पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- भारत का नारियल क्षेत्र देश की कृषि अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक परंपराओं में सुदृढ़ता से जुड़ा हुआ है। यह क्षेत्र धीरे-धीरे मुख्यतः पारंपरिक कृषि गतिविधि से आगे बढ़कर एक विविधीकृत और निर्यातोन्मुख उद्योग के रूप में विकसित हो रहा है।
नारियल के बारे में
- नारियल को प्रायः “कल्पवृक्ष” या “जीवन-वृक्ष” कहा जाता है, क्योंकि इसके पौधे के लगभग प्रत्येक भाग का आर्थिक अथवा व्यावहारिक उपयोग होता है।
- पौधे का प्रकार: नारियल एक बहुवर्षीय बागान फसल है तथा अरेकेसी(Arecaceae) कुल से संबंधित एक एकबीजपत्री ताड़ प्रजाति है।
- नारियल मूलतः हिंद-प्रशांत क्षेत्र का पौधा है और इसकी उत्पत्ति सामान्यतः दक्षिण-पूर्व एशिया से मानी जाती है।
- जलवायु संबंधी आवश्यकताएँ: नारियल की इष्टतम वृद्धि के लिए उष्ण और आर्द्र उष्णकटिबंधीय जलवायु आवश्यक होती है। यह 25°C से 30°C के बीच तापमान वाले क्षेत्रों में अच्छी तरह बढ़ता है तथा उच्च और समान रूप से वितरित वर्षा की आवश्यकता होती है।
- मृदा संबंधी आवश्यकताएँ: नारियल की खेती के लिए अच्छी जल-निकासी वाली बलुई दोमट, जलोढ़, लैटेराइट तथा तटीय मृदाएँ अनुकूल होती हैं।
आर्थिक एवं आजीविका संबंधी महत्त्व
- भारत वैश्विक नारियल अर्थव्यवस्था में एक प्रमुख स्थान रखता है। देश उत्पादन में प्रथम तथा कृषि क्षेत्रफल में तीसरे स्थान पर है। वैश्विक कुल उत्पादन और क्षेत्रफल में भारत की हिस्सेदारी क्रमशः 31.24 प्रतिशत और 17.90 प्रतिशत है।

- भारत में नारियल क्षेत्र लगभग 3 करोड़ लोगों की आजीविका का समर्थन करता है, जिनमें लगभग 1 करोड़ किसान शामिल हैं।
- निर्यात क्षमता: वर्ष 2025-26 में भारत से नारियल उत्पादों का निर्यात ₹7,038.35 करोड़ तक पहुँच गया, जो विगत वर्ष की तुलना में 62 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है।

सरकारी पहल
- खोपरा के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP): खोपरा, अर्थात नारियल की सूखी गिरी, उन 22 अनिवार्य कृषि फसलों में शामिल है, जिन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था के अंतर्गत कवर किया जाता है।
- नारियल संवर्धन योजना: कीट प्रकोप, जड़ गलन रोग तथा पुराने हो चुके बागानों की समस्या से निपटने के लिए केंद्रीय बजट 2026-27 में नारियल संवर्धन योजना की घोषणा की गई। इस योजना का उद्देश्य नारियल के उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि करना है।
- नारियल विकास बोर्ड (CDB): कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अधीन 1981 में स्थापित नारियल विकास बोर्ड नारियल की खेती और नारियल उद्योग के समग्र विकास के लिए संस्थागत सहायता प्रदान करता है। यह 22 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में कार्य करता है।
- गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री के उत्पादन को समर्थन देने वाली अन्य योजनाएँ:
- न्यूक्लियस नारियल बीज उद्यान की स्थापना:उच्च गुणवत्ता वाले नारियल पौधों और उन्नत किस्मों के उत्पादन के लिए नारियल बीज उद्यानों की स्थापना को सहायता प्रदान की जाती है।
- लघु नारियल नर्सरी की स्थापना: सार्वजनिक और निजी नर्सरियों की स्थापना के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण नारियल पौधों के उत्पादन को बढ़ावा दिया जाता है। वर्ष 2025-26 के दौरान कुल 1.06 लाख पौधों की वार्षिक उत्पादन क्षमता वाली 12 नई नर्सरियों की स्थापना के लिए सहायता प्रदान की गई।
- नारियल नर्सरियों का प्रत्यायन एवं रेटिंग: नर्सरियों के प्रत्यायन और गुणवत्ता मूल्यांकन के माध्यम से वास्तविक एवं उच्च गुणवत्ता वाली रोपण सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित की जाती है।
चुनौतियाँ
- सुदृढ़ उत्पादन आधार के बावजूद, नारियल क्षेत्र को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है:
- पुराने और लगातार घटते नारियल बागान;
- कीट एवं रोगों का प्रकोप, जिसमें जड़ गलन रोग भी शामिल है;
- कुछ क्षेत्रों में यंत्रीकरण का निम्न स्तर;
- अधिक मूल्य संवर्धन और प्रसंस्करण क्षमता की आवश्यकता;
- मूल्य में उतार-चढ़ाव, जिससे किसानों की आय प्रभावित होती है;
- उच्च-मूल्य वाले वैश्विक बाजारों में भारत की स्थिति को सुदृढ़ करने की आवश्यकता।
आगे की राह
- अधिक उपज देने वाली और रोग-प्रतिरोधी रोपण सामग्री को बढ़ावा देना।
- पुराने बागानों के पुनरुद्धार और पुनःरोपण को सुदृढ़ करना।
- किसानों की आय में विविधता लाने के लिए एकीकृत एवं बहु-स्तरीय कृषि प्रणालियों को प्रोत्साहित करना।
- खेत और स्थानीय उद्यम स्तर पर प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन का विस्तार करना।
- प्रौद्योगिकी, यंत्रीकरण तथा फसलोत्तर अवसंरचना तक किसानों की पहुँच में सुधार करना।
- गुणवत्ता मानकों, ब्रांडिंग और बाजार विविधीकरण के माध्यम से निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता को सुदृढ़ करना।
स्रोत: PIB
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