पाठ्यक्रम: GS2/ अंतरराष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
- संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में वैश्विक दक्षिण की ओर से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के विस्तार की मांग का समर्थन किया।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की आवश्यकता
- अप्रतिनिधित्वकारी सदस्यता: 1945 में संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के समय सुरक्षा परिषद में 51 सदस्य देशों में से केवल 11 सदस्य थे, अर्थात लगभग 22% सदस्य देशों का प्रतिनिधित्व होता था।
- वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देश हैं, जबकि सुरक्षा परिषद में केवल 15 सदस्य हैं—अर्थात 8% से भी कम सदस्य देशों का प्रतिनिधित्व होता है।
- संघर्षों के समाधान में असमर्थता: सुरक्षा परिषद की वर्तमान संरचना गंभीर अंतरराष्ट्रीय संघर्षों का प्रभावी ढंग से समाधान करने तथा अंतरराष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा बनाए रखने में अपेक्षित रूप से सक्षम नहीं है।
- विश्व व्यवस्था में परिवर्तन: 1945 के बाद से विश्व व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन हुए हैं। इसलिए वर्तमान वैश्विक वास्तविकताओं को सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता की संरचना में प्रतिबिंबित किया जाना आवश्यक है।
- वीटो शक्ति: वर्तमान में केवल पाँच स्थायी सदस्यों के पास वीटो शक्ति है। इसके प्रयोग के कारण यूक्रेन एवं गाजा जैसे वैश्विक संघर्षों तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों से निपटने के लिए सुरक्षा परिषद में प्रभावी कार्रवाई बाधित हुई है।
- सुरक्षा परिषद के शेष 10 सदस्य देशों का चयन दो वर्ष की अवधि के लिए अस्थायी सदस्यों के रूप में होता है और उन्हें वीटो शक्ति प्राप्त नहीं है।
- शक्ति-संतुलन में असमानता: सुरक्षा परिषद की वर्तमान संरचना उस समय के शक्ति-संतुलन को अत्यधिक महत्त्व देती है, जो आज की वैश्विक वास्तविकताओं के अनुरूप नहीं है।
- यूरोप की विश्व जनसंख्या में लगभग 5% हिस्सेदारी है, किंतु किसी भी वर्ष सुरक्षा परिषद की 33% सीटों पर उसका प्रभाव रहता है। इसमें एक अन्य यूरोपीय शक्ति रूस को शामिल नहीं किया गया है।
- वैधता का प्रश्न: पाँच स्थायी सदस्यों के पास अत्यधिक शक्ति, विशेषकर वीटो शक्ति, होने के कारण सुरक्षा परिषद की संरचना को असमान एवं प्रतिनिधित्वहीन मानने की धारणा सुदृढ़ हुई है। इससे इसकी वैधता पर भी प्रश्न उठते हैं।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद
- यह संयुक्त राष्ट्र के छह प्रमुख अंगों में से एक है और इसका प्रमुख उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा बनाए रखना है।
- इसने अपना प्रथम अधिवेशन 17 जनवरी 1946 को वेस्टमिंस्टर, लंदन में आयोजित किया।
- मुख्यालय: न्यूयॉर्क नगर
- कुल सदस्य: 15
- पाँच स्थायी सदस्य एवं वीटो शक्ति: चीन, फ्रांस, रूस, यूनाइटेड किंगडम एवं संयुक्त राज्य अमेरिका।
- दस अस्थायी सदस्य
अस्थायी सदस्यों का निर्वाचन
- प्रत्येक वर्ष महासभा कुल 10 अस्थायी सदस्यों में से पाँच सदस्यों का दो वर्ष की अवधि के लिए निर्वाचन करती है।
- 10 अस्थायी सीटों का क्षेत्रीय आधार पर वितरण इस प्रकार है:
- अफ्रीकी एवं एशियाई देशों के लिए पाँच सीटें;
- पूर्वी यूरोपीय देशों के लिए एक सीट;
- लैटिन अमेरिकी एवं कैरेबियाई देशों के लिए दो सीटें;
- पश्चिमी यूरोपीय एवं अन्य देशों के लिए दो सीटें।
- सुरक्षा परिषद के लिए निर्वाचित होने हेतु उम्मीदवार देश को महासभा में उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्य देशों के दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है।
- निर्वाचन में संयुक्त राष्ट्र के सभी 193 सदस्य देश गुप्त मतदान के माध्यम से मतदान करते हैं।
- 50 से अधिक संयुक्त राष्ट्र सदस्य देश ऐसे हैं जो कभी भी सुरक्षा परिषद के सदस्य नहीं रहे हैं।
- भारत ने अंतिम बार 2021–22 में अस्थायी सदस्य के रूप में संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में स्थान ग्रहण किया था।
स्थायी सदस्यता के लिए भारत का पक्ष
- जनसांख्यिकीय महत्त्व: भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और विश्व की कुल जनसंख्या के लगभग छठे हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है।
- भारत अफ्रीका, लैटिन अमेरिका एवं अन्य विकासशील क्षेत्रों के व्यापक प्रतिनिधित्व का भी समर्थन करता है। इस प्रकार भारत सुरक्षा परिषद में सुधार को वैश्विक दक्षिण की अधिक सशक्त भागीदारी से जोड़ता है।
- आर्थिक शक्ति: भारत क्रय शक्ति समता के आधार पर विश्व की शीर्ष तीन अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। अनुमान के अनुसार वर्ष 2026 में भारत का सकल घरेलू उत्पाद क्रय शक्ति समता के आधार पर लगभग 20 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर है।
- भारत वैश्विक व्यापार प्रवाह, प्रौद्योगिकी आपूर्ति शृंखलाओं, ऊर्जा बाजारों एवं विकास वित्त को प्रभावित करने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था है।
- सैन्य क्षमता: भारत की सशस्त्र सेनाएँ विश्व की सबसे बड़ी सेनाओं में शामिल हैं और भारत प्रमुख रक्षा व्यय करने वाले देशों में से एक है। वर्ष 2026 में भारत का रक्षा बजट बढ़कर लगभग 86 अरब अमेरिकी डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया है।
- भारत वर्तमान में विश्व के उन कुछ देशों में शामिल है जिनके पास विश्वसनीय परमाणु त्रिस्तरीय क्षमता है।
- अंतरराष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा में योगदान: 1948 से भारत संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना अभियानों में सबसे बड़े सैन्य एवं कार्मिक योगदानकर्ताओं में रहा है। इसके बावजूद शांति स्थापना अभियानों में भारत के अनेक कर्मियों ने अपने प्राणों की आहुति दी है।
- यह बहुपक्षवाद के प्रति भारत की प्रतिबद्धता तथा संयुक्त राष्ट्र के अधिदेशों के समर्थन के लिए उसकी तत्परता को दर्शाता है।
- वैश्विक दक्षिण की आवाज: भारत ने अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन, वैश्विक जैव ईंधन गठबंधन, जी-20 की अध्यक्षता तथा वैश्विक दक्षिण से संबंधित कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रभाव शिखर सम्मेलन जैसे विभिन्न मंचों के माध्यम से नेतृत्वकारी भूमिका प्रदर्शित की है।
- समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में हिंद महासागर में भारत की भूमिका नौवहन की स्वतंत्रता तथा समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय और अंतरराष्ट्रीय समुद्र विधि अधिकरण जैसी संस्थाओं के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
- ब्रिक्स का समर्थन: ब्रिक्स के नई दिल्ली घोषणा-पत्र में संयुक्त राष्ट्र में व्यापक सुधारों का आह्वान किया गया, जिसमें सुरक्षा परिषद में सुधार भी शामिल है, ताकि इसे अधिक लोकतांत्रिक, प्रतिनिधित्वपरक, प्रभावी एवं दक्ष बनाया जा सके।
- चीन एवं रूस, जो सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं, ने भारत एवं ब्राजील की संयुक्त राष्ट्र, विशेषकर सुरक्षा परिषद में अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की आकांक्षाओं के प्रति समर्थन दोहराया।
सुधार की चुनौतियाँ
- जटिल संशोधन प्रक्रिया: किसी भी सुधार के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा के दो-तिहाई बहुमत की स्वीकृति तथा सभी पाँच स्थायी सदस्यों द्वारा उसका अनुसमर्थन आवश्यक है। इससे संस्थागत सुधार अत्यंत कठिन हो जाता है।
- कॉफी क्लब: सहमति के लिए एकजुटता समूह अथवा कॉफी क्लब 1990 के दशक में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीटों के संभावित विस्तार के विरोध में विकसित हुआ एक समूह है।
- इटली के नेतृत्व में इसका उद्देश्य जी-4 देशों—ब्राजील, जर्मनी, भारत एवं जापान द्वारा स्थायी सदस्यता के लिए प्रस्तुत दावों का विरोध करना है।
- नए सदस्यों के लिए वीटो का प्रश्न: सुरक्षा परिषद के विस्तारित स्थायी सदस्यों को भी वीटो शक्ति प्रदान की जानी चाहिए या नहीं, इस संबंध में अभी तक व्यापक सहमति नहीं बन पाई है।
निष्कर्ष
- भारत को ऐसे अधिक प्रतिनिधित्वपरक एवं समावेशी बहुपक्षीय तंत्र का समर्थन जारी रखना चाहिए, जिसमें विकासशील देशों को वैश्विक निर्णय-निर्माण में सार्थक भूमिका प्राप्त हो।
- वर्तमान “विशेषाधिकार की पिरामिडीय संरचना” को “साझेदारी के मंच” में परिवर्तित किया जाना चाहिए, जहाँ प्रत्येक देश को वैश्विक नियमों एवं संस्थाओं के निर्माण में अपनी आवाज रखने तथा उसमें सार्थक भागीदारी का अवसर प्राप्त हो।
Source: IE
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