राष्ट्रीय सहकारिता नीति का एक वर्ष 

पाठ्यक्रम: जीएस-3/अर्थव्यवस्था 

चर्चा में क्यों?

  • हाल ही में राष्ट्रीय सहकारिता नीति के क्रियान्वयन का एक वर्ष पूर्ण हुआ।

पृष्ठभूमि

  • भारत का सहकारी आंदोलन “वसुधैव कुटुम्बकम्” (संपूर्ण विश्व एक परिवार है) के दर्शन पर आधारित है, जो सामूहिक कल्याण, सहयोग तथा समुदाय-आधारित विकास पर बल देता है।
  • “सहकार से समृद्धि” के मार्गदर्शक दृष्टिकोण के साथ सरकार ने सहकारी क्षेत्र को सहायक नीतियों, संस्थागत ढाँचे तथा जमीनी स्तर तक पहुँच के माध्यम से सुदृढ़ किया है।
  • इस आंदोलन को सहकारी ऋण समितियाँ अधिनियम, 1904 (Cooperative Credit Societies Act, 1904) के माध्यम से विधिक मान्यता प्राप्त हुई तथा स्वतंत्रता के बाद यह विकेंद्रीकृत विकास के एक प्रमुख स्तंभ के रूप में विकसित हुआ।
  • राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (1963) तथा राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) (1982) जैसे संस्थानों की स्थापना ने सहकारी वित्तपोषण तथा ग्रामीण विकास को सुदृढ़ किया।

सहकारी संस्था (Cooperatives) क्या है?

  • यह व्यक्तियों का एक स्वायत्त संघ है, जो अपनी समान आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक आवश्यकताओं और आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए स्वेच्छा से एकजुट होकर संयुक्त स्वामित्व तथा लोकतांत्रिक रूप से सदस्यों द्वारा नियंत्रित उद्यम के माध्यम से कार्य करता है।
  • भारत में सहकारी संस्थाएँ सहकारिता के मूल सिद्धांतों द्वारा संचालित होती हैं। इनका स्वामित्व सदस्यों के पास होता है, संचालन सदस्य करते हैं तथा इनका लाभ भी सदस्यों को ही प्राप्त होता है।

वर्तमान स्थिति 

  • वर्तमान में भारत की सहकारी संस्थाएँ कृषि, बैंकिंग, ऋण, आवास तथा महिला कल्याण सहित अनेक क्षेत्रों में कार्य कर रही हैं तथा विश्व की कुल सहकारी संस्थाओं के एक-चौथाई से अधिक का प्रतिनिधित्व करती हैं।

सहकारी संस्थाओं का महत्त्व

  • सामाजिक-आर्थिक उत्थान: भारतीय सहकारी आंदोलन एक शताब्दी से अधिक समय से जमीनी स्तर पर सामाजिक-आर्थिक उत्थान के उद्देश्य से जन-सहभागिता आधारित विकास मॉडल का अग्रदूत रहा है।
  • रोज़गार सृजन और स्थानीय आय में वृद्धि: सहकारी संस्थाएँ अपने समुदाय-स्वामित्व वाले व्यावसायिक मॉडल के माध्यम से स्थानीय स्तर पर लोगों को रोजगार प्रदान करती हैं तथा कार्य का वितरण सदस्यों के बीच करती हैं।
  • बड़े निगमों के विपरीत, सहकारी संस्थाएँ अपने समुदायों में पुनः निवेश करती हैं, जिससे कौशल विकास और आजीविका को बढ़ावा मिलता है।
  • उचित मूल्य और जोखिम का साझाकरण: उत्पादों का सामूहिक संग्रहण तथा बिचौलियों को हटाकर सहकारी संस्थाएँ अपने सदस्यों को बेहतर मूल्य प्राप्त करने में सहायता करती हैं।
  • अमूल तथा सोफा (SOFA) के सदस्यों को बाज़ार दरों से अधिक मूल्य प्राप्त होता है। सहकारी संस्थाएँ लाभ का वितरण भी करती हैं तथा संकट के समय जोखिम को कम करती हैं। उदाहरण के लिए, कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान अनेक सहकारी संस्थाओं ने अपने सदस्यों को ब्याज-मुक्त ऋण प्रदान कर सहायता की।
  • महिला सशक्तिकरण और सामाजिक समावेशन: सहकारी संस्थाएँ महिलाओं तथा वंचित वर्गों को स्वामित्व और निर्णय-निर्माण में भागीदारी प्रदान करती हैं।
  • उदाहरण के लिए, लिज्जत का मॉडल महिलाओं को घर से कार्य करके आय अर्जित करने के साथ-साथ अपने उद्यम पर पूर्ण नियंत्रण भी प्रदान करता है।
  • गाँवों में आधारभूत संरचना और सेवाएँ: हजारों प्राथमिक कृषि सहकारी ऋण समितियाँ (PACS) अब बहु-सेवा केंद्रों के रूप में कार्य कर रही हैं।
  • सहकारी बैंक अपने सदस्यों को किसान क्रेडिट रुपे कार्ड, एटीएम तथा मोबाइल बैंकिंग जैसी सुविधाएँ उपलब्ध करा रहे हैं, जिससे ग्रामीण वित्तीय समावेशन को बढ़ावा मिल रहा है।
  • आत्मनिर्भरता और स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को सुदृढ़ करना: सहकारी संस्थाएँ आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देती हैं। वे कीमतों को स्थिर रखने, बेहतर सौदेबाज़ी क्षमता प्रदान करने तथा यह सुनिश्चित करने में सहायता करती हैं कि आर्थिक मूल्य समुदाय के भीतर ही बना रहे।
  • यह आत्मनिर्भर भारत के उस दृष्टिकोण के अनुरूप है, जो गाँवों की शक्ति पर आधारित आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना करता है।

सहकारी संस्थाओं के समक्ष चुनौतियाँ 

  • अत्यधिक विनियमन, राजनीतिक हस्तक्षेप, लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली में कमियाँ तथा पेशेवर प्रबंधन का अभाव सहकारी संस्थाओं की दक्षता और स्वायत्तता को प्रभावित करते हैं।
  • दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता कमजोर वित्तीय प्रबंधन, पूंजी तक सीमित पहुँच, सरकारी सहायता पर अत्यधिक निर्भरता तथा कमजोर आंतरिक निगरानी के कारण प्रभावित होती है।
  • पुराने कानून, अनेक नियामक व्यवस्थाएँ, जटिल पंजीकरण प्रक्रियाएँ तथा उच्च अनुपालन लागत सहकारी संस्थाओं के समक्ष अनेक बाधाएँ उत्पन्न करती हैं।
  • छोटे पैमाने पर संचालन, कमजोर आधारभूत संरचना, विपणन की कमज़ोर व्यवस्था तथा निजी और वैश्विक संस्थाओं से बढ़ती प्रतिस्पर्धा सहकारी संस्थाओं की वृद्धि और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को प्रभावित कर रही है।
  • डिजिटल प्रौद्योगिकियों, आधुनिक उत्पादन तकनीकों तथा आपूर्ति श्रृंखला प्रणालियों को कम अपनाने के कारण उत्पादकता, परिचालन दक्षता तथा बाज़ार तक पहुँच सीमित रहती है।

सरकार द्वारा की गई विभिन्न पहलें

  • संवैधानिक प्रावधान: 97वें संविधान (संशोधन) अधिनियम, 2011 ने संविधान में भाग IXB जोड़कर तथा अनुच्छेद 19(1)(c) के अंतर्गत सहकारी समितियों के गठन के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता देकर सहकारी आंदोलन को नई गति प्रदान की।
  • इसने राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद 43B भी जोड़ा, जिसके अंतर्गत राज्य को स्वैच्छिक, स्वायत्त, लोकतांत्रिक तथा पेशेवर ढंग से संचालित सहकारी समितियों को बढ़ावा देने का निर्देश दिया गया।
  • यद्यपि संविधान में सहकारिता को राज्य सूची का विषय बनाया गया है, फिर भी बहु-राज्यीय सहकारी समितियाँ (जिनके सदस्य और कार्य एक से अधिक राज्यों में फैले हों) बहु-राज्यीय सहकारी समितियाँ (संशोधन) अधिनियम, 2023 द्वारा विनियमित की जाती हैं।
  • राष्ट्रीय सहकारिता नीति (NCP), 2025: इसे जुलाई 2025 में वर्ष 2002 की नीति के स्थान पर लागू किया गया, क्योंकि वैश्वीकरण, डिजिटलीकरण तथा सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन के कारण पुरानी नीति अप्रासंगिक हो गई थी।
  • यह 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए भारत के सहकारी क्षेत्र के पुनरुद्धार का एक रणनीतिक मार्गदर्शक प्रस्तुत करती है।
  • यह “सहकार से समृद्धि” की भावना पर आधारित है तथा भारत की सहकारिता परंपरा की विशिष्ट शक्तियों का उपयोग करते हुए आर्थिक लोकतंत्रीकरण को बढ़ावा देने और सामूहिक भागीदारी के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने का लक्ष्य रखती है।
  • प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (PACS) का कम्प्यूटरीकरण: यह 2022 में स्वीकृत एक केंद्र प्रायोजित योजना है, जिसका उद्देश्य 31 मार्च 2027 तक PACS को डिजिटल रूप से सक्षम संस्थानों में परिवर्तित करना है।
  • भारत टैक्सी: यह सहकार टैक्सी कोऑपरेटिव लिमिटेड की एक पहल है। यह सहकारी मॉडल पर आधारित चालक-केंद्रित परिवहन मंच है, जिसका उद्देश्य चालकों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना तथा आम जनता को किफायती, सुरक्षित और विश्वसनीय परिवहन सेवाएँ उपलब्ध कराना है।

कर राहत एवं व्यवसाय करने में सुगमता:

  • नीतिगत सुधारों के माध्यम से सहकारी संस्थाओं की वित्तीय स्थिति को भी सुदृढ़ किया गया है।

 प्रमुख कर राहत उपाय निम्नलिखित हैं

  • ₹1 करोड़ से ₹10 करोड़ तक की आय वाली सहकारी संस्थाओं के लिए अधिभार (Surcharge) को 12% से घटाकर 7% किया गया।
  • न्यूनतम वैकल्पिक कर (MAT) को 18.5% से घटाकर 15% किया गया।
  • स्रोत पर कर कटौती (TDS) के अंतर्गत नकद निकासी की सीमा ₹1 करोड़ से बढ़ाकर ₹3 करोड़ कर दी गई।
  • PACS तथा प्राथमिक सहकारी कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंकों के लिए नकद लेन-देन की सीमा बढ़ाई गई।
  • श्वेत क्रांति 2.0: इसका उद्देश्य सहकारी संस्थाओं का विस्तार, रोजगार सृजन तथा महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देना है। अगले पाँच वर्षों में डेयरी सहकारी संस्थाओं द्वारा दूध की खरीद को वर्तमान स्तर से 50% तक बढ़ाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
  • बहु-राज्यीय सहकारी समितियाँ (MSCS) (संशोधन) अधिनियम एवं नियम, 2023: इसका उद्देश्य बहु-राज्यीय सहकारी समितियों में सुशासन, पारदर्शिता, जवाबदेही को सुदृढ़ करना तथा निर्वाचन प्रक्रिया में सुधार करना है।
  • सहकारिता मंत्रालय की स्थापना: जुलाई 2021 में सहकारिता मंत्रालय की स्थापना की गई, ताकि सहकारी समितियों तथा कृषि ऋण समितियों के कार्यों का प्रभावी ढंग से संचालन एवं समन्वय किया जा सके।

निष्कर्ष

  • सहकारी संस्थाओं में भारत के सामाजिक-आर्थिक विकास में परिवर्तनकारी भूमिका निभाने की अपार क्षमता है।
  • सुशासन से संबंधित समस्याओं, वित्तीय स्थिरता, नियामकीय बाधाओं तथा तकनीकी कमियों जैसी प्रमुख चुनौतियों का समाधान करके सहकारी संस्थाओं को समावेशी विकास में अधिक प्रभावी योगदान देने के लिए सशक्त बनाया जा सकता है।
  • उपयुक्त सुधारों, क्षमता-निर्माण पहलों तथा संस्थागत सहयोग के माध्यम से सहकारी संस्थाएँ विशेष रूप से वंचित एवं ग्रामीण समुदायों के आर्थिक सशक्तिकरण को बढ़ावा दे सकती हैं तथा भारत में सतत एवं न्यायसंगत विकास के लक्ष्य की प्राप्ति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

स्रोत : PIB

 

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