पाठ्यक्रम: जीएस-3/ अर्थव्यवस्था
सन्दर्भ
- हाल ही में भारतीय रिज़र्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (BRBNMPL) ने अंतर्निहित सुरक्षा विशेषताओं वाली पॉलीमर सब्सट्रेट शीटों की आपूर्ति हेतु रुचि अभिव्यक्ति (Expression of Interest–EoI) आमंत्रित की है।
पॉलीमर बैंक नोट क्या हैं?
- ये द्विअक्षीय अभिमुखित पॉलीप्रोपाइलीन (BOPP) से बनाए जाते हैं, न कि कपास-आधारित कागज़ से।
- ऑस्ट्रेलिया वर्ष 1988 में पॉलीमर मुद्रा शुरू करने वाला विश्व का पहला देश बना। वर्तमान में यूनाइटेड किंगडम, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, सिंगापुर, मलेशिया और वियतनाम सहित 60 से अधिक देश पूर्णतः अथवा आंशिक रूप से पॉलीमर नोटों का उपयोग करते हैं।
- भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने लगभग 15 वर्ष बाद पॉलीमर (प्लास्टिक) बैंक नोटों को शुरू करने के अपने लंबे समय से लंबित प्रस्ताव को पुनः सक्रिय किया है।
भारतीय रिज़र्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (BRBNMPL) Note Mudran Pvt. Ltd. (BRBNMPL)
- यह भारतीय रिज़र्व बैंक की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी है, जिसकी स्थापना 1995 में कंपनी अधिनियम के अंतर्गत भारत की बैंक नोट मुद्रण क्षमता बढ़ाने तथा मुद्रा की सुरक्षित आपूर्ति सुनिश्चित करने के उद्देश्य से की गई थी।
- मुख्यालय: बेंगलुरु, कर्नाटक
- प्रमुख भूमिका: आरबीआई के लिए बैंक नोटों का मुद्रण करना तथा देश की मुद्रा प्रबंधन प्रणाली को सहयोग प्रदान करना।
- मुद्रणालय: BRBNMPL दो उच्च सुरक्षा वाले मुद्रा मुद्रणालय संचालित करता है—
- मैसूर (कर्नाटक): वर्ष 1996 से संचालित।
- सलबोनी (पश्चिम बंगाल): वर्ष 2000 से संचालित।
- कार्य:
- आरबीआई की आवश्यकताओं के अनुसार बैंक नोटों का मुद्रण करना।
- जालसाजी रोकने के लिए उन्नत सुरक्षा मुद्रण प्रौद्योगिकियों का उपयोग करना।
- विशेष प्रकार के बैंक नोट कागज़, स्याही तथा अन्य सुरक्षा सामग्री की खरीद करना।
- पॉलीमर (प्लास्टिक) बैंक नोटों सहित नई मुद्रा प्रौद्योगिकियों के अनुसंधान एवं अपनाने को बढ़ावा देना।
ऐतिहासिक समयरेखा
- 2009: RBI ने ₹10 मूल्यवर्ग के 100 करोड़ पॉलीमर नोट मुद्रित करने का प्रस्ताव रखा।
- 2012: कोच्चि, मैसूर, जयपुर, भुवनेश्वर और शिमला में पायलट परियोजना की योजना बनाई गई। इन स्थानों का चयन विभिन्न जलवायु परिस्थितियों का प्रतिनिधित्व करने के लिए किया गया था।
- 2014–15: RBI ने मूल्यांकन के दौरान तकनीकी कमियों की सूचना दी, जिसके कारण यह परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी।
- 2016 के बाद: विमुद्रीकरण के कारण नई बैंक नोट श्रृंखला के मुद्रण को प्राथमिकता दी गई।
- 2026: BRBNMPL ने पॉलीमर सब्सट्रेट की आपूर्ति हेतु नई निविदा जारी की, जिससे इस परियोजना को पुनः गति मिलने के संकेत मिले।
आरबीआई इस प्रस्ताव को पुनः क्यों लागू कर रहा है?
- अधिक लंबी आयु: पॉलीमर नोटों का जीवनकाल औसतन कपास-आधारित कागज़ी नोटों की तुलना में 2.5 से 4 गुना अधिक होता है।
- भारत में स्वच्छ नोट नीति (Clean Note Policy) के अंतर्गत प्रतिवर्ष 20–24 अरब गंदे एवं क्षतिग्रस्त नोट बदले जाते हैं तथा RBI मुद्रा के मुद्रण एवं प्रबंधन पर लगभग ₹5,000 करोड़ प्रतिवर्ष व्यय करता है।
- बेहतर सुरक्षा: पॉलीमर नोटों में जालसाजी रोकने हेतु पारदर्शी खिड़कियाँ, सूक्ष्म मुद्रण (Micro-printing), उन्नत होलोग्राफिक तत्व तथा अंतर्निहित सुरक्षा विशेषताएँ जैसी आधुनिक सुरक्षा तकनीकों का उपयोग किया जाता है।
- RBI के आँकड़ों के अनुसार 2025–26 में पकड़े गए जाली नोटों की संख्या बढ़कर लगभग 2.3 लाख हो गई।
- कम जीवन-चक्र लागत: यद्यपि पॉलीमर नोटों के निर्माण की प्रारंभिक लागत अधिक होती है, किंतु उन्हें बार-बार बदलने की आवश्यकता कम पड़ती है। परिणामस्वरूप नोटों के मुद्रण, परिवहन, भंडारण तथा पुराने एवं क्षतिग्रस्त नोटों के नष्ट करने की लागत में कमी आती है।
- टेरी (TERI) द्वारा पॉलीमर नोटों पर किए गए जीवन-चक्र प्रभाव आकलन (Life Cycle Impact Assessment) से पता चला है कि पॉलीमर नोटों का समग्र पर्यावरणीय प्रभाव अपेक्षाकृत कम हो सकता है, क्योंकि समय के साथ कम संख्या में नोटों का निर्माण और परिवहन करना पड़ता है।

प्रमुख चिंताएँ
- उच्च उत्पादन लागत: पॉलीमर नोट, कपास-आधारित कागज़ी नोटों की तुलना में 30–60% अधिक महंगे होते हैं।
- कुछ देशों में कम मूल्यवर्ग के पॉलीमर नोटों की निर्माण लागत उनके अंकित मूल्य (Face Value) के लगभग 20–24% तक रही है, जिससे उनकी लागत-प्रभावशीलता पर प्रश्न उठते हैं।
- पेट्रो-रासायनिक निर्भरता: पॉलीमर सब्सट्रेट पॉलीप्रोपाइलीन से बनाए जाते हैं।
- भारत अभी भी बड़ी मात्रा में पॉलीप्रोपाइलीन का आयात करता है, जिससे इसकी लागत कच्चे तेल की कीमतों, भू-राजनीतिक तनावों तथा पश्चिम एशिया में आपूर्ति व्यवधानों से प्रभावित होती है।
- रिलायंस इंडस्ट्रीज़ और इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ा रहे हैं, फिर भी आयात पर निर्भरता एक रणनीतिक चिंता बनी हुई है।
- संक्रमण लागत: पॉलीमर मुद्रा अपनाने के लिए एटीएम, नकदी छँटाई मशीनों, वेंडिंग मशीनों तथा मुद्रा प्रसंस्करण उपकरणों का पुनः अंशांकन (Recalibration) करना होगा।
- इसके अतिरिक्त, वाणिज्यिक बैंक, खुदरा विक्रेता तथा नकदी परिवहन (Cash Logistics) कंपनियों को भी नई व्यवस्था के अनुरूप ढलने में अतिरिक्त लागत वहन करनी पड़ेगी।
- कागज़ी मुद्रा में पूर्व निवेश: भारत ने बैंक नोट पेपर मिल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड तथा स्वदेशी स्याही निर्माण सुविधाओं सहित कागज़ी मुद्रा के लिए व्यापक घरेलू आधारभूत संरचना विकसित की है।
- पॉलीमर मुद्रा की ओर अचानक बदलाव से इन निवेशों का पर्याप्त उपयोग नहीं हो पाएगा।
डिजिटल भुगतान का विरोधाभास
- UPI की तीव्र वृद्धि: भारत में प्रतिवर्ष 24,000 करोड़ से अधिक UPI लेन-देन होते हैं, जो खुदरा डिजिटल भुगतानों का लगभग 85% हैं।
- आरबीआई का मुद्रा माँग विरोधाभास: डिजिटल भुगतान में तीव्र वृद्धि के बावजूद—
- प्रचलन में मुद्रा की मात्रा लगभग एक दशक पहले के ₹16–17 लाख करोड़ से बढ़कर 2025–26 में ₹41 लाख करोड़ से अधिक हो गई है।
- मुद्रा-से-जीडीपी अनुपात अभी भी 11% से अधिक है, जो दर्शाता है कि भौतिक नकदी की माँग अब भी बनी हुई है।
- इसके प्रमुख कारण हैं— अनौपचारिक अर्थव्यवस्था, ग्रामीण क्षेत्रों में कमजोर डिजिटल संपर्क, परिवारों एवं छोटे व्यापारियों द्वारा नकदी को प्राथमिकता तथा एहतियाती नकद भंडारण।
- इससे स्पष्ट होता है कि डिजिटल भुगतान और नकदी एक-दूसरे के पूरक हैं, पूर्ण विकल्प नहीं।
- मुद्रा मुद्रण लागत की प्रवृत्ति: RBI की वार्षिक रिपोर्टों के अनुसार, मुद्रा मुद्रण पर व्यय—
- 2023–24: ₹5,101 करोड़
- 2024–25: ₹6,373 करोड़
- 2025–26: ₹4,875 करोड़
आगे की राह
- चरणबद्ध क्रियान्वयन: सभी मूल्यवर्गों को एक साथ प्रतिस्थापित करने के बजाय, ₹10 और ₹20 के नोटों से शुरुआत की जानी चाहिए, जहाँ टिकाऊपन का लाभ सर्वाधिक होगा।
- घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा: आत्मनिर्भर भारत के अंतर्गत पॉलीमर सब्सट्रेट का स्वदेशी उत्पादन बढ़ाया जाए, ताकि आयात पर रणनीतिक निर्भरता कम हो।
- समग्र लागत–लाभ विश्लेषण: RBI को जीवन-चक्र लागत, संक्रमण लागत, पर्यावरणीय लाभ तथा सुरक्षा लाभों का व्यापक मूल्यांकन करना चाहिए।
- पुनर्चक्रण अवसंरचना का विकास: पॉलीमर नोटों से अधिकतम पर्यावरणीय लाभ प्राप्त करने के लिए पुनर्चक्रण सुविधाओं की स्थापना की जानी चाहिए।
- डिजिटल भुगतान का निरंतर विस्तार: पॉलीमर नोटों का उद्देश्य भारत की डिजिटल भुगतान रणनीति का पूरक बनना है, न कि उसका प्रतिस्थापन, ताकि उन क्षेत्रों में भी वित्तीय समावेशन सुनिश्चित हो सके जहाँ आज भी नकदी का व्यापक उपयोग होता है।
स्रोत: TH
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संक्षिप्त समाचार 23-07-2026