पाठ्यक्रम: जीएस-2/ शासन/ गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) की भूमिका
सन्दर्भ
- भारत का परोपकार परिदृश्य संरचनात्मक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, क्योंकि घरेलू निजी दान अब विदेशी परोपकारी प्रवाह से अधिक हो गया है।
आत्मनिर्भर परोपकार पारितंत्र
- इसका आशय ऐसी व्यवस्था से है, जिसमें सामाजिक विकास का वित्तपोषण, संचालन और नेतृत्व मुख्यतः भारतीय नागरिकों, व्यवसायों, उद्यमियों तथा संस्थानों द्वारा किया जाए, जबकि विदेशी परोपकार पूरक भूमिका निभाए।
- उदाहरण: अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन, शिव नादर फाउंडेशन आदि।
- बेन–दसरा इंडिया फिलान्थ्रॉपी रिपोर्ट 2026 के अनुसार, भारत में घरेलू निजी परोपकार प्रतिवर्ष ₹1.18 लाख करोड़ से अधिक है, जो विदेशी परोपकारी प्रवाह की तुलना में पाँच गुना से भी अधिक है।
- परोपकार के प्रेरक के रूप में वित्तीय समावेशन: डीमैट खातों, एसआईपी निवेश तथा डिजिटल भुगतान में भारत की प्रगति ने बड़े पैमाने पर नागरिकों की परोपकारी भागीदारी के लिए आवश्यक आधारभूत संरचना तैयार की है।
परोपकार के नैतिक आयाम
- करुणा और सहानुभूति: परोपकार दूसरों के दुःख और अभाव की नैतिक अनुभूति पर आधारित है, जो व्यक्तियों और संस्थानों को लोककल्याण के लिए कार्य करने हेतु प्रेरित करती है।
- धन का न्यासत्व: धन को एक सार्वजनिक न्यास के रूप में देखा जाता है, जिसके साथ व्यक्तिगत उपभोग से परे सामाजिक दायित्व जुड़े होते हैं। परोपकार निजी संपत्ति को सार्वजनिक हित में परिवर्तित करने का माध्यम बनता है।
- उत्तरदायित्व और पारदर्शिता: दानदाताओं तथा परोपकारी संस्थाओं का नैतिक दायित्व है कि वे निधियों के संग्रह, आवंटन और उपयोग के बारे में स्पष्ट जानकारी दें, जिससे जनविश्वास बना रहे और संसाधनों का उत्तरदायी प्रबंधन सुनिश्चित हो।
- न्याय और समानता: नैतिक परोपकार केवल दान देने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य, लैंगिक असमानता तथा सामाजिक बहिष्करण जैसी संरचनात्मक बाधाओं के समाधान का भी प्रयास करता है।
भारत में परोपकार के तीन चरण
- प्रथम चरण (विदेशी वित्तपोषित विकास): स्वतंत्रता के बाद के दशकों में विकास कार्य मुख्यतः अंतर्राष्ट्रीय दाता एजेंसियों और विदेशी फाउंडेशनों पर निर्भर थे।
- द्वितीय चरण (सीएसआर आधारित संस्थानीकरण): कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) ढाँचे ने विकास के लिए घरेलू पूंजी का एक स्थिर स्रोत उपलब्ध कराया तथा सामाजिक मुद्दों में कॉरपोरेट भागीदारी को अधिक पेशेवर बनाया। वर्तमान में CSR के माध्यम से प्रतिवर्ष ₹40,000 करोड़ से अधिक की राशि व्यय की जाती है।
- तृतीय चरण (नागरिक एवं उद्यमी-नेतृत्व वाला परोपकार): इस उभरते चरण में भारतीय परिवार, उद्यमी और सामान्य नागरिक सामाजिक परिवर्तन के प्रमुख वित्तपोषक और नेतृत्वकर्ता बन रहे हैं।
विदेशी और घरेलू परोपकार की पूरक भूमिका
| विदेशी परोपकार | घरेलू परोपकार |
| वैज्ञानिक अनुसंधान और उन्नत ज्ञान सृजन को समर्थन देता है। | विकास पहलों में स्थानीय स्वामित्व को बढ़ावा देता है। |
| देशों और संस्थानों के बीच जनस्वास्थ्य सहयोग को प्रोत्साहित करता है। | स्वयंसेवी भागीदारी और नागरिक सहभागिता को बढ़ावा देता है। |
| प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तथा वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं तक पहुँच सुनिश्चित करता है। | भारतीय परिस्थितियों और स्थानीय आवश्यकताओं पर आधारित नवाचार को बढ़ावा देता है। |
| वैश्विक ज्ञान आदान-प्रदान और अंतर्राष्ट्रीय साझेदारी को प्रोत्साहित करता है। | विकास के परिणामों में नागरिकों की प्रत्यक्ष भागीदारी के माध्यम से लोकतांत्रिक वैधता को सुदृढ़ करता है। |
परोपकारी क्षेत्र के समक्ष प्रमुख बाधाएँ
- विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA): FCRA नवीनीकरण में विलंब, लंबी अनुमोदन प्रक्रिया, पंजीकरण रद्द होना तथा अनुपालन संबंधी आवश्यकताएँ अनेक गैर-सरकारी संगठनों के कार्यों को प्रभावित कर रही हैं।
- शेयरों में अवरुद्ध संपत्ति: अनेक उद्यमियों की अधिकांश संपत्ति नकद के बजाय कंपनी के शेयरों में निहित होती है। शेयर दान करने के लिए सरल व्यवस्था के अभाव में परोपकारी पूंजी का प्रवाह सीमित रहता है।
- बड़े पैमाने पर दान हेतु सीमित कर प्रोत्साहन: वर्तमान आयकर अधिनियम की धारा 80G के अंतर्गत सामान्यतः समायोजित सकल कुल आय की 10% सीमा तक 50% कर कटौती का प्रावधान है, जिसे अनेक विशेषज्ञ दीर्घकालिक और बड़े पैमाने के परोपकारी दान को प्रोत्साहित करने के लिए अपर्याप्त मानते हैं।
आगे की राह
- संस्थागत सुदृढ़ीकरण: जमीनी स्तर के संगठनों की शासन व्यवस्था, वित्तीय प्रबंधन, प्रौद्योगिकी अपनाने तथा प्रभाव मूल्यांकन की क्षमता को मजबूत किया जाना चाहिए।
- राजकोषीय प्रोत्साहन: कर नीति ऐसी होनी चाहिए जो दीर्घकालिक परोपकार, इक्विटी आधारित दान तथा स्थायी परोपकारी निधियों (एंडोमेंट) के निर्माण को प्रोत्साहित करे।
- डिजिटल सहभागिता: यूपीआई आधारित दान प्रणाली तथा पारदर्शी डिजिटल रिपोर्टिंग मंचों का देशभर में विस्तार किया जाना चाहिए।
- नागरिक संस्कृति: भारत में सभी आय वर्गों के बीच नियमित दान की संस्कृति को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, ताकि परोपकार केवल बड़े कॉरपोरेट समूहों और अरबपतियों तक सीमित न रहे, बल्कि व्यापक नागरिक व्यवहार का हिस्सा बने।
कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) क्या है?
- यह एक प्रबंधन अवधारणा है, जिसके अंतर्गत कंपनियाँ अपने व्यावसायिक संचालन तथा हितधारकों के साथ अपने संबंधों में सामाजिक और पर्यावरणीय सरोकारों को समाहित करती हैं।
- भारत में कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) एक वैधानिक दायित्व है, जिसका प्रावधान कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 135 के अंतर्गत किया गया है।
- इसके अनुसार कंपनियों को पिछले तीन वर्षों के औसत शुद्ध लाभ का 2% CSR गतिविधियों पर व्यय करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
CSR के प्रावधान उन सभी कंपनियों पर लागू होते हैं, जिन्होंने पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष में निम्नलिखित में से कोई एक शर्त पूरी की हो:
- ₹500 करोड़ से अधिक की शुद्ध संपत्ति, या
- ₹1000 करोड़ से अधिक का कारोबार, या
- ₹5 करोड़ से अधिक का शुद्ध लाभ।
स्रोत: TH
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संक्षिप्त समाचार 22-07-2026