पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन
संदर्भ
- केंद्र सरकार ने अनुसूचित जातियों (SCs) और अनुसूचित जनजातियों (STs) के आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ की अवधारणा लागू करने की मांग का विरोध किया है।
पृष्ठभूमि
- सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाएँ दायर की गई थीं, जिनमें अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की तरह अनुसूचित जातियों (SCs) और अनुसूचित जनजातियों (STs) के आरक्षित वर्गों में क्रीमी लेयर को बाहर करने की व्यवस्था की मांग की गई थी।
- न्यायालय ने 2024 के उस सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद केंद्र सरकार से कार्रवाई रिपोर्ट दाखिल करने को भी कहा था, जिसने SCs और STs के अंदर उप-वर्गीकरण का मार्ग प्रशस्त किया था।
सरकार का पक्ष
- ऐतिहासिक वंचना: SCs को अस्पृश्यता की प्रथा से उत्पन्न ऐतिहासिक वंचनाओं का सामना करना पड़ा है।
- इसी प्रकार, STs की पहचान उनकी “विशिष्ट संस्कृतियों, भौगोलिक अलगाव और पिछड़ेपन” के आधार पर की जाती है।
- इसके विपरीत, OBCs की पहचान मुख्यतः सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक वंचनाओं के संयोजन के आधार पर की जाती है।
- SCs और STs के लिए आरक्षण का मुख्य उद्देश्य सामाजिक समानता और न्याय प्राप्त करना, ऐतिहासिक भेदभाव को दूर करना तथा सार्वजनिक जीवन में समावेशी भागीदारी सुनिश्चित करना है।
- संबंधित सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय: 1992 के इंद्रा साहनी निर्णय में, जिसमें मंडल आयोग की रिपोर्ट के कार्यान्वयन को बरकरार रखा गया था, सर्वोच्च न्यायालय ने क्रीमी लेयर की कसौटी को मान्यता दी।
- इस निर्णय में क्रीमी लेयर की अवधारणा को OBCs तक सीमित रखा गया और कहा गया कि इसका “अनुसूचित जनजातियों और अनुसूचित जातियों के मामले में कोई प्रासंगिकता नहीं है।”
- सरकार ने 2008 के अशोक कुमार ठाकुर मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि क्रीमी लेयर का सिद्धांत SCs और STs पर लागू नहीं होता है।
- शक्तियों का पृथक्करण: संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 के तहत राष्ट्रपति SCs और STs की प्रारंभिक सूचियों को अधिसूचित करते हैं।
- एक बार अधिसूचित होने के बाद, इन सूचियों में किसी भी समुदाय को शामिल या बाहर करने का कार्य केवल संसद के अधिनियम द्वारा किया जा सकता है।
- राज्य सरकारों, न्यायालयों, न्यायाधिकरणों या किसी अन्य प्राधिकरण को इन सूचियों में संशोधन, परिवर्तन या फेरबदल करने का अधिकार नहीं है।
भारत में आरक्षण
- वर्तमान निर्देशों के अनुसार, अखिल भारतीय स्तर पर खुली प्रतियोगिता के माध्यम से सीधी भर्ती के मामले में अनुसूचित जातियों (SCs), अनुसूचित जनजातियों (STs) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBCs) को क्रमशः 15%, 7.5% और 27% आरक्षण प्रदान किया जाता है।
- संविधान (103वाँ संशोधन) अधिनियम, 2019 राज्य अर्थात केंद्र और राज्य दोनों सरकारों को समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) के लिए आरक्षण प्रदान करने में सक्षम बनाता है।
क्रीमी लेयर सिद्धांत
- यह एक ऐसी अवधारणा है, जिसका उपयोग यह सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है कि शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ किसी विशेष समूह के अंदर आर्थिक और सामाजिक रूप से वंचित लोगों तक पहुँचे।
- इसका उद्देश्य आरक्षित वर्ग के अपेक्षाकृत समृद्ध या अधिक लाभान्वित सदस्यों को इन लाभों का बार-बार लाभ उठाने से रोकना है।
- उत्पत्ति: इस अवधारणा को प्रथम बार भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 1992 के इंद्रा साहनी मामले, जिसे मंडल आयोग मामला भी कहा जाता है, में स्पष्ट रूप से स्थापित किया था।
- न्यायालय के निर्णय में इस बात पर जोर दिया गया कि OBC श्रेणी के अंदर अपेक्षाकृत अधिक विशेषाधिकार प्राप्त लोगों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए।
- प्रभाव: क्रीमी लेयर सिद्धांत को लागू करके सरकार का उद्देश्य अपनी सकारात्मक कार्रवाई की नीतियों को अधिक प्रभावी और न्यायसंगत बनाना है, ताकि सबसे अधिक आवश्यकता वाले लोगों को उनके लिए निर्धारित सहायता प्राप्त हो सके।
आरक्षण से संबंधित संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 16: यह सभी नागरिकों के लिए अवसर की समानता का प्रावधान करता है। हालांकि, इसके अपवाद के रूप में राज्य ऐसे किसी पिछड़े वर्ग के पक्ष में नियुक्तियों या पदों में आरक्षण का प्रावधान कर सकता है, जिसका राज्य की सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है।
- अनुच्छेद 16(4A): यह प्रावधान करता है कि यदि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों का राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है, तो राज्य उनके पक्ष में पदोन्नति के मामलों में आरक्षण का प्रावधान कर सकता है।
- अनुच्छेद 335: यह मान्यता देता है कि SCs और STs के सेवाओं एवं पदों से संबंधित दावों पर विचार करने के लिए विशेष उपाय अपनाने की आवश्यकता है, ताकि उन्हें अन्य वर्गों के समकक्ष लाया जा सके।
- संविधान का 103वाँ संशोधन: इस संशोधन द्वारा समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) के लिए 10% आरक्षण का प्रावधान किया गया।
अनुसूचित जातियों (SCs) के उप-वर्गीकरण पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय
- 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने 6:1 के बहुमत से अनुसूचित जाति की श्रेणी के अंदर उप-वर्गीकरण की वैधता को बरकरार रखा। इस निर्णय में पाँच न्यायाधीशों की पीठ द्वारा ई.वी. चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2004) मामले में दिए गए निर्णय को पलट दिया गया।
- न्यायालय ने कहा कि SCs/STs के अंदर क्रीमी लेयर की पहचान के लिए निर्धारित मानदंड अन्य पिछड़ा वर्ग (OBCs) के लिए उपयोग किए जाने वाले मानदंडों से अलग होने चाहिए।
- 2024 के निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय के तर्क:
- अनुच्छेद 14 के अंतर्गत समानता का अर्थ समान स्थिति वाले व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार करना है, लेकिन यह राज्य को अलग-अलग स्थिति वाले समूहों का वर्गीकरण करने की अनुमति देता है।
- यदि कोई आरक्षित वर्ग, जैसे अनुसूचित जाति, आंतरिक रूप से एकसमान नहीं है, तो लाभों के न्यायसंगत वितरण के लिए राज्य उसके अंदर छोटे समूह बना सकता है।
- समरूप नहीं: राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित सूची एक कानूनी अवधारणा है, जिसका उपयोग वंचित समूहों की पहचान के लिए किया जाता है; यह आवश्यक रूप से एक समरूप वर्ग नहीं है।
- SC सूची में शामिल होना लक्षित लाभ प्रदान करने के लिए आगे वर्गीकरण किए जाने से रोकता नहीं है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि उप-वर्गीकरण निम्नलिखित आधारों पर होना चाहिए:
- मात्रात्मक एवं विश्वसनीय आँकड़े;
- अधिक वंचित होने का प्रमाण;
- सार्वजनिक सेवाओं में अपर्याप्त और अप्रभावी प्रतिनिधित्व के साक्ष्य।
- राज्यों को मनमाने वर्गीकरण से बचना होगा तथा वर्गीकरण के पीछे तर्क और अनुभवजन्य साक्ष्य प्रस्तुत करने होंगे।
- केवल संख्यात्मक उपस्थिति के बजाय प्रभावी प्रतिनिधित्व महत्वपूर्ण है।
आगे की राह
- संवैधानिक सीमाओं के अंदर : यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उप-वर्गीकरण अनुच्छेद 14, 15(4) और 16(4) के अनुरूप रहे तथा अनुच्छेद 341 के अंतर्गत राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित सूची में कोई परिवर्तन न हो।
- क्रीमी लेयर की प्रयोज्यता का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन: यदि SCs/STs पर क्रीमी लेयर लागू की जाती है, तो OBCs से अलग मानदंड निर्धारित किए जाने चाहिए और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इससे इन समूहों के लिए उपलब्ध ऐतिहासिक संवैधानिक सुरक्षा कमजोर न हो।
- सामाजिक उत्थान के उपायों का सुदृढ़ीकरण: आरक्षण के साथ लक्षित शिक्षा, कौशल विकास, उद्यमिता सहायता और भेदभाव-विरोधी कानूनों के प्रभावी प्रवर्तन जैसे उपायों को जोड़ा जाना चाहिए।
- सामाजिक समरसता को प्रोत्साहन : नीतिगत परिवर्तनों के साथ जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए, ताकि SC समुदायों के अंदर विभाजन को रोका जा सके और सामूहिक सामाजिक उत्थान की भावना को बनाए रखा जा सके।
स्रोत: IE
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