डेंगू टीके की सुरक्षा संबंधी चिंताएँ
पाठ्यक्रम : जीएस-2 /स्वास्थ्य
सन्दर्भ
- ब्राज़ील ने हाल ही में अपने डेंगू टीके बुटान्टन-डीवी(Butantan-DV) के उपयोग को निलंबित कर दिया है। यह निर्णय बड़े पैमाने पर चलाए गए टीकाकरण अभियान के दौरान दो मृत्यु सहित गंभीर प्रतिकूल घटनाओं की रिपोर्ट मिलने के बाद लिया गया।
डेंगू क्या है?
- डेंगू एक वायरस से होने वाला संक्रमण है, जो डेंगू वायरस (DENV) के कारण होता है और संक्रमित मच्छरों के काटने से मनुष्यों में फैलता है।
- डेंगू वायरस फ्लैविविरिडी कुल का एक आरएनए वायरस है, जिसके चार प्रकार होते हैं— डीईएनवी-1, डीईएनवी-2, डीईएनवी-3 तथा डीईएनवी-4।
- किसी एक प्रकार से संक्रमण होने पर उस प्रकार के विरुद्ध आजीवन प्रतिरक्षा प्राप्त हो जाती है, किन्तु अन्य प्रकारों के विरुद्ध केवल अस्थायी सुरक्षा मिलती है।
- लक्षण: तेज़ बुखार, तीव्र सिरदर्द, आँखों के पीछे दर्द, मांसपेशियों एवं जोड़ों में दर्द, मतली, उल्टी, ग्रंथियों में सूजन तथा त्वचा पर चकत्ते।
- संचरण: यह वायरस मुख्य रूप से संक्रमित मादा एडीज़ एजिप्टी मच्छर के काटने से मनुष्यों में फैलता है।
- डेंगू का संक्रमण गर्भवती माँ से शिशु में, रक्त उत्पादों के माध्यम से, अंगदान तथा रक्ताधान द्वारा भी फैल सकता है।
- रोकथाम: डेंगू के लिए कोई विशिष्ट वायरसरोधी उपचार उपलब्ध नहीं है, इसलिए इसकी रोकथाम मच्छरों की संख्या नियंत्रित करने तथा जन-जागरूकता बढ़ाने पर निर्भर करती है।
- डेंगू फैलाने वाले मच्छर दिन के समय सक्रिय रहते हैं। इससे बचाव का सर्वोत्तम उपाय मच्छरों के काटने से स्वयं को सुरक्षित रखना है।
चिंताएँ क्यों उत्पन्न हुई हैं?
- इस घटनाक्रम ने भारत के आगामी डेंगू टीके डेंगीऑल(DengiAll) की सुरक्षा को लेकर चिंताएँ बढ़ा दी हैं, क्योंकि दोनों टीके समान वैज्ञानिक मंचों पर आधारित हैं।
- दोनों टीके जीवित कमज़ोर किए गए टेट्रावैलेंट टीके ( live attenuated tetravalent vaccines) हैं। इनमें डेंगू वायरस के चारों प्रकारों के कमजोर रूप सम्मिलित होते हैं।
- दोनों टीके उन टीका-उम्मीदवारों (TV003 and TV005) पर आधारित हैं, जिन्हें मूल रूप से अमेरिका के राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान द्वारा विकसित किया गया था।
- वैक्सीन-कैंडिडेट वह टीका होता है जिसकी सुरक्षा और प्रभावशीलता का परीक्षण पूर्ण नियामकीय स्वीकृति प्राप्त होने से पहले किया जाता है।
बाद में इस प्रौद्योगिकी का लाइसेंस निम्न संस्थाओं को प्रदान किया गया:
- ब्राज़ील में बुटान्टन संस्थान (Butantan-DV हेतु)
- भारत में पैनेसिया बायोटेक (DengiAll हेतु)
एंटीबॉडी-डिपेंडेन्ट एन्हांसमेंट (ADE)
- ADE एक ऐसी घटना है, जिसमें पूर्व डेंगू संक्रमण या टीकाकरण के बाद बने एंटीबॉडी
बाद में होने वाले संक्रमण के दौरान वायरस को पूरी तरह निष्क्रिय नहीं कर पाते।
- शरीर की रक्षा करने के बजाय ये एंटीबॉडी वायरस को प्रतिरक्षा कोशिकाओं में अधिक आसानी से प्रवेश करने में सहायता कर सकते हैं, जिससे संक्रमण अधिक गंभीर हो सकता है।
यह कैसे होता है?
- डेंगू टीके का उद्देश्य डेंगू वायरस के सभी चार प्रकारों के विरुद्ध प्रतिरक्षा उत्पन्न करना होता है।
टीकाकरण के बाद शरीर में निम्न प्रकार के एंटीबॉडी बनते हैं:
- टाईप स्पेसिफिक एंटीबॉडीज (Type-specific antibodies), जो किसी विशेष प्रकार के विरुद्ध मजबूत सुरक्षा प्रदान करते हैं।
- क्रॉस-रिएक्टिव एंटीबॉडीज (Cross-reactive antibodies), जो अनेक प्रकारों की पहचान कर सकते हैं, किन्तु अपेक्षाकृत कमजोर सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं।
- समय के साथ क्रॉस-रिएक्टिव एंटीबॉडीज का स्तर कम हो सकता है।
- यदि बाद में व्यक्ति किसी भिन्न डेंगू प्रकार से संक्रमित हो जाता है, तो ये कमजोर एंटीबॉडीज वायरस को रोकने में असफल हो सकते हैं। इसके विपरीत, वे वायरस को प्रतिरक्षा कोशिकाओं में प्रवेश करने में सहायता कर सकते हैं, जिससे उसका प्रसार अधिक तीव्र गति से होने लगता है।
स्रोत: TH
झारखंड की पारंपरिक विरासत को भौगोलिक संकेतक मान्यता
पाठ्यक्रम: जीएस-1 /संस्कृति,जीएस-3 /अर्थव्यवस्था
सन्दर्भ
- झारखंड के ग्यारह पारंपरिक उत्पादों को हाल ही में भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग प्रदान किया गया है।
झारखंड के जीआई-टैग प्राप्त उत्पाद
- भगैया रेशम: भगवानिया (भगैया) रेशम का उत्पादन गोड्डा जिले के भगैया क्षेत्र में किया जाता है। यह अपनी पारंपरिक हस्तकरघा बुनाई तकनीकों तथा उच्च गुणवत्ता वाले रेशमी वस्त्र के लिए प्रसिद्ध है।
- कुचाई रेशम: इसका उत्पादन प्राकृतिक रूप से सरायकेला-खरसावाँ जिले (ऐतिहासिक रूप से कुचाई के नाम से प्रसिद्ध) में आसन और अर्जुन वृक्षों पर किया जाता है।
- केसरिया कलाकंद: यह एक पारंपरिक मिष्ठान्न है, जो क्षेत्र की पाक-सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
- ढोकरा शिल्प: यह भारत की सबसे प्राचीन जीवित धातु-ढलाई परंपराओं में से एक है। इसमें सजावटी तथा उपयोगी वस्तुओं के निर्माण हेतु पारंपरिक मधुच्छिष्ट ढलाई तकनीक (लॉस्ट-वैक्स कास्टिंग) का उपयोग किया जाता है।
- तुमका चादर: यह झारखंड के स्थानीय जनजातीय तथा शिल्पकार समुदायों द्वारा बुनी जाने वाली विशिष्ट शॉल अथवा बिछावन चादर है।
- बरोनी चित्रकला: यह झारखंड की पारंपरिक लोकचित्रकला है, जिसमें स्थानीय रीति-रिवाजों, प्रकृति तथा जनजातीय सांस्कृतिक परंपराओं का चित्रण किया जाता है।
- पंचो साड़ी एवं वस्त्र: यह झारखंड के पारंपरिक हस्तबुने वस्त्र हैं, जो अपनी विशिष्ट आकृतियों एवं स्थानीय समुदायों के बीच सांस्कृतिक महत्त्व के लिए प्रसिद्ध हैं।
- जादोपटिया चित्रकला: यह संथाल समुदाय द्वारा प्रचलित पारंपरिक पट-चित्रकला (स्क्रॉल पेंटिंग) है, जिसमें लोककथाओं, पौराणिक आख्यानों, सामाजिक परंपराओं तथा सांस्कृतिक कथाओं का चित्रण किया जाता है।

- भोया साड़ी एवं वस्त्र: यह झारखंड के पारंपरिक हस्तनिर्मित एवं हस्तबुने वस्त्रों में से एक है।
- मुंडा आभूषण: यह मुंडा जनजातीय समुदाय द्वारा निर्मित पारंपरिक आभूषण है। यह झारखंड की जनजातीय आबादी की कलात्मक परंपराओं तथा सामाजिक रीति-रिवाजों को प्रतिबिंबित करता है।
- झारखंड बाँस शिल्प: इस शिल्प में स्थानीय रूप से उपलब्ध बाँस का उपयोग करके उपयोगी तथा सजावटी वस्तुओं का निर्माण किया जाता है।
भौगोलिक संकेतक (GI)
- भौगोलिक संकेतक (GI) ऐसा चिह्न है जिसका उपयोग उन उत्पादों पर किया जाता है जिनका एक विशिष्ट भौगोलिक उद्गम होता है तथा जिनकी गुणवत्ता, विशेषताएँ अथवा प्रतिष्ठा उस स्थान से जुड़ी होती हैं।
- किसी चिह्न को भौगोलिक संकेतक के रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि वह किसी उत्पाद की उत्पत्ति को किसी विशिष्ट स्थान से जोड़कर प्रदर्शित करे।
- भौगोलिक संकेतकों का उपयोग सामान्यतः कृषि उत्पादों, खाद्य पदार्थों, मदिरा एवं आसवित पेयों, हस्तशिल्प वस्तुओं तथा औद्योगिक उत्पादों के लिए किया जाता है।
भौगोलिक संकेतक टैग और भारत
- वस्तुओं का भौगोलिक संकेतक (पंजीकरण एवं संरक्षण) अधिनियम, 1999 भारत में वस्तुओं से संबंधित भौगोलिक संकेतकों के पंजीकरण तथा उनके बेहतर संरक्षण का प्रावधान करता है।
- इस अधिनियम का प्रशासन पेटेंट, अभिकल्प एवं व्यापार चिह्नों के महानियंत्रक द्वारा किया जाता है, जो भौगोलिक संकेतकों के पंजीयक भी होते हैं।
- किसी भौगोलिक संकेतक का पंजीकरण 10 वर्षों की अवधि तक वैध रहता है।
स्रोत: AIR
भारत और स्लोवाकिया ने संबंधों को व्यापक साझेदारी के स्तर तक पहुँचाया
पाठ्यक्रम: जीएस-2 /अंतर्राष्ट्रीय संबंध
सन्दर्भ
- भारत और स्लोवाकिया ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को व्यापक साझेदारी के स्तर तक उन्नत किया तथा सहयोग के विस्तार हेतु 11 समझौतों पर हस्ताक्षर किए।
परिचय
- यह वर्ष 1993 में स्लोवाकिया की स्वतंत्रता के बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली स्लोवाकिया यात्रा थी।
- दोनों देशों के बीच प्रवासन, डिजिटल प्रौद्योगिकी तथा रक्षा सहित विभिन्न क्षेत्रों में समझौते संपन्न हुए।
- दोनों नेताओं ने भारत–यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते के शीघ्र क्रियान्वयन की दिशा में कार्य करने पर भी सहमति व्यक्त की।
- दोनों पक्षों ने आतंकवाद-रोधी सहयोग हेतु एक संयुक्त कार्यदल तथा एक वाणिज्य-दूतावास संवाद तंत्र स्थापित करने का निर्णय लिया।
- स्लोवाकिया के राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को “दी ऑर्डर ऑफ दी व्हाइट डबल क्रॉस ,(प्रथम श्रेणी)” प्रदान किया, जो स्लोवाकिया का सर्वोच्च राजकीय सम्मान है।
स्लोवाकिया
- स्लोवाकिया मध्य यूरोप में स्थित एक स्थलरुद्ध देश है। यह 1 जनवरी 1993 को चेकोस्लोवाकिया के शांतिपूर्ण विघटन के बाद एक स्वतंत्र राष्ट्र बना।
- इसकी सीमाएँ निम्न देशों से मिलती हैं—
- उत्तर में — पोलैंड
- पूर्व में — यूक्रेन
- दक्षिण में — हंगरी
- दक्षिण-पश्चिम में — ऑस्ट्रिया
- पश्चिम में — चेक रिपब्लिक

- ब्रातिस्लावा, स्लोवाकिया की राजधानी, विश्व की एकमात्र राष्ट्रीय राजधानी है जिसकी सीमाएँ सीधे दो अलग-अलग देशों यथा; ऑस्ट्रिया तथा हंगरी से मिलती हैं।
- राजकीय भाषा: स्लोवाक भाषा।
- मुद्रा: यूरो (€)।
- स्लोवाकिया यूरोपियन यूनियन तथा उत्तरी अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन दोनों का सदस्य है।
स्रोत: PIB
ब्रिक्स इंदौर घोषणा
पाठ्यक्रम: जीएस-2 / क्षेत्रीय समूह
सन्दर्भ
- इंदौर में ब्रिक्स देशों के कृषि मंत्रियों तथा अधिकारियों की बैठक आयोजित की गई, जिसमें “ब्रिक्स इंदौर घोषणा” को सर्वसम्मति से अपनाया गया।
- ये निर्णय भारत की अध्यक्षता में आयोजित ब्रिक्स देशों के कृषि मंत्रियों एवं अधिकारियों की बैठक के समापन पर लिए गए।
प्रमुख बिंदु
- यह घोषणा वर्तमान भू-राजनीतिक तनावों के बीच अपनाई गई है तथा चार प्रमुख प्राथमिकताओं यथा; किसान, खाद्य सुरक्षा, जलवायु और प्रौद्योगिकी पर केंद्रित है।
- ब्रिक्स देश विश्व की लगभग आधी जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करते हैं, इनके पास विश्व की लगभग 42 प्रतिशत कृषि भूमि है तथा ये वैश्विक खाद्यान्न उत्पादन में लगभग 42 प्रतिशत योगदान देते हैं।
इसके अतिरिक्त चार संस्थागत पहलों का भी प्रस्ताव किया गया है:
1.कृषि-पारिस्थितिकी एवं पुनर्योजी कृषि उत्कृष्टता केंद्र
- यह प्राकृतिक, जैविक तथा पुनर्योजी कृषि पद्धतियों पर संयुक्त अनुसंधान, अनुभव-साझाकरण तथा क्षमता निर्माण के लिए एक मंच होगा।
- मोदीपुरम स्थित भारतीय कृषि प्रणाली अनुसंधान संस्थान को इसमें महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान की गई है।
2.डिजिटल कृषि पर ब्रिक्स नेटवर्क
- यह कृत्रिम बुद्धिमत्ता, भू-स्थानिक प्रौद्योगिकी, डिजिटल लोक अवसंरचना तथा आँकड़ा-आधारित कृषि समाधानों के क्षेत्र में सहयोग को बढ़ावा देगा।
- भारत में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, दिल्ली इस नेटवर्क का समन्वय करेगा।
3.बीज प्रणालियों में किसानों के अधिकारों पर वैश्विक मंच
- इसका उद्देश्य किसानों के बीज अधिकारों, स्वदेशी बीजों की विविधता तथा पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण करना है।
4.ब्रिक्स एग्रीएन (कृषि निवेश, आनुवंशिक संसाधन एवं सूचना नेटवर्क)
- यह कृषि निवेशों, बीजों तथा आनुवंशिक संसाधनों के क्षेत्रों में सदस्य देशों के बीच सहयोग को सुदृढ़ करेगा।
ब्रिक्स का परिचय
- ब्रिक्स पाँच प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं यथा; ब्राजील,रूस,भारत,
चीन तथा दक्षिण अफ्रीका का समूह है।
- बाद में मिस्र, इथोपिया, ईरान, इंडोनेशिया तथा संयुक्त अरब अमीरात पूर्ण सदस्य के रूप में इसमें शामिल हुए।
- ब्रिक्स शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम वर्ष 2001 में अर्थशास्त्री जिम ओ’नील ने किया था।
- उत्पत्ति: एक औपचारिक समूह के रूप में ब्रिक की शुरुआत वर्ष 2006 में सेंट पिट्सबर्ग में आयोजित जी-8 संपर्क शिखर सम्मेलन के अवसर पर रूस, भारत और चीन के नेताओं की बैठक के बाद हुई।
- इसी वर्ष न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के अवसर पर आयोजित ब्रिक देशों के विदेश मंत्रियों की प्रथम बैठक में इस समूह को औपचारिक रूप दिया गया।
- प्रारंभ में इसे ब्रिक कहा जाता था। वर्ष 2010 में दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के बाद इसका नाम ब्रिक्स हो गया।
शिखर सम्मेलन
- वर्ष 2009 से ब्रिक्स देशों की सरकारें प्रतिवर्ष औपचारिक शिखर सम्मेलनों में भाग लेती रही हैं।
न्यू डेवेलपमेंट बैंक
- न्यू डेवेलपमेंट बैंक (पूर्व में ब्रिक्स विकास बैंक) ब्रिक्स देशों द्वारा स्थापित एक बहुपक्षीय विकास बैंक है।
- यह बैंक ऋण, गारंटी, अंशपूंजी भागीदारी तथा अन्य वित्तीय साधनों के माध्यम से सार्वजनिक एवं निजी परियोजनाओं को सहायता प्रदान करता है।
स्रोत : IE
अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध समाप्ति तथा होर्मुज़ जलडमरूमध्य को पुनः खोलने पर समझौता
पाठ्यक्रम: जीएस-2 / अंतरराष्ट्रीय संबंध
सन्दर्भ
- अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध समाप्त करने के लिए एक प्रारम्भिक समझौता हुआ है।
परिचय
- समझौते में सैन्य कार्रवाइयों को तत्काल रोकने तथा 60 दिनों की वार्ता अवधि निर्धारित करने का प्रावधान है। इसमें लेबनान से संबंधित सैन्य गतिविधियाँ भी शामिल हैं।
- अमेरिका ने अपने नौसैनिक अवरोध को हटाने की घोषणा की है, जिससे होर्मुज़ जलडमरूमध्य को वैश्विक नौवहन के लिए पुनः खोले जाने का मार्ग प्रशस्त हुआ है।
- इस कदम से अंतर्राष्ट्रीय समुद्री यातायात तथा ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखलाओं के सामान्य होने की संभावना बढ़ेगी
होर्मुज़ जलडमरूमध्य
- होर्मुज़ जलडमरूमध्य उत्तर में ईरान तथा दक्षिण में ओमान और यूनाइटेड अरब अमीरात के बीच स्थित है।
- यह फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी तथा अरब सागर से जोड़ता है।
- अपने सबसे संकरे भाग में इसकी चौड़ाई लगभग 33 किलोमीटर है, जबकि नौवहन मार्ग दोनों दिशाओं में केवल कुछ किलोमीटर चौड़े हैं।
- भारत के लगभग आधे कच्चे तेल के आयात तथा लगभग 60 प्रतिशत प्राकृतिक गैस आयात का परिवहन इसी जलडमरूमध्य से होकर होता है।

फ़ारस की खाड़ी
- फ़ारस की खाड़ी उत्तर में ईरान तथा दक्षिण में अरब प्रायद्वीप के बीच स्थित है।
- यह होर्मुज़ जलडमरूमध्य के माध्यम से अरब सागर से जुड़ती है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य विश्व के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री अवरोधक मार्गों (Maritime Chokepoints) में से एक माना जाता है।
- फ़ारस की खाड़ी भारत के लिए तेल एवं प्राकृतिक गैस का सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्रोत है।
- वर्ष 2025 में भारत के द्रवीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) आयात का लगभग 90 प्रतिशत, द्रवीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) आयात का लगभग 40 प्रतिशत तथा कच्चे तेल के आयात का लगभग 35 प्रतिशत फ़ारस की खाड़ी क्षेत्र से प्राप्त हुआ था।

स्रोत: TH
डीआरडीओ ने बहु-स्तरीय बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा क्षमता का सफल प्रदर्शन किया
पाठ्यक्रम: जीएस-3 / रक्षा
सन्दर्भ
- डीआरडीओ ने भारत की बहु-स्तरीय बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा प्रणाली (BMD) तथा मध्यम दूरी की नौसैनिक पोत-रोधी मिसाइल (NASM-MR) के सफल सत्यापन हेतु लगातार तीन उड़ान परीक्षण संपन्न किए।
बैलिस्टिक मिसाइल क्या हैं?
- बैलिस्टिक मिसाइल ऐसी मिसाइल होती है जिसे प्रारम्भ में रॉकेट द्वारा प्रक्षेपित किया जाता है और उसके बाद वह मुख्यतः गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव में एक वक्राकार पथ पर यात्रा करती है, जिसे बैलिस्टिक ट्रैजेक्टरी(Ballistic trajectory) कहा जाता है।

मिसाइल रक्षा प्रणाली क्या है?
- मिसाइल रक्षा एक समेकित सैन्य प्रणाली है, जिसे आने वाली मिसाइलों का पता लगाने, उनको ट्रैक करने, उन्हें इंटरसेप्ट करने तथा उनके निर्धारित लक्ष्य तक पहुँचने से पहले नष्ट करने के लिए विकसित किया जाता है। इसका उद्देश्य नागरिक आबादी, सैन्य प्रतिष्ठानों तथा महत्त्वपूर्ण अवसंरचना की सुरक्षा करना है।
- मिसाइल रक्षा प्रणालियाँ उपग्रहों, रडारों, कमान केन्द्रों तथा अवरोधक मिसाइलों के एक ऐसे नेटवर्क पर आधारित होती हैं, जो वास्तविक समय में मिलकर खतरों को निष्क्रिय करते हैं।
भारत की मिसाइल रक्षा संरचना
- ये डीआरडीओ के अंतर्गत बहु-स्तरीय बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा (BMD) प्रणाली है।
- पृथ्वी एयर डिफेंस (PAD) इंटरसेप्टर को वायुमंडल के बाहर इंटरसेप्ट करने के लिए विकसित किया गया है। यह 50 किलोमीटर से 180 किलोमीटर की ऊँचाई पर आने वाली मिसाइलों को इंटरसेप्ट कर सकता है।
- एडवांस्ड एयर डिफेंस (AAD) इंटरसेप्टर को अंतिम चरण में वायुमंडल के भीतर इंटरसेप्ट करने के लिए विकसित किया गया है। यह पृथ्वी के वायुमंडल के भीतर 30 किलोमीटर तक की ऊँचाई पर खतरों को निष्क्रिय करने में सक्षम है।
स्तरीय वायु रक्षा कवच (Layered Air Defence Shield)
S-400 Triumf
- यह रूस द्वारा विकसित अत्याधुनिक, गतिशील भू-से-आकाश मिसाइल प्रणाली है।
- भारत ने अपनी दीर्घ-दूरी वायु रक्षा क्षमता को सुदृढ़ करने के लिए इसे शामिल किया है।
मध्यम दूरी (70–100 किलोमीटर):
- बराक-8 (MRSAM/LRSAM), जिसे भारत और इज़राइल ने संयुक्त रूप से विकसित किया है।
- यह भूमि तथा नौसैनिक परिसंपत्तियों को 360 डिग्री सुरक्षा प्रदान करता है।
लघु दूरी (25–50 किलोमीटर):
- स्वदेशी आकाश वायु रक्षा प्रणाली तथा इज़राइल की स्पाइडर प्रणाली रणनीतिक स्थलों एवं गतिशील सैन्य इकाइयों की सुरक्षा करती हैं।
- मिशन सुदर्शन चक्र: मिशन सुदर्शन चक्र वर्ष 2035 के लिए घोषित एक व्यापक दृष्टि है। इसका उद्देश्य कृत्रिम बुद्धिमत्ता-सक्षम, सर्वसमावेशी राष्ट्रीय सुरक्षा कवच का निर्माण करना है।
- यह पहल भारत की वायु एवं मिसाइल रक्षा क्षमताओं को एकीकृत करते हुए बहु-स्तरीय, त्वरित एवं बुद्धिमान सुरक्षा तंत्र विकसित करने पर केंद्रित है।
स्रोत : IE
2027 के बाद राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में सर्वावैक को शामिल किए जाने की संभावना
पाठ्यक्रम: जीएस-2 / स्वास्थ्य
चर्चा में क्यों ?
- सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (SII) द्वारा विकसित तथा जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) के सहयोग से निर्मित एचपीवी टीका ‘सर्वावैक’ को वर्ष 2027 के बाद राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल किए जाने की संभावना है।
परिचय
- सर्वावैक, भारत का पहला स्वदेशी रूप से विकसित मानव पैपिलोमा विषाणु (HPV) टीका है।
- वर्तमान में इसे दो-खुराक शेड्यूल के अनुसार दिया जाता है, जिसके कारण इसे राष्ट्रीय एचपीवी टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल करने में सीमाएँ रही हैं।
- वर्तमान में चल रहे एक नैदानिक परीक्षण में एकल-खुराक व्यवस्था की प्रभावशीलता का मूल्यांकन किया जा रहा है, जिसके परिणाम अगले वर्ष आने की अपेक्षा है।
- इसी वर्ष स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने 14 वर्ष की बालिकाओं को लक्षित करते हुए एमएसडी के गार्डासिल टीके(MSD’s Gardasil vaccine) के माध्यम से देशव्यापी एचपीवी टीकाकरण अभियान प्रारम्भ किया था।
मानव पैपिलोमा विषाणु (HPV)
- एचपीवी एक सामान्य यौन-संचारित संक्रमण है। इसके अधिकांश संक्रमण लक्षणरहित होते हैं तथा स्वतः समाप्त हो जाते हैं।
- प्रकृति: एचपीवी, पैपिलोमाविरिडी कुल का एक डीएनए वायरस है।
- एचपीवी से होने वाले रोग:
- गर्भाशय-ग्रीवा कैंसर (95 प्रतिशत से अधिक मामलों का संबंध एचपीवी संक्रमण से होता है)।
अन्य कैंसर:
- गुदा(anal)कैंसर
- योनि (vaginal)कैंसर
- भग (vulvar)कैंसर
- शिश्न (penile)कैंसर
- मुख एवं गले के पिछले भाग (oropharyngeal )का कैंसर।
- जननांग मस्से(Genital warts) (गैर-कैंसरकारी रोग)।
उच्च-जोखिम एवं निम्न-जोखिम प्रकार
- एचपीवी प्रकार 16 और 18 उच्च-जोखिम वाले प्रकार हैं, जो गर्भाशय-ग्रीवा कैंसर के अधिकांश मामलों के लिए उत्तरदायी हैं।
- भारत में 80 प्रतिशत से अधिक गर्भाशय-ग्रीवा कैंसर मामलों का संबंध इन्हीं प्रकारों से है।
- एचपीवी प्रकार 6 और 11 निम्न-जोखिम वाले प्रकार हैं, जो मुख्यतः जननांग मस्सों का कारण बनते हैं।
- एचपीवी टीकाकरण: एचपीवी टीका सबसे खतरनाक एचपीवी प्रकारों से होने वाले संक्रमण की रोकथाम करता है।
- यह टीका यौन जीवन प्रारम्भ होने से पहले, सामान्यतः 9 से 14 वर्ष की आयु में दिए जाने पर सर्वाधिक प्रभावी होता है।
क्या आप जानते हैं?
- गर्भाशय-ग्रीवा कैंसर भारतीय महिलाओं में दूसरा सबसे सामान्य कैंसर है।
- भारत में प्रतिवर्ष इसके लगभग 1.25 लाख नए मामले सामने आते हैं तथा लगभग 75,000 महिलाओं की मृत्यु इस रोग के कारण होती है।
स्रोत : IE