पाठ्यक्रम: जीएस-2/ शासन, जीएस-3/ अर्थव्यवस्था
सन्दर्भ
- गृह मंत्रालय (MHA) के अनुसार, भारत ने 2019 से 2026 के बीच 36 देशों से 274 भगोड़े अपराधियों को वापस लाया है।
भगोड़ा आर्थिक अपराधी (FEO) क्या है?
भगोड़ा आर्थिक अपराधी (FEO) वह व्यक्ति है –
- जिसके विरुद्ध ₹100 करोड़ या उससे अधिक के अनुसूचित आर्थिक अपराध (Scheduled Economic Offence) के लिए गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया हो; तथा
- जो आपराधिक अभियोजन से बचने के लिए भारत छोड़कर चला गया हो या कानूनी प्रक्रिया का सामना करने के लिए भारत लौटने से इंकार करता हो।
- इसकी परिभाषा भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम, 2018 के अंतर्गत दी गई है।
- धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (PMLA) के तहत नियुक्त निदेशक या उप-निदेशक किसी व्यक्ति को भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित करने के लिए विशेष न्यायालय (जो PMLA, 2002 के अंतर्गत नामित है) के समक्ष आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं।
भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम, 2018 की प्रमुख विशेषताएँ
- संपत्ति की जब्ती (Confiscation of Property): यह अधिनियम अधिकारियों को अपराधी की भारत और विदेश में स्थित संपत्तियों को कुर्क एवं जब्त करने का अधिकार देता है।
- यह कानून बेनामी संपत्तियों तथा अपराधी द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रित परिसंपत्तियों को भी शामिल करता है।
- दीवानी दावों पर प्रतिबंध (Bar on Civil Claims): घोषित भगोड़ा आर्थिक अपराधी भारतीय न्यायालयों में कोई दीवानी दावा न तो दायर कर सकता है और न ही उसका बचाव कर सकता है।
- विशेष न्यायालय व्यवस्था (Special Court Mechanism): अधिनियम के अंतर्गत मामलों का निपटारा धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 के तहत स्थापित विशेष न्यायालयों द्वारा किया जाता है।
प्रत्यर्पण (Extradition) क्या है?
- प्रत्यर्पण विदेशी देशों से भगोड़ों की समयबद्ध वापसी के लिए मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय तंत्र है।
- इसे उस प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया जाता है, जिसमें जिस देश में कोई अभियुक्त या दोषी व्यक्ति पाया जाता है, वह उसे उस देश को सौंप देता है जिसने उसके प्रत्यर्पण का अनुरोध किया है।
- यह प्रक्रिया संधियों एवं समझौतों द्वारा संचालित होती है, जो भगोड़ों के प्रत्यर्पण के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त कानूनी सिद्धांतों को अपनाते हैं।
प्रत्यर्पण से संबंधित संस्थागत ढाँचा
- केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI), भारत के इंटरपोल राष्ट्रीय केंद्रीय ब्यूरो (NCB) के रूप में कार्य करते हुए, इंटरपोल नोटिस जारी करता है तथा भगोड़ों का पता लगाने के लिए विदेशी पुलिस एजेंसियों के साथ समन्वय करता है।
- विदेश मंत्रालय (MEA) प्रत्यर्पण एवं पारस्परिक कानूनी सहायता (Mutual Legal Assistance) से संबंधित कूटनीतिक मामलों का प्रबंधन करता है।
- भारत के लगभग 48 देशों के साथ प्रत्यर्पण संधियाँ तथा 12 देशों के साथ प्रत्यर्पण संबंधी व्यवस्थाएँ हैं।
- पारस्परिक कानूनी सहायता संधि (MLAT): यह एक ऐसा तंत्र है जिसके माध्यम से देश अपराधों की रोकथाम, दमन, जाँच एवं अभियोजन में एक-दूसरे को औपचारिक कानूनी सहायता प्रदान करते हैं।
- उद्देश्य: यह सुनिश्चित करना कि विभिन्न देशों में उपलब्ध साक्ष्यों के अभाव के कारण अपराधी कानून की उचित प्रक्रिया से बच न सकें या उसे विफल न कर सकें।
- लेटर्स रोगेटरी (Letters Rogatory–LRs): ये भारतीय न्यायालय द्वारा विदेशी न्यायालय को न्यायिक सहायता, जैसे साक्ष्य एकत्र करने या समन तामील कराने के लिए भेजे जाने वाले औपचारिक अनुरोध होते हैं।
- यह प्रक्रिया कूटनीतिक माध्यमों से होती है और सामान्यतः MLAT की तुलना में अधिक समय लेती है।
- भारत में प्रत्यर्पण प्रत्यर्पण अधिनियम, 1962 द्वारा नियंत्रित होता है, जो संधियों अथवा कार्यकारी व्यवस्थाओं के अंतर्गत भगोड़ों को सौंपने या प्राप्त करने का कानूनी आधार प्रदान करता है।
भारत निम्नलिखित बहुपक्षीय अभिसमयों का भी पक्षकार है—
- भ्रष्टाचार के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र अभिसमय तथा
- अंतर्राष्ट्रीय संगठित अपराध के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र अभिसमय।
प्रत्यर्पण में संरचनात्मक चुनौतियाँ
- विदेशी न्यायालयों द्वारा न्यायिक परीक्षण: विदेशी न्यायालय प्रत्यर्पण अनुरोधों, जेलों की स्थिति तथा अनुरोध करने वाले देश में मानवाधिकार सुरक्षा उपायों का स्वतंत्र रूप से परीक्षण करते हैं।
- ऐसे परीक्षण अक्सर भारत के प्रत्यर्पण अनुरोधों से संबंधित कार्यवाही को लंबा कर देते हैं या उसमें बाधा उत्पन्न करते हैं।
- शरण एवं राजनीतिक संरक्षण के दावे: अनेक भगोड़े राजनीतिक उत्पीड़न का दावा करते हैं या मेज़बान देशों में शरण माँगते हैं, जिससे आपराधिक कार्यवाही जटिल कानूनी एवं मानवीय विवादों में बदल जाती है।
- कुछ देशों के साथ प्रत्यर्पण संधियों का अभाव: अनेक भगोड़े ऐसे देशों में रहते हैं जिनके साथ भारत की प्रत्यर्पण संधि नहीं है, जिससे उनकी वापसी सुनिश्चित करने की भारत की क्षमता सीमित हो जाती है।
- पुरानी संधि संरचनाएँ: कई पुरानी संधियाँ सीमित अपराध सूची (Restrictive List System) पर आधारित हैं, जिनमें साइबर अपराध तथा जटिल वित्तीय धोखाधड़ी जैसे आधुनिक अपराध शामिल नहीं हैं।
शासन एवं सुरक्षा संबंधी प्रभाव
- विधि के शासन पर प्रभाव: कम प्रत्यर्पण दर आर्थिक एवं अंतरराष्ट्रीय अपराधों के विरुद्ध निवारक प्रभाव को कमजोर करती है तथा अपराधियों को विदेश भागकर घरेलू कानूनी प्रक्रिया से बचने के लिए प्रोत्साहित करती है।
- आंतरिक सुरक्षा एवं वित्तीय अखंडता: प्रत्यर्पण में देरी से धन शोधन, भ्रष्टाचार तथा संगठित अपराधों से निपटने के भारत के प्रयास प्रभावित होते हैं और आपराधिक न्याय प्रणाली में जनता का विश्वास भी कमजोर पड़ता है।
सरकारी पहल
- भारतपोल (BHARATPOL): सरकार ने भारतपोल की शुरुआत की, जिसने 1,400 से अधिक एजेंसियों को इंटरपोल से जोड़ा और सूचना साझा करने में लगने वाले समय को घटाकर 3 से 10 दिन कर दिया।
- प्रौद्योगिकी का उपयोग: सरकार ने ऑपरेशन त्रिशूल के अंतर्गत नाम और पहचान बदलकर विदेशों में छिपे भगोड़े अपराधियों का पता लगाने के लिए उपग्रह प्रौद्योगिकी एवं डिजिटल फुटप्रिंट का उपयोग किया।
- आपराधिक कानूनों में प्रावधान: सरकार ने तीन नए आपराधिक कानून लागू किए, जिनमें भगोड़े अपराधियों से संबंधित विशेष प्रावधान शामिल किए गए।
- पहली बार भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 355 एवं 356 में अनुपस्थिति में मुकदमे (Trial in Absentia) का प्रावधान किया गया है, जिससे भगोड़े अभियुक्त की अनुपस्थिति में भी मुकदमे से लेकर अभियोजन तक पूरी न्यायिक प्रक्रिया पूरी की जा सकती है।
- स्थायी फोकस समूह (Standing Focus Group): वर्ष 2026 में खुफिया ब्यूरो (IB) के मल्टी एजेंसी सेंटर (MAC) के अंतर्गत एक स्थायी फोकस समूह का गठन भारत के भगोड़ा प्रबंधन ढाँचे को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संस्थागत कदम है।
- यह समूह भगोड़ा मामलों को प्राथमिकता देने, दस्तावेज़ों का मानकीकरण करने, सूचना संबंधी कमियों को दूर करने, विदेशी भागीदारों के साथ निरंतर समन्वय बनाए रखने तथा राज्य एजेंसियों द्वारा आरंभ किए गए मामलों को राष्ट्रीय स्तर पर सहायता प्रदान करने के लिए उत्तरदायी है।
आगे की राह
- भारत को विशेष रूप से प्रमुख वित्तीय केंद्रों वाले देशों के साथ अपने प्रत्यर्पण संधि नेटवर्क का विस्तार करना चाहिए तथा लंबित मामलों के शीघ्र निपटारे के लिए निरंतर कूटनीतिक प्रयास करने चाहिए।
- विदेशी न्यायालयों द्वारा उठाई जाने वाली चिंताओं का समाधान करने तथा भारत की प्रत्यर्पण विश्वसनीयता को मजबूत करने के लिए कारागार अवसंरचना में सुधार, समयबद्ध न्यायिक प्रक्रिया तथा प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों को और सुदृढ़ करना आवश्यक है।
स्रोत: TH