पाठ्यक्रम: GS3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
संदर्भ
- भारत के अनुसंधान उत्पादन में 2020 से 2025 के बीच उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, किंतु कमजोर उद्धरण-प्रभाव, पेटेंटों के निम्न वाणिज्यीकरण तथा बढ़ती शोध-पत्र वापसी की घटनाओं ने उभरते हुए ‘शोध-पत्र दुर्ग’ को लेकर चिंताएँ बढ़ा दी हैं।
भारत का अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र
- भारत वैश्विक स्तर पर अकादमिक ज्ञान के एक प्रमुख उत्पादक के रूप में उभरा है। 2020 से 2025 के बीच भारतीय शोधकर्ताओं ने स्कोपास(Scopus) में अनुक्रमित पत्रिकाओं में लगभग 1.6 मिलियन शोध-पत्र प्रकाशित किए, जो देशों के बीच सर्वाधिक है तथा अमेरिका, ब्रिटेन और चीन से आगे है।
- कुछ निजी विश्वविद्यालयों में पाँच वर्षों के अंदर शोध-पत्र उत्पादन में 760% से अधिक वृद्धि दर्ज की गई।
- पेटेंट गतिविधियों में भी तीव्र विस्तार हुआ है। विश्वविद्यालयों द्वारा दायर पेटेंट आवेदनों की संख्या 2020–21 में 11,150 से बढ़कर 2024–25 में 45,776 हो गई, अर्थात लगभग चार गुना वृद्धि हुई।
- कुछ निजी विश्वविद्यालयों ने सामूहिक रूप से पेटेंट आवेदन के मामले में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IITs) को भी पीछे छोड़ दिया है।
- QS विश्व विश्वविद्यालय रैंकिंग 2026 में भारत के 54 संस्थान शामिल हुए, जबकि 2015 में यह संख्या केवल 11 थी। इस प्रकार भारत वैश्विक स्तर पर सर्वाधिक प्रतिनिधित्व वाले देशों में चौथे स्थान पर पहुँच गया। आठ भारतीय संस्थानों ने प्रति संकाय सदस्य उद्धरणों के आधार पर वैश्विक शीर्ष 100 में स्थान प्राप्त किया।
- IIT दिल्ली 123वें स्थान के साथ भारत का सर्वोच्च रैंक वाला संस्थान रहा, जबकि IIT बॉम्बे और IIT मद्रास इसके बाद रहे। IIT मद्रास 47 स्थान ऊपर उठकर 227वें से 180वें स्थान पर पहुँच गया।
- हालाँकि, टाइम्स हायर एजुकेशन (THE) 2026 रैंकिंग अपेक्षाकृत कम उत्साहजनक तस्वीर प्रस्तुत करती है। यद्यपि भारत के 120 से अधिक संस्थानों को रैंकिंग में स्थान मिला, लेकिन केवल चार संस्थान वैश्विक शीर्ष 500 में शामिल हो सके। भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) को 201–250 के वर्ग में स्थान मिला।
भारत का अनुसंधान: प्रकाशन की मात्रा से वास्तविक प्रभाव तक
- प्रकाशन की मात्रा बनाम अनुसंधान का प्रभाव: मुख्य चुनौती यह है कि अनुसंधान की मात्रा में हुई वृद्धि उसके प्रभाव में समानुपातिक वृद्धि में परिवर्तित नहीं हुई है।
- भारत वार्षिक शोध-पत्र प्रकाशन की मात्रा के मामले में विश्व स्तर पर तीसरे स्थान पर है, किंतु एच-इंडेक्स के आधार पर 19वें स्थान पर है।
- भारत का समग्र एच-इंडेक्स 925 है, जबकि अमेरिका का यह आँकड़ा 3,213 है।
- इस प्रकार, भारत बड़ी मात्रा में अनुसंधान तो उत्पन्न करता है, लेकिन तुलनात्मक रूप से कम ऐसे शोध उत्पन्न होते हैं जिन्हें बाद में पढ़ा, उद्धृत, अपनाया या आगे के अनुसंधान के आधार के रूप में विकसित किया जाता है।
- पेटेंट संबंधी विरोधाभास: पेटेंट की स्थिति भी इसी प्रकार के अंतर को दर्शाती है। यद्यपि विश्वविद्यालयों द्वारा दायर पेटेंट आवेदनों की संख्या 11,150 से बढ़कर 45,776 हो गई, किंतु 2024–25 में पेटेंट प्रदान किए जाने की संख्या पिछले वर्ष की तुलना में 67% घट गई।
- विगत पाँच वर्षों में समग्र पेटेंट-प्रदान दर औसतन लगभग 24% रही, जबकि विश्वविद्यालयों के लिए यह कथित रूप से केवल 3% तक रही।
- इससे भी अधिक चिंताजनक तथ्य यह है कि प्रदान किए गए पेटेंटों में वास्तव में वाणिज्यिक उपयोग में लाए गए पेटेंटों का अनुपात, अर्थात प्रचलन दर , 2022–23 में 12.1% से घटकर 2024–25 में मात्र 1.6% रह गया।
संबंधित मुद्दे एवं चिंताएँ
- प्रोत्साहन संरचना: राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग फ्रेमवर्क (NIRF) में ‘अनुसंधान एवं व्यावसायिक अभ्यास’ को 30% भारांक दिया गया है, जिससे प्रकाशनों तथा पेटेंट आवेदनों/प्रदान किए गए पेटेंटों को पर्याप्त प्रोत्साहन मिलता है।
- समस्या यह है कि संस्थान प्रकाशन या पेटेंट दाखिल करने से लाभ प्राप्त कर सकते हैं, जबकि इनके बाद के कमजोर परिणामों के लिए समान रूप से प्रभावी दंड का प्रावधान नहीं है।
- मौद्रिक प्रोत्साहन की समस्या: कई निजी विश्वविद्यालय नकद प्रोत्साहन प्रदान करते हैं, जो कभी-कभी प्रति शोध-पत्र, पेटेंट अथवा सम्मेलन प्रस्तुति पर लाखों रुपये तक हो सकता है।
- जब ऐसे प्रोत्साहनों की निगरानी कमजोर होती है, तो वे शोषणकारी प्रकाशन, संदिग्ध लेखकत्व तथा शोध-पत्र मिल जैसी गतिविधियों को बढ़ावा दे सकते हैं।
- IIMs और IITs के बीच का अंतर इस संदर्भ में महत्त्वपूर्ण है। कुछ IIMs शीर्ष श्रेणी की पत्रिकाओं में प्रकाशित शोध-पत्रों के लिए ₹10 लाख तक का प्रोत्साहन प्रदान करते हैं, जो आंशिक रूप से परामर्श कार्य से होने वाली संभावित आय की अवसर लागत की भरपाई करता है।
- इसके विपरीत, पुराने IITs सामान्यतः प्रत्यक्ष प्रकाशन बोनस प्रदान नहीं करते। वे इसके बजाय अनुसंधान अवसंरचना, सम्मेलन सहायता, अकादमिक प्रतिष्ठा, नामित अध्यक्षीय पदों तथा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के अवसरों पर निर्भर करते हैं।
- अनुसंधान की सत्यनिष्ठा: भारत अब शोध-पत्रों की प्रत्यक्ष वापसी के मामले में विश्व स्तर पर तीसरे स्थान पर है। इसकी शोध-पत्र वापसी दर 2012 में प्रति हजार शोध-पत्र 1.5 से बढ़कर 2022 में 3.5 हो गई।
- दो दशकों के दौरान भारतीय संस्थानों से संबद्ध 3,244 वापस लिए गए शोध-पत्रों के एक अध्ययन में पाया गया कि लगभग 60% शोध-पत्र निजी संस्थानों से संबद्ध थे। फर्जी सहकर्मी समीक्षा, आँकड़ों की हेराफेरी तथा साहित्यिक चोरी इसके प्रमुख कारणों में शामिल थे।
संबंधित प्रयास एवं पहल
- भारत ने अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (ANRF), राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020, बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) सुधारों तथा संस्थागत अनुसंधान-नैतिकता तंत्र के माध्यम से अपने अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ किया है।
- हालाँकि, भारत में अभी भी एक ऐसा पूर्णतः स्वतंत्र राष्ट्रीय अनुसंधान-सत्यनिष्ठा निकाय नहीं है, जिसके पास सुदृढ़ जाँच संबंधी अधिकार हों। इसके विपरीत, ब्रिटेन में रिसर्च इंटीग्रिटी ऑफिस (2006 में स्थापित) तथा डेनमार्क में वैधानिक अनुसंधान दुराचार बोर्ड जैसी संस्थाएँ उपस्थित हैं।
आगे की राह: शोध-पत्र दुर्ग से ज्ञान-शक्ति तक
- भारत को ‘अधिक प्रकाशन’ से ‘प्रभाव का सृजन’ करने की दिशा में आगे बढ़ने की आवश्यकता है।
- NIRF के मापदंडों में सुधार करते हुए गुणवत्ता-समायोजित उद्धरण, पुनरुत्पादकता तथा वास्तविक अनुसंधान प्रभाव को अधिक महत्त्व दिया जाना चाहिए।
- पेटेंटों की गणना केवल आवेदन दाखिल करने के आधार पर नहीं, बल्कि पेटेंट प्रदान किए जाने तथा सफल वाणिज्यीकरण के बाद की जानी चाहिए।
- वापस लिए गए शोध-पत्रों, शोध-आँकड़ों की हेराफेरी तथा अनैतिक लेखकत्व के लिए दंडात्मक प्रावधान लागू किए जाने चाहिए।
- जाँच संबंधी अधिकारों से युक्त स्वायत्त राष्ट्रीय अनुसंधान-सत्यनिष्ठा प्राधिकरण की स्थापना की जानी चाहिए।
- प्रति शोध-पत्र नकद प्रोत्साहन जैसी सरल व्यवस्थाओं के स्थान पर प्रयोगशालाओं, शोधार्थी प्रशिक्षण, सम्मेलनों तथा प्रौद्योगिकी रूपांतरण के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की जानी चाहिए।
- अनुसंधान का मूल्यांकन चार आयामों के आधार पर किया जाना चाहिए—शैक्षणिक, प्रौद्योगिकीय, आर्थिक एवं सामाजिक प्रभाव।
- शैक्षणिक संस्थानों एवं उद्योग के बीच सहयोग, स्टार्टअप, लाइसेंसिंग, सार्वजनिक नीति में अनुसंधान के अनुप्रयोग तथा स्थानीय रूप से प्रासंगिक अनुसंधान को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
- भारत के पास असाधारण बौद्धिक पूँजी तथा विशाल जनसांख्यिकीय आधार है, जिसका प्रमाण चंद्रयान मिशन से लेकर तेजी से विस्तार करते अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र तक देखा जा सकता है।
- हालाँकि, भारत में आगामी परिवर्तन केवल प्रकाशित शोध-पत्रों अथवा पेटेंटों की संख्या से नहीं मापा जा सकता।
- गुणवत्ता, सत्यनिष्ठा, उपयोगिता एवं सामाजिक प्रभाव को भारतीय अनुसंधान की वास्तविक कसौटी बनाना होगा, तभी भारत एक शोध-पत्र उत्पादक राष्ट्र से वास्तविक वैश्विक ज्ञान-शक्ति के रूप में विकसित हो सकेगा।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न] भारत के अनुसंधान संबंधी विरोधाभास के पीछे निहित संरचनात्मक एवं संस्थागत कारकों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। भारत के अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र को अधिक गुणवत्तापरक, नैतिक एवं नवाचारोन्मुख बनाने के लिए उपाय सुझाइए। |
स्रोत: TH
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