
    • रूफटॉप सौर ऊर्जा तथा ऑफ-ग्रिड प्रणालियों के लिए सब्सिडी।
    • हरित विद्युत व्यापार को बढ़ावा देने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा प्रमाणपत्र।
  • बुनियादी ढाँचा विकास: नवीकरणीय ऊर्जा के ग्रिड एकीकरण में सुधार के लिए ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर विकसित किया जा रहा है।
    • कृषि पंपों को सौर ऊर्जा से संचालित करने के लिए PM-KUSUM योजना लागू की जा रही है।
  • संशोधित वितरण क्षेत्र योजना (RDSS): इसका उद्देश्य विद्युत वितरण कंपनियों (DISCOMs) को सुदृढ़ करना है।
  • अंतरराष्ट्रीय साझेदारियाँ: भारत द्वारा वैश्विक सौर सहयोग को बढ़ावा देने के लिए अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) की शुरुआत की गई। इसके अंतर्गत भारत स्वच्छ ऊर्जा में निवेश और प्रौद्योगिकी के लिए विभिन्न देशों तथा वैश्विक कोषों के साथ सहयोग करता है।
  • ग्रिड एकीकरण योजना: भारत के विद्युत ग्रिड को 500 GW नवीकरणीय ऊर्जा के लिए लगभग ₹2.4 लाख करोड़ की ट्रांसमिशन योजना के माध्यम से पुनर्गठित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य नवीकरणीय ऊर्जा से समृद्ध राज्यों को विद्युत की माँग वाले केंद्रों से जोड़ना है।
  • सरकार ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर तथा राजस्थान, गुजरात और लद्दाख से निकलने वाली नई उच्च क्षमता वाली ट्रांसमिशन लाइनों के माध्यम से ट्रांसमिशन बुनियादी ढाँचे में निवेश को प्राथमिकता दे रही है।
  • यद्यपि ये परियोजनाएँ बहुवर्षीय प्रयास हैं, लेकिन इनके संचालन में आने के बाद 200 GW से अधिक नई नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता को ग्रिड से जोड़ने में सहायता मिलेगी।
  • वर्ष 2032 तक का दृष्टिकोण: सरकार ने उच्च-वोल्टेज प्रत्यक्ष धारा (HVDC) कॉरिडोर के निर्माण तथा अंतर-क्षेत्रीय ट्रांसमिशन क्षमता को बढ़ाने की योजना बनाई है।
    • अंतर-क्षेत्रीय ट्रांसमिशन क्षमता को वर्तमान 120 GW से बढ़ाकर 2027 तक 143 GW और 2032 तक 168 GW करने का लक्ष्य है।

निष्कर्ष

  • अतः भारत की कोयले पर निर्भरता का कारण केवल यह नहीं है कि देश में नवीकरणीय ऊर्जा की कमी है।
  • इसका प्रमुख कारण यह है कि वर्तमान में कोयला उपलब्धता, स्थापित बुनियादी ढाँचे, निरंतर विद्युत उत्पादन और प्रणालीगत विश्वसनीयता—इन सभी को एक साथ उपलब्ध कराता है।
  • साथ ही, भारत कोयले पर अपनी सापेक्ष निर्भरता को धीरे-धीरे कम करने के लिए सौर, पवन, जलविद्युत, परमाणु ऊर्जा तथा ऊर्जा भंडारण का विस्तार कर रहा है।

स्रोत: IE

 

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