पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था, GS3/ अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- करों के हस्तांतरण तथा राज्यों की राजकोषीय स्वायत्तता को लेकर हालिया परिचर्चाओं ने संघ के संसाधनों और राज्यों के उत्तरदायित्वों के मध्य संतुलन को लेकर चिंताओं को पुनः बढ़ा दिया है।
राजकोषीय संघवाद के बारे में
- राजकोषीय संघवाद एक आर्थिक ढाँचा है, जिसके माध्यम से संघ, राज्य और स्थानीय सरकारों के बीच संबंधों को समझा जाता है। इसमें इन सरकारों के बीच व्यय एवं कराधान संबंधी शक्तियों के विभाजन पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।
- यह विभिन्न स्तरों की सरकारों के बीच उत्तरदायित्वों के विभाजन से संबंधित है।
- इसके साथ ही, यह विभिन्न सरकारों के बीच राजस्व एकत्रण की शक्तियों के विभाजन से भी संबंधित है, जिसे प्रायः “कर निर्धारण” कहा जाता है।
- राजकोषीय संघवाद का पारंपरिक सिद्धांत यह मानता है कि अत्यधिक गतिशील कर-आधार वाली गतिविधियों या संस्थाओं पर लगाए जाने वाले कर केंद्र सरकार को तथा अपेक्षाकृत कम गतिशील कर-आधार वाले कर राज्य अथवा स्थानीय सरकारों को सौंपे जाने चाहिए।
- जब किसी सरकार की व्यय संबंधी जिम्मेदारियाँ उसकी स्वयं की राजस्व एकत्रण करने की क्षमता से अधिक हो जाती हैं, तब सहायता अनुदान तथा अंतर-सरकारी वित्तीय हस्तांतरण आवश्यक हो जाते हैं।
राजकोषीय असंतुलन क्या है?
- संविधान की सातवीं अनुसूची के माध्यम से संघ और राज्यों के बीच कराधान शक्तियों तथा व्यय संबंधी उत्तरदायित्वों का वितरण किया गया है।
- हालाँकि, यह विभाजन पूर्णतः सममित नहीं है, जिसके कारण राजकोषीय असंतुलन उत्पन्न होता है।
- ऊर्ध्वाधर राजकोषीय असंतुलन : यह सरकार के विभिन्न स्तरों की राजस्व एकत्रण की क्षमता और उनकी व्यय संबंधी उत्तरदायित्वों के मध्य असंतुलन को दर्शाता है।
- संविधान के अनुच्छेद 280 के अंतर्गत वित्त आयोग संघ और राज्यों के बीच विभाज्य कर-राजस्व के वितरण तथा राज्यों के हिस्से को विभिन्न राज्यों के बीच बाँटने की सिफारिश करता है।
- क्षैतिज राजकोषीय असंतुलन : यह समान स्तर की सरकारों के बीच राजस्व एकत्रण करने की क्षमता और व्यय संबंधी आवश्यकताओं में वर्तमान अंतर को दर्शाता है। उदाहरण के लिए, विभिन्न राज्यों अथवा विभिन्न स्थानीय सरकारों के बीच यह अंतर देखा जा सकता है।
सहकारी राजकोषीय संघवाद के एक तंत्र के रूप में GST
- वस्तु एवं सेवा कर (GST) की शुरुआत ने भारत की अप्रत्यक्ष कर प्रणाली में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन किया।
- GST ने संघ और राज्यों द्वारा लगाए जाने वाले कई अप्रत्यक्ष करों को एक साझा व्यवस्था के अंतर्गत समाहित किया तथा गंतव्य-आधारित कराधान प्रणाली को लागू किया।
- इनपुट टैक्स क्रेडिट की व्यवस्था ने करों के कर-पर-कर प्रभाव को कम करने में भी सहायता की।
- अनुच्छेद 279A के अंतर्गत गठित GST परिषद विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह एक संस्थागत तंत्र प्रदान करती है, जिसके माध्यम से संघ और राज्य GST से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णयों में संयुक्त रूप से भाग लेते हैं।
राजकोषीय उत्तरदायित्व और सार्वजनिक ऋण
- राजकोषीय संघवाद की स्थिरता उत्तरदायित्व ऋण-प्रबंधन पर भी निर्भर करती है।
- सरकारी उधारी विकास को समर्थन प्रदान कर सकती है, जब इसका उपयोग ऐसी उत्पादक परिसंपत्तियों या निवेशों के वित्तपोषण के लिए किया जाता है, जो दीर्घकाल में आर्थिक प्रतिफल उत्पन्न करते हैं।
- हालाँकि, निरंतर बने रहने वाले राजकोषीय घाटे से ऋण-सेवा दायित्व बढ़ सकते हैं और आवश्यक सार्वजनिक व्यय के लिए उपलब्ध संसाधनों में कमी आ सकती है।
- राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम, 2003 का उद्देश्य संघ और राज्य दोनों स्तरों पर राजकोषीय अनुशासन को बढ़ावा देना है।
प्रमुख चिंताएँ क्या हैं?
- भारत में ऊर्ध्वाधर राजकोषीय असंतुलन अभी भी एक संरचनात्मक चुनौती बना हुआ है, क्योंकि राज्यों के पास व्यापक व्यय संबंधी जिम्मेदारियाँ हैं, जबकि व्यापक आधार वाले और पर्याप्त राजस्व प्रदान करने वाले कर स्रोतों तक उनकी पहुँच अपेक्षाकृत सीमित है।
- राज्यों के बीच क्षैतिज असमानताएँ भी महत्वपूर्ण बनी हुई हैं, क्योंकि विभिन्न राज्य अपनी आय के स्तर, कर-आधार, जनसांख्यिकीय संरचना तथा सार्वजनिक सेवाएँ उपलब्ध कराने की लागत के मामले में काफी भिन्न हैं।
- बंधित या सशर्त हस्तांतरण के बढ़ते उपयोग से कभी-कभी राज्यों की उस क्षमता में कमी आ सकती है, जिसके माध्यम से वे अपनी विशिष्ट प्राथमिकताओं के अनुसार संसाधनों का आवंटन कर सकें।
- स्थानीय सरकारों की राजकोषीय स्थिति कमजोर बनी हुई है, क्योंकि उनके स्वयं के राजस्व स्रोत सीमित हैं और उच्चतर स्तर की सरकारों पर उनकी निर्भरता काफी अधिक है।
- बजट से बाहर की उधारी, सरकारी गारंटियाँ तथा अन्य आकस्मिक देनदारियाँ सरकारों की वास्तविक राजकोषीय स्थिति का आकलन करना कठिन बना सकती हैं।
- व्यय के कमजोर परिणाम सार्वजनिक व्यय के विकासात्मक प्रभाव को कम कर देते हैं, भले ही सरकारें पर्याप्त वित्तीय संसाधनों का आवंटन करती हों।
आगे की राह
- राज्यों को कर प्रशासन को सुदृढ़ करना, कर अनुपालन में सुधार करना तथा अपने राजस्व आधार का विस्तार करना चाहिए, लेकिन साथ ही नागरिकों और व्यवसायों पर अत्यधिक अनुपालन लागत का बोझ डालने से बचना चाहिए।
- सरकारों को परिणाम-आधारित बजट निर्माण को अधिक व्यापक रूप से अपनाना चाहिए तथा यह मूल्यांकन करना चाहिए कि सार्वजनिक व्यय से स्वास्थ्य, शिक्षा, बुनियादी ढाँचे एवं आजीविका के क्षेत्र में मापनीय सुधार हो रहे हैं या नहीं।
- भविष्य में राजकोषीय हस्तांतरण की व्यवस्था में जलवायु संबंधी संवेदनशीलता, जनसांख्यिकीय संक्रमण, भौगोलिक बाधाओं तथा आवश्यक सार्वजनिक सेवाएँ उपलब्ध कराने की लागत में राज्यों के बीच विद्यमान अंतर को अधिकाधिक ध्यान में रखा जाना चाहिए।
स्रोत: HT
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