पाठ्यक्रम: जीएस-2/ स्वास्थ्य से संबंधित विषय
सन्दर्भ
- स्वास्थ्य के लिए विकास सहायता (Development Assistance for Health-DAH) में वैश्विक कटौती, बढ़ता सार्वजनिक ऋण तथा स्वास्थ्य बजट के अपर्याप्त उपयोग को लेकर चिंताओं ने भारत सहित अन्य विकासशील देशों में सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों की दक्षता और सुशासन में सुधार पर पुनः ध्यान केंद्रित किया है।
भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली का परिचय
- भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली तीन-स्तरीय स्वास्थ्य सेवा संरचना पर आधारित है, अर्थात् उप-केंद्र/स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्र (HWC), प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC), सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC), जिला अस्पताल तथा तृतीयक स्वास्थ्य संस्थान।
- इसका मार्गदर्शन राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (2017) द्वारा किया जाता है तथा इसका कार्यान्वयन मुख्य रूप से राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के माध्यम से किया जाता है।
प्रमुख विशेषताएँ:
- राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM): बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, रोग नियंत्रण तथा स्वास्थ्य अवसंरचना को सुदृढ़ करता है।
- आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत आयुष्मान भारत-स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्र (AB-HWC) समेकित प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करते हैं।
- प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PM-JAY): द्वितीयक एवं तृतीयक उपचार हेतु प्रति परिवार ₹5 लाख तक का स्वास्थ्य बीमा कवरेज प्रदान करती है।
- डिजिटल स्वास्थ्य पहल: आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (ABDM) का उद्देश्य एक डिजिटल स्वास्थ्य पारिस्थितिकी तंत्र का विकास करना है।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO)-भारत साझेदारी: सुशासन, स्वास्थ्य कार्यबल विकास, निगरानी तथा सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) में सुधार के माध्यम से स्वास्थ्य प्रणाली को सुदृढ़ करती है।
सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली से जुड़ी चिंताएँ एवं समस्याएँ
- सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए अपर्याप्त वित्तपोषण: सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय का प्रतिशत अभी भी लगभग 2% है, जो राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति द्वारा निर्धारित 2.5% के लक्ष्य से कम है।
- यद्यपि जीडीपी हिस्सेदारी के संदर्भ में अंतर कम हो रहा है, फिर भी निम्न एवं मध्यम आय वाले देशों (LMIC) में प्रति व्यक्ति सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय उच्च आय वाले देशों की तुलना में काफी कम है।
- बाह्य स्वास्थ्य सहायता में गिरावट: स्वास्थ्य के लिए विकास सहायता (DAH), जो कोविड-19 के दौरान अपने उच्चतम स्तर पर पहुँची थी, अब तेजी से घट रही है।
- संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस तथा जर्मनी जैसे प्रमुख योगदानकर्ताओं ने विदेशी स्वास्थ्य सहायता में कटौती की है, जिससे विश्वभर की स्वास्थ्य परियोजनाएँ प्रभावित हुई हैं।
- बजट का कमजोर उपयोग: अनेक निम्न एवं मध्यम आय वाले देशों में स्वास्थ्य बजट का केवल 85–90% ही व्यय हो पाता है, जो शिक्षा जैसे क्षेत्रों की तुलना में कम है।
- भारत में स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन के अंतर्गत आवंटित धनराशि का बड़ा हिस्सा खर्च नहीं हो सका।
- वर्ष 2024-25 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत संचारी एवं गैर-संचारी रोग कार्यक्रमों के लिए आवंटित निधि का केवल 26% ही उपयोग किया गया।
- असंतुलित व्यय पैटर्न: द्वितीयक एवं तृतीयक उपचारात्मक स्वास्थ्य सेवाओं पर अधिक व्यय किया जाता है।
- निवारक एवं बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं को अभी भी तुलनात्मक रूप से कम वित्तपोषण प्राप्त होता है।
- निवारक स्वास्थ्य उपायों के रूप में टीकाकरण, स्वच्छता, निगरानी तथा स्वास्थ्य संवर्धन को लगातार कम प्राथमिकता दी जाती रही है।
- सुशासन संबंधी चुनौतियाँ: कमजोर सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन, धनराशि जारी करने में विलंब, खरीद प्रक्रिया में अक्षमता, राज्य एवं जिला स्तर पर क्षमता की कमी, भ्रष्टाचार तथा प्रशासनिक अक्षमताएँ सार्वजनिक व्यय की प्रभावशीलता को कम करती हैं।
- उभरती स्वास्थ्य चुनौतियाँ: गैर-संचारी रोगों (NCD) का बढ़ता बोझ, वृद्ध होती जनसंख्या, जलवायु-संवेदनशील रोग तथा महामारी से निपटने की तैयारी की आवश्यकता।
संबंधित प्रयास एवं पहल
- प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने हेतु राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM)।
- आयुष्मान भारत (AB-PMJAY एवं स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्र)।
- आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (ABDM)।
- प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन (PM-ABHIM), जिसका उद्देश्य रोग निगरानी, गंभीर देखभाल, प्रयोगशालाओं तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य अवसंरचना को सुदृढ़ करना है।
- चिकित्सा महाविद्यालयों तथा स्वास्थ्य कार्यबल का विस्तार।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग:
- डब्ल्यूएचओ-भारत सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC), स्वास्थ्य कार्यबल विकास, स्वास्थ्य वित्तपोषण सुधार, रोग निगरानी तथा आपातकालीन तैयारी के माध्यम से स्वास्थ्य प्रणाली को सुदृढ़ बनाने को बढ़ावा देता है।
- सतत विकास लक्ष्य (SDG)-3, वर्ष 2015 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा निर्धारित 17 सतत विकास लक्ष्यों में से एक है।
सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय को बेहतर प्राथमिकता देना
- बजट का बेहतर उपयोग: समय पर धनराशि जारी करना, व्यय की बेहतर निगरानी, कार्यान्वयन एजेंसियों की जवाबदेही तथा केंद्र एवं राज्य सरकारों के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित करना।
- उच्च प्रभाव वाले हस्तक्षेपों पर व्यय को प्राथमिकता देना: निवारक स्वास्थ्य सेवाओं, टीकाकरण, पोषण, स्वच्छता एवं साफ-सफाई, रोग निगरानी, स्वास्थ्य संवर्धन तथा गैर-संचारी रोगों की प्रारंभिक जाँच पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए।
- सार्वजनिक संसाधनों को उन क्षेत्रों में सार्वजनिक हित की सेवाओं हेतु निर्देशित किया जाना चाहिए जहाँ बाज़ार की विफलताएँ मौजूद हों, जैसे महामारी नियंत्रण एवं टीकाकरण; जबकि निजी क्षेत्र कम लागत वाली उपचारात्मक सेवाओं के रूप में पूरक भूमिका निभाए।
- सुशासन एवं दक्षता में सुधार: सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन को मजबूत करना; खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाना; धनराशि की निगरानी का डिजिटलीकरण करना; जिला स्तर के स्वास्थ्य प्रशासन को अधिक अधिकार देना; अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्य कर्मियों को योजना एवं बजट निर्माण में शामिल करना; तथा आपात स्थितियों के लिए लचीली बजट व्यवस्था विकसित करना।
आगे की राह: सुदृढ़ीकरण के उपाय
- राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के अनुरूप सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय को जीडीपी के 2.5% तक बढ़ाना।
- अत्यधिक उपचारात्मक व्यय के बजाय प्राथमिक एवं निवारक स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ावा देना।
- बजट की विश्वसनीयता, उपयोग तथा परिणाम-आधारित वित्तपोषण को सुदृढ़ करना।
- स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों को सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज की आधारशिला के रूप में मजबूत करना।
- सुदृढ़ स्वास्थ्य प्रणाली के निर्माण हेतु निगरानी, प्रयोगशालाओं, डिजिटल स्वास्थ्य तथा आपदा तैयारी में निवेश करना।
- सहकारी संघवाद को बढ़ावा देने के लिए राज्य एवं स्थानीय स्तर के सुशासन तथा क्षमताओं को सुदृढ़ करना।
- रोगों के बोझ एवं स्वास्थ्य परिणाम संकेतकों के साक्ष्य के आधार पर संसाधनों का आवंटन सुनिश्चित करना।
- समानता एवं वहनीयता सुनिश्चित करते हुए सार्वजनिक-निजी भागीदारी को बढ़ावा देना।
निष्कर्ष
- तत्काल प्राथमिकता उपलब्ध संसाधनों का अधिक दक्षतापूर्वक उपयोग करना है, जबकि स्वास्थ्य व्यय में वृद्धि भी समान रूप से आवश्यक है।
- बेहतर बजट क्रियान्वयन, निवारक स्वास्थ्य सेवाओं की ओर संसाधनों का रणनीतिक आवंटन तथा बेहतर सुशासन, सीमित बजट की स्थिति में भी स्वास्थ्य क्षेत्र में उल्लेखनीय सुधार ला सकते हैं।
- दीर्घकालिक एवं सतत निवेश तथा संस्थागत सुधार, सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) प्राप्त करने तथा भारत में एक सतत, न्यायसंगत एवं समावेशी सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के निर्माण की कुंजी होंगे।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न] केवल सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय में वृद्धि करना स्वास्थ्य परिणामों में सुधार के लिए पर्याप्त नहीं है, जब तक कि इसके साथ प्रभावी सुशासन एवं संसाधनों का रणनीतिक आवंटन न हो। भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को सुदृढ़ करने के संदर्भ में चर्चा कीजिए। |
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