पाठ्यक्रम: जीएस-2/ अंतर्राष्ट्रीय संबंध
सन्दर्भ
- विदेश मंत्री ने अपने चीनी समकक्ष के साथ भारत-चीन संबंधों के सामान्यीकरण पर चर्चा की तथा मुक्त एवं खुला हिन्द-प्रशांत क्षेत्र के समर्थन में आयोजित क्वाड देशों की बैठक में भाग लिया।
प्रमुख बिंदु
- विदेश मंत्री (EAM) ने कहा कि स्थिर भारत-चीन संबंध “बहुध्रुवीय एशिया” तथा “बहुध्रुवीय विश्व” के निर्माण में सहायक होंगे।
- ऑस्ट्रेलिया, भारत, जापान और संयुक्त राज्य अमेरिका के विदेश मंत्रियों की क्वाड बैठक फिलीपींस में आयोजित 59वीं आसियान विदेश मंत्रियों की बैठक के अवसर पर हुई।
भारत-चीन संबंध
- 2025 में भारत और चीन के बीच राजनयिक संबंधों के 75 वर्ष पूर्ण हुए।
ऐतिहासिक तनाव:
- 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद से दोनों देशों के संबंध तनावपूर्ण रहे हैं तथा हाल के वर्षों में हुई झड़पों और बढ़ते अविश्वास के कारण यह तनाव और अधिक बढ़ा है।
- 2020 में गलवान घाटी में दोनों देशों की सेनाओं के बीच हुई झड़प ने संबंधों को और अधिक प्रभावित किया।
- इसके बाद भारत ने चीनी निवेशों पर प्रतिबंधात्मक कदम उठाए, अनेक चीनी अनुप्रयोगों (ऐप्स) पर प्रतिबंध लगाया तथा चीन के लिए उड़ानों को निलंबित कर दिया।
व्यापारिक संबंध
- 2025 में भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय व्यापार 155.6 अरब अमेरिकी डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 12% से अधिक की वृद्धि दर्शाता है।
- राजनीतिक तनाव के बावजूद दोनों देशों के आर्थिक संबंध निरंतर मजबूत होते रहे हैं।
प्रचलित तंत्र
- सीमा विवाद के समाधान के लिए तनाव के बावजूद विशेष प्रतिनिधि (SR) तंत्र तथा परामर्श एवं समन्वय हेतु कार्य तंत्र (WMCC) जैसे संस्थागत तंत्र कार्यरत हैं।
- हालिया घटनाक्रम:
- 2024 में सैनिक विस्थापन (Disengagement): भारत और चीन ने पूर्वी लद्दाख में सफल सैनिक विस्थापन की घोषणा की।
- अक्टूबर 2024 की बैठक: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने “पारस्परिक विश्वास, पारस्परिक सम्मान और पारस्परिक संवेदनशीलता” पर बल दिया।
- 2025 में दोनों देशों ने प्रत्यक्ष उड़ान सेवाएँ पुनः प्रारंभ कीं तथा भारतीय प्रधानमंत्री ने शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए चीन का दौरा किया।
पंचशील समझौता
- 1954 में भारत ने तिब्बत को चीन का भाग स्वीकार किया तथा दोनों देशों ने पंचशील समझौते पर हस्ताक्षर किए।
पंचशील समझौते में निम्नलिखित पाँच सिद्धांत निर्धारित किए गए:
- एक-दूसरे की प्रादेशिक अखंडता और संप्रभुता का पारस्परिक सम्मान।
- पारस्परिक अनाक्रमण।
- एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना।
- समानता एवं पारस्परिक लाभ के आधार पर सहयोग।
- शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व।
- इस समझौते का उद्देश्य व्यापार तथा मैत्रीपूर्ण संबंधों को बढ़ावा देना था और यही दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों का आधार बना।
- इसके साथ भारत ने यह मान लिया कि उसकी उत्तरी सीमा का प्रश्न सुलझ गया है।
- 2025 में चीन के राष्ट्रपति ने इस बात पर बल दिया कि पंचशील के सिद्धांतों का दोनों देशों द्वारा संरक्षण और संवर्धन किया जाना चाहिए।
- यह बयान ऐसे समय आया, जब भारत और चीन अपने संबंधों को पुनः सामान्य बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे थे तथा सात वर्षों के अंतराल के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चीन का दौरा किया।
चिंता के क्षेत्र
सीमा पर जारी तनाव:
भारत-चीन सीमा विवाद अब भी अनसुलझा है और लगभग 2,000 मील तक फैला हुआ है। इस सीमा पर समय-समय पर होने वाली झड़पों ने दोनों देशों के संबंधों में निरंतर तनाव उत्पन्न किया है।

- सैन्य गतिरोध एवं आधारभूत संरचना का विस्तार: वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के दोनों ओर बड़े पैमाने पर सैनिकों की तैनाती, तीव्र गति से आधारभूत संरचना का निर्माण तथा सैन्यीकरण ने तनाव बढ़ने के जोखिम को बढ़ा दिया है।
- चीन–पाकिस्तान गठजोड़: विशेष रूप से चीन–पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) के अंतर्गत चीन और पाकिस्तान के बीच बढ़ता रणनीतिक सहयोग भारत के लिए चिंता का विषय है। यह गलियारा बेल्ट एंड रोड पहल (BRI) का हिस्सा है और पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (PoK) से होकर गुजरता है, जिसे भारत अपना अभिन्न अंग मानता है।
- व्यापार असंतुलन: भारत को चीन के साथ बड़े व्यापार घाटे का सामना करना पड़ता है। इलेक्ट्रॉनिक्स, सक्रिय औषधीय संघटक (APIs), दूरसंचार उपकरण तथा सौर पैनलों जैसे क्षेत्रों में भारत की चीनी आयातों पर अत्यधिक निर्भरता बनी हुई है।
हिन्द महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती उपस्थिति:
- श्रीलंका: हम्बनटोटा बंदरगाह पर चीन की उपस्थिति तथा तेल शोधन संयंत्र में उसके निवेश ने भारत की चिंताओं को बढ़ाया है।
- नेपाल: आधारभूत संरचना परियोजनाओं (जैसे पोखरा हवाई अड्डा) में चीन का निवेश भारत की रणनीतिक स्थिति को चुनौती देता है।
- बांग्लादेश: ऋण समझौतों सहित चीन का बढ़ता प्रभाव भारत के क्षेत्रीय प्रभाव को चुनौती देता है।
- म्यांमार: चीन–म्यांमार आर्थिक गलियारा (CMEC) सहित म्यांमार के साथ चीन के गहरे होते संबंध भारत के पड़ोसी क्षेत्र में उसकी उपस्थिति को और सुदृढ़ करते हैं।
इन चिंताओं के समाधान हेतु भारत के प्रयास
- सैन्य तैयारी को सुदृढ़ करना: वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर सैनिकों की तैनाती बढ़ाना, सीमा क्षेत्रों (विशेषकर लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश) में आधारभूत संरचना का विकास, उन्नत हथियार प्रणालियों की तैनाती तथा निगरानी क्षमता को मजबूत करना।
- हिन्द-प्रशांत में रणनीतिक साझेदारी: चतुष्पक्षीय सुरक्षा संवाद (Quad) में सक्रिय भागीदारी तथा अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस के साथ रक्षा सहयोग को और गहरा करना।
- प्रौद्योगिकी एवं साइबर सुरक्षा: दूरसंचार अवसंरचना में उच्च जोखिम वाले विक्रेताओं को बाहर रखना तथा विश्वसनीय और स्वदेशी डिजिटल पारितंत्र को बढ़ावा देना।
- समुद्री सुरक्षा: भारत ने समुद्री सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए अपनी नौसैनिक क्षमताओं का विस्तार किया है तथा अमेरिका और जापान के साथ रक्षा सहयोग को मजबूत किया है।
- आधारभूत संरचना परियोजनाओं में भागीदारी: भारत ने ग्लोबल इंफ्रास्ट्रक्चर फैसिलिटी तथा भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) जैसी परियोजनाओं में भाग लेकर अपने आर्थिक विस्तार को सुदृढ़ करने का प्रयास किया है।
- व्यापारिक संबंध: भारत विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में चीनी वस्तुओं पर अपनी निर्भरता कम करने का प्रयास कर रहा है।
आगे की राह
- भारत को सीमा क्षेत्रों तथा हिन्द महासागर क्षेत्र में निरंतर निगरानी बनाए रखनी चाहिए और राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करने वाले भू-राजनीतिक एवं प्रौद्योगिकीय घटनाक्रमों पर सतत दृष्टि रखनी चाहिए।
- आगे का मार्ग संप्रभुता और प्रादेशिक अखंडता पर दृढ़ता के साथ-साथ संतुलित कूटनीति एवं रणनीतिक स्वायत्तता के समन्वय में निहित है।
- भारत और चीन के बीच पारस्परिक विश्वास को मजबूत करने के लिए निरंतर संवाद आवश्यक होगा, जिससे एशियाई सुरक्षा व्यवस्था के संदर्भ में दोनों देशों की प्राथमिकताओं और दृष्टिकोणों के बीच बेहतर सामंजस्य स्थापित किया जा सके।
स्रोत: TH
Previous article
भारत में इंटरनेट शटडाउन