अंटार्कटिक क्रायोस्फेयर

पाठ्यक्रम: जीएस-1 /भूगोल

सन्दर्भ

  • विश्व का सबसे बड़ा हिमशैल A23a लगभग चार दशकों के बाद पूरी तरह समाप्त हो गया है।

परिचय

  • कभी लगभग लंदन के क्षेत्रफल से लगभग दोगुने क्षेत्र में फैला और लगभग एक ट्रिलियन टन वज़न वाला यह हिमशैल अब छोटे-छोटे टुकड़ों में टूटकर पिघल गया है, जो सैटेलाइट द्वारा भी पहचानने योग्य नहीं रहे।
  • A23a वर्ष 1986 में अंटार्कटिका की फिल्शनर–रोने हिम शेल्फ से अलग हुआ था और कई दशकों तक समुद्र तल पर स्थिर रहा। हाल के वर्षों में यह बहना शुरू हुआ। इसका विखंडन समुद्री धाराओं, अपेक्षाकृत गर्म जल, समुद्री तरंगों की क्रिया तथा पिघले हुए जल की प्रक्रियाओं के संयुक्त प्रभाव से हुआ।
  • यह जलवायु संबंधी घटना अंटार्कटिक क्रायोस्फेयर में हो रहे परिवर्तनों तथा उनके वैश्विक जलवायु प्रणाली पर व्यापक प्रभावों को समझने का अवसर प्रदान करती है।

क्रायोस्फेयर क्या है? 

  • हिममंडल (Cryosphere) से आशय पृथ्वी के उन सभी भागों से है जहाँ जल ठोस रूप में विद्यमान रहता है, जैसे— हिम चादरें (Ice Sheets), हिमनद (Glaciers), हिमशैल (Icebergs) तथा स्थायी रूप से जमी हुई भूमि (Permafrost)।
  • अंटार्कटिक क्रायोस्फेयर विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है क्योंकि अंटार्कटिका में विश्व की सबसे बड़ी हिम चादर स्थित है। यह हिम चादर लगभग 1.4 करोड़ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई है तथा इसमें इतना हिम संचित है कि यदि यह पूरी तरह पिघल जाए, तो वैश्विक औसत समुद्र-स्तर में लगभग 58 मीटर की वृद्धि हो सकती है।

अंटार्कटिक क्रायोस्फेयर में परिवर्तनों के लिए उत्तरदायी कारक

  • समुद्री जल के तापमान में वृद्धि: गर्म समुद्री जल हिम शेल्फ़ के निचले भाग तक पहुँचकर आधारीय पिघलन (Basal Melting) का कारण बन सकता है। यह विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है क्योंकि हिम शेल्फ़ का निचले भाग से पिघलना तब भी हो सकता है जब सतह का वायु तापमान अत्यंत कम बना रहे।
  • वायुमंडलीय ऊष्मीकरण: अधिक वायु तापमान निम्नलिखित में वृद्धि कर सकता है—
  • सतही पिघलन
  • पिघले हुए जल के तालाबों (Meltwater Ponds) का निर्माण
  • जल-दरार निर्माण (Hydrofracturing)
  • हिम शेल्फ़ का कमजोर होना
  • समुद्री धाराओं और पवनों में परिवर्तन: समुद्री धाराएँ ऊष्मा को हिम शेल्फ़ों और हिमनदों तक पहुँचाती हैं। पवनों में परिवर्तन भी तैरती हुई हिम शेल्फ़ों के नीचे गर्म जल की गति को प्रभावित कर सकता है।
  • हिमशैलों का टूटकर अलग होना (Iceberg Calving) तथा समुद्री तरंगों की क्रिया: हिमशैल का अलग होना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, किन्तु गर्म जल, कमजोर होती हिम संरचनाएँ तथा समुद्री तरंगों की क्रिया हिमशैलों के टूटने की दर को प्रभावित कर सकती हैं। A23a का उदाहरण दर्शाता है कि कोई हिमशैल दशकों तक समुद्र तल पर स्थिर रह सकता है और बाद में बदलती समुद्री एवं भौतिक परिस्थितियों के कारण तेज़ी से बहने तथा विखंडित होने लग सकता है।
  • हिमपात और वर्षण में परिवर्तन: अंटार्कटिक हिम चादर का द्रव्यमान मुख्यतः हिमपात से बढ़ता है तथा निम्नलिखित प्रक्रियाओं से घटता है—
  • हिमशैलों का अलग होना
  • सतही पिघलन
  • हिम का समुद्र में प्रवाह
  • अतः कुल परिवर्तन हिम के संचयन और हानि के बीच संतुलन पर निर्भर करता है।

अंटार्कटिक क्रायोस्फेयर में परिवर्तनों के प्रभाव

महासागरीय परिसंचरण में परिवर्तन: महासागर में बड़ी मात्रा में मीठे जल के प्रवेश से निम्नलिखित प्रभावित हो सकते हैं—

  • महासागर की लवणता
  • जल का घनत्व
  • गहरे जल का निर्माण
  • वैश्विक महासागरीय परिसंचरण
  • अंटार्कटिक का तलीय जल (Antarctic Bottom Water) वैश्विक महासागरीय परिसंचरण प्रणाली का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। इसलिए अंटार्कटिका में मीठे जल तथा हिम से जुड़ी प्रक्रियाओं में परिवर्तन के प्रभाव ध्रुवीय क्षेत्र से कहीं अधिक व्यापक हो सकते हैं।

समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र: समुद्री हिम में परिवर्तन निम्नलिखित जीवों को प्रभावित कर सकता है—

  • क्रिल,पेंगुइन,सील,व्हेल,अन्य समुद्री जीव । 
  • उदाहरण के लिए, समुद्री हिम के नीचे शिकार की उपलब्धता और वितरण में परिवर्तन पेंगुइनों के भोजन प्राप्त करने के व्यवहार तथा उनके जीवित रहने की रणनीतियों को प्रभावित कर सकता है।
  • हिम–परावर्तन (Ice-Albedo) प्रतिपुष्टि: हिम और बर्फ आने वाले सौर विकिरण का एक बड़ा भाग परावर्तित कर देते हैं। जब हिम और बर्फ का आवरण घटता है—
  • कम हिम → कम परावर्तन क्षमता (Albedo) → अधिक सौर ऊर्जा का अवशोषण → अधिक ऊष्मीकरण।
  • इससे एक सकारात्मक प्रतिपुष्टि चक्र (Positive Feedback Loop) बनता है, जो ऊष्मीकरण को और तेज़ कर सकता है।
  • तटीय क्षेत्रों के लिए खतरा: समुद्र-स्तर में वृद्धि से तटीय बाढ़, तटरेखा का कटाव, खारे जल का अंतःप्रवेश तथा तटीय अवसंरचना को क्षति बढ़ सकती है। भारत के लिए समुद्र-स्तर में वृद्धि मुंबई, कोलकाता तथा सुंदरबन सहित घनी आबादी वाले तटीय क्षेत्रों के लिए गंभीर जोखिम उत्पन्न करती है।

अंटार्कटिका और ध्रुवीय अनुसंधान से संबंधित भारत की पहल  

भारतीय अंटार्कटिक कार्यक्रम: इसकी शुरुआत वर्ष 1981 में हुई। अब तक 40 वैज्ञानिक अभियानों का संचालन किया जा चुका है तथा अंटार्कटिका में तीन स्थायी अनुसंधान केंद्र स्थापित किए गए हैं—

  • दक्षिण गंगोत्री (1983)
  • मैत्री (1988)
  • भारती (2012)
  • वर्तमान में मैत्री और भारती पूर्ण रूप से कार्यरत हैं।
  • राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं महासागर अनुसंधान केंद्र (National Centre for Polar and Ocean Research): यह पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्त संस्थान है, जो संपूर्ण भारतीय अंटार्कटिक कार्यक्रम का प्रबंधन करता है। इसका मुख्यालय गोवा में स्थित है।

निष्कर्ष

  • A23a का समाप्त होना अपने-आप में जलवायु परिवर्तन का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि हिमशैलों का अलग होना और उनका पिघलना प्राकृतिक प्रक्रियाएँ भी हैं। फिर भी, यह अंटार्कटिक क्रायोस्फेयर की गतिशील प्रकृति को समझने के लिए एक महत्त्वपूर्ण अध्ययन का उदाहरण प्रस्तुत करता है।
  • मुख्य चिंता केवल किसी एक हिमशैल के समाप्त होने की नहीं है, बल्कि यह है कि हिम चादरों, हिमनदों, हिम शेल्फ़ों तथा समुद्री हिम में होने वाले संयुक्त परिवर्तन वैश्विक जलवायु प्रणाली को किस प्रकार प्रभावित करते हैं।
  • इस प्रकार, अंटार्कटिक क्रायोस्फेयर केवल विश्व के दक्षिणी छोर पर स्थित एक जमी हुई भूमि नहीं है, बल्कि यह वैश्विक जलवायु प्रणाली का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटक है, जो समुद्र-स्तर, महासागरीय परिसंचरण, पारिस्थितिकी तंत्र तथा संवेदनशील तटीय क्षेत्रों के भविष्य को प्रभावित करता है।

स्रोत: DTE

 

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