पाठ्यक्रम: जीएस-3/ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
सन्दर्भ
- पिछले तीन दशकों की वार्षिक रिपोर्टों के आँकड़ों पर आधारित विश्लेषण से पता चलता है कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) में स्वीकृत पदों की तुलना में वर्तमान में उपलब्ध कर्मचारियों की संख्या 72% है, जो हाल के वर्षों में सबसे कम स्तर है।
परिचय
- हाल के घटनाक्रमों में अभूतपूर्व विफलताएँ, प्रमुख परियोजनाओं की धीमी प्रगति, प्रतिभा पलायन की आशंकाएँ तथा स्वदेशी नवोदित स्टार्टअप के रूप में उभरती प्रतिस्पर्धा प्रमुख रही है।
हाल की विफलताएँ एवं परियोजनाओं में मंदी:
- पीएसएलवी-सी61 और पीएसएलवी-सी62 मिशनों की लगातार विफलता।
- भारत के प्रथम मानव अंतरिक्ष मिशन गगनयान के लिए प्रथम मानव रहित परीक्षण उड़ान जी1 के संचालन में विलंब।
इसरो से वैज्ञानिकों का बाहर जाना:
- इसरो के ग्रुप ‘ए’ के वैज्ञानिक एवं तकनीकी कर्मियों, जिनमें गगनयान तथा अन्य महत्त्वपूर्ण परियोजनाओं से जुड़े वैज्ञानिक भी शामिल हैं, द्वारा स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति तथा इस्तीफे के लिए आवेदन किए गए हैं।
- इससे राष्ट्रीय महत्त्व की परियोजनाओं के क्रियान्वयन पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है।
योगदान देने वाले कारक
कठोर पदानुक्रम:
- भारत की अनेक प्रयोगशालाएँ अभी भी ऐसे कठोर पदानुक्रम के अंतर्गत कार्य करती हैं, जो विश्व के अग्रणी वैज्ञानिक संस्थानों की तुलना में असामान्य प्रतीत होता है।
निजी क्षेत्र की ओर रुझान:
- शोधकर्ता निजी अनुसंधान संस्थानों, उभरती गहन-प्रौद्योगिकी (डीप-टेक) कंपनियों, विदेशी विश्वविद्यालयों तथा अंतर्राष्ट्रीय सहयोग कार्यक्रमों की ओर जा रहे हैं, जहाँ प्रशासनिक प्रतिबंधों की अपेक्षा वैज्ञानिक स्वायत्तता अधिक उपलब्ध है।
अनुसंधान एवं विकास पर कम व्यय:
- भारत का सकल अनुसंधान एवं विकास व्यय (GERD) जीडीपी के 0.6% से 0.7% के बीच रहा है, जो वैश्विक औसत तथा चीन, दक्षिण कोरिया और अमेरिका जैसे देशों से कम है।
- भारत में निजी क्षेत्र का योगदान लगभग 36% है, जबकि उपर्युक्त देशों में यह 70% से अधिक है।
आर्थिक कारक:
- विकसित देशों की तुलना में कम वेतन।
- अत्यधिक विशिष्ट कौशल वाले पेशेवरों के लिए सीमित रोजगार अवसर।
शैक्षिक एवं व्यावसायिक अवसर:
- विश्वस्तरीय अनुसंधान अवसंरचना तक सीमित पहुँच।
- विदेशों में बेहतर प्रशिक्षण, अनुभव तथा कैरियर विकास के अवसर।
- उच्च शिक्षा के लिए वैश्विक संस्थानों को प्राथमिकता।
जीवनशैली एवं जीवन की गुणवत्ता:
- विदेशों में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ, अवसंरचना तथा जीवन स्तर।
- वैश्विक पहचान एवं पेशेवर नेटवर्किंग के बेहतर अवसर
सरकारी पहल
अनुसंधान, विकास एवं नवाचार (आरडीआई) योजना:
- 1 लाख करोड़ रुपये की निधि के साथ स्वीकृत इस योजना का उद्देश्य निजी क्षेत्र के अनुसंधान एवं विकास तथा गहन-प्रौद्योगिकी स्टार्टअप को प्रोत्साहित करना है।
- इसके अंतर्गत दीर्घकालिक, कम अथवा शून्य ब्याज वाले ऋण, इक्विटी निवेश तथा अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान प्रतिष्ठान (एएनआरएफ) के माध्यम से एक नए डीप-टेक फंड ऑफ फंड्स की व्यवस्था की गई है।
अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान प्रतिष्ठान (एएनआरएफ):
- वर्ष 2023 में स्थापित यह प्रतिष्ठान विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अनुसंधान, नवाचार तथा उद्यमिता के लिए उच्च स्तरीय रणनीतिक दिशा प्रदान करता है।
- इसका लक्ष्य 2023–28 के दौरान 50,000 करोड़ रुपये विभिन्न स्रोतों—एएनआरएफ निधि, नवाचार निधि, विज्ञान एवं अभियांत्रिकी अनुसंधान निधि तथा विशेष प्रयोजन निधियों—के माध्यम से जुटाना है।
राष्ट्रीय भू-स्थानिक नीति, 2022:
- इसका उद्देश्य वर्ष 2035 तक भारत को भू-स्थानिक क्षेत्र में वैश्विक अग्रणी बनाना है।
- यह भू-स्थानिक आँकड़ों तक पहुँच को उदार बनाती है तथा शासन, व्यापार एवं अनुसंधान में उनके उपयोग को प्रोत्साहित करती है।
भारतीय अंतरिक्ष नीति, 2023:
- यह वर्ष 2020 में किए गए अंतरिक्ष क्षेत्र के सुधारों पर आधारित है, जिनके तहत गैर-सरकारी संस्थाओं को अंतरिक्ष गतिविधियों में पूर्ण भागीदारी की अनुमति दी गई।
- इसका उद्देश्य अंतरिक्ष क्षमताओं को बढ़ाना, वाणिज्यिक अंतरिक्ष उद्योग को प्रोत्साहित करना तथा सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र के बीच सहयोग को सुदृढ़ करना है।
राष्ट्रीय क्वांटम मिशन:
- वर्ष 2023–31 के लिए 6,003.65 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, ताकि वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान एवं विकास के माध्यम से क्वांटम प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा दिया जा सके।
बायो-ई3 नीति, 2024:
- यह जैव-विनिर्माण एवं जैव-कृत्रिम बुद्धिमत्ता केंद्रों तथा राष्ट्रीय जैव-फाउंड्री नेटवर्क की स्थापना को प्रोत्साहित करती है, जिससे प्रौद्योगिकी विकास एवं व्यावसायीकरण में तेजी आए।
राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन (एनएसएम):
- वर्ष 2015 में प्रारंभ इस मिशन के अंतर्गत विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों तथा सरकारी एजेंसियों को राष्ट्रीय ज्ञान नेटवर्क से जुड़े अत्याधुनिक सुपरकंप्यूटर उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
भारत सेमीकंडक्टर मिशन (आईएसएम):
- वर्ष 2021 में स्थापित इस मिशन का उद्देश्य सेमीकंडक्टर एवं डिस्प्ले विनिर्माण का सुदृढ़ पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना है।
- भारत छह राज्यों में 10 सेमीकंडक्टर परियोजनाओं को स्वीकृति दे चुका है, जिनमें ओडिशा की पहली वाणिज्यिक सिलिकॉन कार्बाइड निर्माण इकाई भी शामिल है।
इंडियाएआई मिशन:
- यह “भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का विकास तथा भारत के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग” की परिकल्पना पर आधारित है।
- इस मिशन के अंतर्गत संगणन क्षमता को 10,000 जीपीयू के प्रारंभिक लक्ष्य से बढ़ाकर 38,000 जीपीयू कर दिया गया है, जिससे स्टार्टअप, शोधकर्ताओं तथा उद्योगों के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता अवसंरचना अधिक सुलभ हुई है।
अटल नवाचार मिशन (एआईएम):
- छात्रों, स्टार्टअप तथा उद्यमियों को सहायता प्रदान कर जमीनी स्तर पर नवाचार को बढ़ावा देना इसका उद्देश्य है।
निष्कर्ष
- भारत को वैज्ञानिक संस्थानों में प्रशासनिक पारदर्शिता बढ़ानी चाहिए तथा शिकायतों के प्रभावी निवारण के लिए सुदृढ़ व्यवस्था विकसित करनी चाहिए।
- प्रतिभाओं को वापस लाना केवल पहला कदम है; भारत को ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना होगा जहाँ उत्कृष्ट प्रतिभाएँ मजबूत संस्थानों, शैक्षणिक स्वायत्तता, पर्याप्त वित्तपोषण तथा नए एवं चुनौतीपूर्ण विचारों के प्रति खुले दृष्टिकोण के साथ विकसित हो सकें।
स्रोत: IE
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संक्षिप्त समाचार 05-08-2026