पाठ्यक्रम: जीएस-2 / स्वास्थ्य
चर्चा में क्यों ?
- GARDP फाउंडेशन द्वारा वित्तपोषित ऐतिहासिक NeoSep1 नैदानिक परीक्षण (clinical trial)का विस्तार भारत तक किया गया है, ताकि औषधि-प्रतिरोधी(drug-resistant) नवजात सेप्सिस की बढ़ती समस्या का समाधान किया जा सके
समाचार के बारे में अधिक जानकारी
- यह परीक्षण भारत के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में नवजात सेप्सिस उत्पन्न करने वाले जीवाणु उच्च आय वाले देशों से भिन्न हैं।
- जहाँ विश्व स्तर पर ग्रुप-बी स्ट्रेप्टोकोकस प्रमुख कारण है, वहीं भारत में अधिकांश मामले एंटीमाइक्रोबियल जीवाणुओं जैसे—क्लेब्सिएला न्यूमोनिया (Klebsiella pneumoniae),एशेरिशिया कोलाई (Escherichia coli),एसीनेटोबैक्टर (Acinetobacter),स्यूडोमोनास एरुजिनोसा (Pseudomonas aeruginosa) के कारण होते हैं।
- भारत में नवजात सेप्सिस नवजात मृत्यु के लगभग 30–40% मामलों के लिए उत्तरदायी है तथा प्रतिवर्ष लगभग 2–2.5 लाख रोकी जा सकने वाली मौतों का अनुमान है।
सेप्सिस का परिचय
- नवजात सेप्सिस एक जीवन-घातक रक्त संक्रमण है, जो 90 दिनों से कम आयु के शिशुओं में होता है तथा विशेष रूप से समय से पूर्व जन्मे अथवा कम जन्म-भार वाले शिशुओं को प्रभावित करता है।
इसे दो श्रेणियों में विभाजित किया जाता है—
- प्रारंभिक सेप्सिस (Early-onset): जन्म के पहले 72 घंटों के भीतर।
- विलंबित सेप्सिस (Late-onset): जन्म के 28–90 दिनों के भीतर।
सेप्सिस के सामान्य लक्षण हैं—
- बुखार
- हृदय गति का तेज होना
- तेज श्वास
- भ्रम की स्थिति
- शरीर में दर्द
- यह सेप्टिक शॉक, अनेक अंगों की विफलता तथा मृत्यु का कारण बन सकता है।
- स्वच्छता, सुरक्षित खाद्य व्यवहार, स्वच्छ पेयजल एवं सफाई व्यवस्था, टीकाकरण, संतुलित आहार तथा नवजात को स्तनपान कराने से संक्रमण का जोखिम कम किया जा सकता है और सेप्सिस की रोकथाम की जा सकती है।
रोगाणुरोधी प्रतिरोध (AMR)
- रोगाणुरोधी प्रतिरोध (AMR) वह स्थिति है, जिसमें जीवाणु, विषाणु, कवक एवं परजीवी रोगाणुरोधी औषधियों के प्रति प्रतिक्रिया देना बंद कर देते हैं।
इन औषधियों में शामिल हैं—
- एंटीबायोटिक्स (Antibiotics)
- एंटीवायरल्स(Antivirals)
- एन्टीफंगल्स (Antifungals)
- एंटीपैरासिटिक्स (Antiparasitics)
- इसके परिणामस्वरूप संक्रमणों का उपचार कठिन या असंभव हो जाता है, जिससे रोग के प्रसार, गंभीर बीमारी, दिव्यांगता और मृत्यु का जोखिम बढ़ जाता है।
- यह मुख्यतः एंटीबायोटिक के दुरुपयोग या अत्यधिक उपयोग के कारण सूक्ष्मजीवों में होने वाले विकासात्मक परिवर्तन (Evolution) का परिणाम है।
भारत में AMR की वृद्धि के प्रमुख कारण
- एंटीबायोटिक का अत्यधिक उपयोग: एंटीबायोटिक के अविवेकपूर्ण एवं अत्यधिक उपयोग से प्रतिरोधी अथवा अत्यधिक प्रतिरोधी सुपरबग विकसित हो जाते हैं।
- स्वच्छता की कमी: अपर्याप्त स्वच्छता तथा अस्पतालों एवं चिकित्सालयों में संक्रमण नियंत्रण की कमजोर व्यवस्था प्रतिरोधी जीवाणुओं के प्रसार को बढ़ावा देती है।
- उचित जाँच का अभाव: रोगियों की उचित जाँच किए बिना केवल लक्षणों के आधार पर प्रतिजैविक लिखना।
- औषधि निर्माण अपशिष्ट: एंटीबायोटिक निर्माण से निकलने वाला अपशिष्ट नए औषधि-प्रतिरोधी जीवाणुओं के विकास को बढ़ावा देता है, जो वैश्विक स्तर पर फैलकर स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकते हैं।
- एंटीबायोटिक की अनियंत्रित उपलब्धता: पशुपालन, डेयरी तथा कुक्कुट पालन क्षेत्रों में एंटीबायोटिक का अनियंत्रित उपयोग गंभीर चिंता का विषय है।
- भारत की सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियाँ: विशाल धार्मिक आयोजन (जैसे कुंभ मेला), राजनीतिक रैलियाँ तथा बड़े पारिवारिक विवाह संक्रमण के तीव्र प्रसार के अनुकूल वातावरण तैयार करते हैं।
AMR से निपटने हेतु की गई पहलें
राष्ट्रीय AMR नियंत्रण कार्यक्रम
- इसे 12वीं पंचवर्षीय योजना (2012–17) के दौरान प्रारंभ किया गया।
इसके प्रमुख उद्देश्य हैं—
- प्रयोगशाला आधारित रोगाणुरोधी प्रतिरोध निगरानी प्रणाली की स्थापना।
- विभिन्न स्वास्थ्य संस्थानों में एंटीबायोटिक उपयोग की निगरानी।
- संक्रमण नियंत्रण को सुदृढ़ करना तथा रोगाणुरोधी औषधियों के विवेकपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देना।
- रेड लाइन अभियान के माध्यम से जन-जागरूकता फैलाना।
- रोगाणुरोधी प्रतिरोध पर राष्ट्रीय कार्ययोजना (NAP-AMR)
- भारत ने 2017 में AMR पर व्यापक राष्ट्रीय कार्ययोजना तैयार करने वाले शुरुआती देशों में स्थान प्राप्त किया।
- यह योजना एक स्वास्थ्य (One Health) दृष्टिकोण पर आधारित है, जिसमें विभिन्न मंत्रालयों एवं विभागों की सहभागिता सुनिश्चित की गई है।
AMR निगरानी नेटवर्क
- भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) ने वर्ष 2013 में रोगाणुरोधी प्रतिरोध निगरानी एवं अनुसंधान नेटवर्क (AMRSN) की स्थापना की।
- इसका उद्देश्य देश में औषधि-प्रतिरोधी संक्रमणों से संबंधित साक्ष्य एकत्र करना, प्रवृत्तियों की निगरानी करना तथा उनके स्वरूप की पहचान करना है।
अनुसंधान एवं अंतर्राष्ट्रीय सहयोग
- ICMR ने नई औषधियों के विकास तथा AMR संबंधी चिकित्सा अनुसंधान को सुदृढ़ करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग भी प्रारंभ किया है।
आगे क्या किया जाना चाहिए?
- विभिन्न क्षेत्रों में एंटीबायोटिक के उपयोग का विनियमन: भारत में बढ़ते AMR से निपटने के लिए एंटीबायोटिक के उपयोग को नियंत्रित करना आवश्यक है।
- सरकारों को विशेष रूप से कुक्कुट पालन उद्योग में एंटीबायोटिक के उपयोग पर कड़ा नियंत्रण करना चाहिए।
- भारत विश्व में एंटीबायोटिक के सर्वाधिक उपयोग करने वाले देशों में है। प्रतिवर्ष बाह्य रोगियों में इनका उपयोग 7–8% तथा भर्ती रोगियों में 11% की दर से बढ़ रहा है।
- प्रभावी स्वच्छता एवं साफ-सफाई: लोगों में स्वच्छता के महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाई जाए, क्योंकि बेहतर स्वच्छता, साफ-सफाई की आदतों और टीकाकरण से अनेक संक्रमणों की रोकथाम संभव है।
- NAP-AMR के प्रभावी क्रियान्वयन को प्राथमिकता: पर्याप्त संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित कर राष्ट्रीय कार्ययोजना का प्रभावी कार्यान्वयन किया जाए।
- नागरिकों एवं चिकित्सकों में जिम्मेदार व्यवहार को बढ़ावा: लोगों को प्रतिजैविकों के अत्यधिक उपयोग के दुष्परिणामों के बारे में शिक्षित किया जाए।
- चिकित्सकों को भी उचित प्रशिक्षण दिया जाए ताकि वे एंटीबायोटिक का विवेकपूर्ण उपयोग करें, शक्तिशाली (strong) एंटीबायोटिक को गंभीर अस्पताल-आधारित रोगियों के लिए सुरक्षित रखें तथा रोगियों की जाँच के बाद ही उपयुक्त उपचार करें।
- वन हेल्थ (One Health) दृष्टिकोण अपनाना: पर्यावरण AMR के विकास, संचरण एवं प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए इसका समाधान एक स्वास्थ्य दृष्टिकोण पर आधारित होना चाहिए, जो यह स्वीकार करता है कि मनुष्य, पशु, पौधे तथा पर्यावरण वैश्विक, क्षेत्रीय एवं स्थानीय स्तर पर परस्पर जुड़े हुए और अविभाज्य हैं।
स्रोत:TH