पाठ्यक्रम: जीएस-2/अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध
संदर्भ
- हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री की फ्रांस यात्रा ने प्रौद्योगिकी, नवाचार, रक्षा तथा रणनीतिक स्वायत्तता पर केंद्रित बढ़ती भारत–फ्रांस साझेदारी को और सुदृढ़ किया है। इस यात्रा में एवियन में आयोजित G-7 शिखर सम्मेलन के अवसर पर फ्रांस के राष्ट्रपति के साथ हुई बैठकें भी शामिल थीं।
भारत–फ्रांस संबंधों की पृष्ठभूमि
- भारत और फ्रांस ने वर्ष 1947 में राजनयिक संबंध स्थापित किए तथा वर्ष 1998 में अपने संबंधों को रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक उन्नत किया।
- वर्षों के दौरान यह संबंध रक्षा, असैन्य परमाणु सहयोग और अंतरिक्ष जैसे पारंपरिक स्तंभों से आगे बढ़कर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), साइबर सुरक्षा, डिजिटल प्रौद्योगिकियों, स्वच्छ ऊर्जा, शिक्षा तथा नवाचार जैसे उभरते क्षेत्रों तक विस्तारित हो गया है।
- भारत–फ्रांस होराइजन 2047 रोडमैप, इनोवेशन ईयर 2026 तथा हाल ही में उन्नत की गई ‘स्पेशल ग्लोबल स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप’ के माध्यम से इस साझेदारी को और मजबूती मिली है, जो एक स्थिर, बहुध्रुवीय तथा नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के लिए दोनों देशों की साझा दृष्टि को दर्शाती है।
भारत–फ्रांस साझेदारी 2.0 की प्रमुख विशेषताएँ एवं परिणाम
प्रौद्योगिकी और नवाचार
- फ्रांस एयरोस्पेस, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), रोबोटिक्स तथा स्वच्छ प्रौद्योगिकियों में उन्नत क्षमताएँ प्रदान करता है, जबकि भारत मितव्ययी नवाचार (Frugal Innovation), डिजिटल शासन, स्टार्ट-अप पारिस्थितिकी तंत्र तथा बड़े पैमाने पर लागू की जा सकने वाली तकनीकी समाधानों में अपनी मजबूत क्षमताओं का योगदान देता है।
प्रमुख विकास इस प्रकार हैं:
भारत–फ्रांस इनोवेशन ईयर 2026 का संयुक्त उद्घाटन।
- नीस (Nice) में ‘भारत इनोवेट्स(Bharat Innovates)’ का शुभारंभ, जिसमें भारतीय स्टार्ट-अप्स, नवप्रवर्तकों तथा वेंचर कैपिटल फंड्स को एक मंच पर लाया गया।
- यूरोप के सबसे बड़े स्टार्ट-अप एवं प्रौद्योगिकी आयोजन वीवाटेक (VivaTech) 2026 में भारत की भागीदारी।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), साइबर सुरक्षा, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI), स्वास्थ्य प्रौद्योगिकियों, जैव प्रौद्योगिकी, हरित प्रौद्योगिकियों, रचनात्मक अर्थव्यवस्था तथा अनुसंधान में सहयोग का विस्तार।
रणनीतिक एवं आर्थिक सहयोग
- हालिया द्विपक्षीय सहभागिताओं से आर्थिक लचीलापन तथा तकनीकी साझेदारी को मजबूत करने के उद्देश्य से कई महत्वपूर्ण परिणाम प्राप्त हुए हैं।
- प्रमुख क्षेत्र: आपूर्ति शृंखला का विविधीकरण, रणनीतिक प्रौद्योगिकी सहयोग, सेमीकंडक्टर एवं डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र में सहयोग, निवेश एवं वेंचर कैपिटल साझेदारी तथा व्यापार एवं औद्योगिक सहयोग का विस्तार।
- वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के पुनर्गठन के दौर में भारत और फ्रांस विश्वसनीय आर्थिक साझेदारियाँ विकसित करना चाहते हैं, जिससे कमजोरियों में कमी आए तथा सतत विकास को बढ़ावा मिले।
रक्षा एवं अंतरिक्ष सहयोग
- राफेल लड़ाकू विमान तथा स्कॉर्पीन पनडुब्बी परियोजनाओं ने फ्रांस को भारत के सबसे विश्वसनीय रक्षा साझेदारों में से एक के रूप में स्थापित किया है।
- सह-डिज़ाइन एवं सह-विकास, रक्षा औद्योगिक सहयोग, आत्मनिर्भर भारत के अंतर्गत स्वदेशी विनिर्माण तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा पर बढ़ता हुआ ध्यान।
- भारत और फ्रांस के बीच इसरो तथा सीएनईएस (CNES)के मध्य दीर्घकालिक साझेदारी रही है। उभरते हुए सहयोगी क्षेत्रों में संयुक्त उपग्रह विकास, अंतरिक्ष स्थितिजन्य जागरूकता (Space Situational Awareness), जलवायु एवं महासागर निगरानी तथा मानव अंतरिक्ष उड़ान सहयोग शामिल हैं।
असैन्य परमाणु ऊर्जा में सहयोग
- असैन्य परमाणु सहयोग द्विपक्षीय संबंधों का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बना हुआ है।
प्रमुख क्षेत्र इस प्रकार हैं:
- जैतापुर परमाणु ऊर्जा परियोजना पर प्रगति, जिसके विश्व की सबसे बड़ी परमाणु ऊर्जा सुविधाओं में से एक बनने की संभावना है।
- लघु मॉड्यूलर रिएक्टरों (SMRs), परमाणु सुरक्षा तथा उन्नत रिएक्टर प्रौद्योगिकियों में सहयोग की संभावनाओं का अन्वेषण।
अफ्रीका और ग्लोबल साउथ (Global South)
- भारत और फ्रांस अफ्रीका को रणनीतिक सहयोग के एक महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में तेजी से मान्यता दे रहे हैं।
- सहयोग का दायरा: अवसंरचना विकास, क्षमता निर्माण, स्वास्थ्य सेवाएँ एवं डिजिटल संपर्क, जलवायु अनुकूलन क्षमता तथा पश्चिमी हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा।
- साझा दृष्टिकोण: दोनों देश वैश्विक संस्थाओं में विकासशील देशों के अधिक प्रतिनिधित्व की वकालत करते हैं तथा अंतर्राष्ट्रीय निर्णय-निर्माण में वैश्विक दक्षिण की आवाज़ को सशक्त बनाने का प्रयास करते हैं।
बहुध्रुवीय विश्व में रणनीतिक स्वायत्तता
- भारत–फ्रांस संबंधों की एक प्रमुख विशेषता रणनीतिक स्वायत्तता के प्रति उनकी साझा प्रतिबद्धता है।
- दोनों देश स्वतंत्र विदेश नीति निर्णय-निर्माण, मुद्दा-आधारित साझेदारियों, राष्ट्रीय हितों के संरक्षण तथा गठबंधन-आधारित दृष्टिकोणों के विपरीत एक बहुध्रुवीय अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के समर्थन पर बल देते हैं।
- इसी दृष्टिकोण ने भारत और फ्रांस को वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों, जिनमें यूक्रेन तथा पश्चिम एशिया के संघर्ष भी शामिल हैं, के बावजूद प्रभावी सहयोग बनाए रखने में सक्षम बनाया है।
वैश्विक शासन के भविष्य में भारत, फ्रांस और उनकी भूमिका
- G-7 शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी की भागीदारी भारत की बढ़ती वैश्विक प्रासंगिकता को दर्शाती है। G-7 के विस्तार कर उसे एक व्यापक ‘D10’ (Democratic Ten) ढाँचे में परिवर्तित करने संबंधी बढ़ती चर्चाओं के महत्वपूर्ण रणनीतिक निहितार्थ हैं।
D10 पर बहस क्यों महत्वपूर्ण है?
- संभावित D10 प्रमुख लोकतांत्रिक देशों को अधिक निकट रणनीतिक समन्वय में ला सकता है, प्रौद्योगिकी शासन (Technology Governance) तथा आपूर्ति श्रृंखलाओं से जुड़ी चुनौतियों का समाधान कर सकता है तथा भविष्य की वैश्विक आर्थिक एवं सुरक्षा संरचना को प्रभावित कर सकता है।
- ऐसी व्यवस्थाओं में भारत की भागीदारी अंतर्राष्ट्रीय मानकों एवं संस्थाओं के निर्माण में उसकी भूमिका को और सशक्त बनाएगी।
भारत–फ्रांस संबंधों में चिंताएँ एवं चुनौतियाँ
- परियोजनाओं के कार्यान्वयन में धीमापन: विशेषकर असैन्य परमाणु सहयोग से जुड़ी प्रमुख परियोजनाओं में विलंब।
- क्षमता से कम व्यापार: दोनों अर्थव्यवस्थाओं के आकार की तुलना में द्विपक्षीय व्यापार अभी भी अपेक्षाकृत सीमित है।
- नियामकीय एवं बाज़ार संबंधी बाधाएँ: मानकों और विनियमों में अंतर गहन आर्थिक एकीकरण में बाधा उत्पन्न कर सकता है।
- रक्षा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण: सह-विकास तथा उन्नत प्रौद्योगिकियों के हस्तांतरण में अधिक प्रगति की आवश्यकता है।
- जन-से-जन संपर्क की सीमितता: शैक्षणिक, सांस्कृतिक तथा गतिशीलता (Mobility) से जुड़े संबंधों को और मजबूत करने की आवश्यकता है।
- रणनीतिक बाज़ारों में प्रतिस्पर्धा: रक्षा निर्यात तथा प्रौद्योगिकी बाज़ार जैसे क्षेत्रों में दोनों देश कभी-कभी प्रतिस्पर्धी भी हो सकते हैं।
आगे की राह: भारत, फ्रांस और वैश्विक शासन का भविष्य
- प्रौद्योगिकी साझेदारी को गहरा बनाना: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सेमीकंडक्टर, क्वांटम प्रौद्योगिकियों, साइबर सुरक्षा तथा डिजिटल शासन में सहयोग को और मजबूत करना।
- रक्षा सह-उत्पादन में तेजी लाना: क्रेता-विक्रेता संबंधों से आगे बढ़कर रक्षा प्लेटफॉर्मों के संयुक्त डिज़ाइन, विनिर्माण तथा निर्यात पर बल देना।
- स्वच्छ ऊर्जा सहयोग को आगे बढ़ाना: परमाणु ऊर्जा, हाइड्रोजन, नवीकरणीय ऊर्जा तथा जलवायु प्रौद्योगिकियों में सहयोग को तीव्र गति से आगे बढ़ाना।
- अफ्रीका में पहुँच को सुदृढ़ बनाना: स्वास्थ्य, शिक्षा, संपर्कता तथा क्षमता निर्माण पर केंद्रित संयुक्त विकास पहलों का विकास करना।
- वैश्विक संस्थाओं में सुधार: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, बहुपक्षीय विकास बैंकों तथा वैश्विक शासन तंत्रों में सुधारों की वकालत हेतु मिलकर कार्य करना।
- नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देना: इनोवेशन ईयर ढाँचे के अंतर्गत स्टार्ट-अप साझेदारियों, अनुसंधान सहयोग तथा शैक्षणिक आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करना।
निष्कर्ष
- भारत–फ्रांस साझेदारी एक पारंपरिक रणनीतिक संबंध से विकसित होकर एक व्यापक प्रौद्योगिकी एवं नवाचार-प्रेरित गठबंधन का रूप ले रही है।
- दोनों देश रक्षा, अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा, डिजिटल प्रौद्योगिकियों तथा ग्लोबल साउथ से संबंधित पहलों में पारस्परिक विश्वास, रणनीतिक स्वायत्तता तथा साझा लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर बढ़ते सहयोग में संलग्न हैं।
- जैसे-जैसे भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा तीव्र हो रही है और विश्व बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर अग्रसर है, भारत और फ्रांस अधिक संतुलित, समावेशी तथा सुदृढ़ अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के निर्माण में महत्वपूर्ण स्थिरतादायक शक्तियों के रूप में उभर सकते हैं।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न] भारत और फ्रांस ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को एक पारंपरिक रणनीतिक साझेदारी से आगे बढ़ाकर प्रौद्योगिकी, नवाचार, रक्षा तथा रणनीतिक स्वायत्तता के प्रति साझा प्रतिबद्धता पर आधारित ‘विशेष वैश्विक रणनीतिक साझेदारी’ में परिवर्तित कर दिया है। भारत–फ्रांस साझेदारी के प्रमुख स्तंभों का परीक्षण कीजिए। (250 शब्द) |
स्रोत: TH
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