पाठ्यक्रम: GS1/समाज
संदर्भ
- भारत में तीव्र डिजिटलकरण तथा प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) प्रणालियों के विस्तार के बावजूद दिव्यांगजन पेंशन व्यवस्था अब भी खंडित, अपर्याप्त तथा राज्यों के बीच असमान बनी हुई है।
भारत में दिव्यांग कल्याण की वर्तमान स्थिति
- 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 2.68 करोड़ दिव्यांगजन (कुल जनसंख्या का 2.21 प्रतिशत) थे। जनसंख्या वृद्धि तथा बदलती स्वास्थ्य परिस्थितियों के कारण हालिया अनुमानों के अनुसार यह संख्या 4.5 से 6 करोड़ के बीच हो सकती है।
- दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (RPwD), 2016 ने मान्यता प्राप्त दिव्यांगताओं की श्रेणियों को 7 से बढ़ाकर 21 कर दिया तथा समानता, शिक्षा, रोजगार, सुगम्यता और सामाजिक सुरक्षा से संबंधित अधिकारों की गारंटी प्रदान की।
- प्रमुख सरकारी पहलों में शामिल हैं—
- राष्ट्रीय दिव्यांगता डेटाबेस हेतु विशिष्ट दिव्यांग पहचान पत्र (UDID) परियोजना।
- सार्वजनिक स्थलों एवं सेवाओं में सुगम्यता बढ़ाने हेतु सुगम्य भारत अभियान ।
- आय सहायता प्रदान करने हेतु इंदिरा गांधी राष्ट्रीय दिव्यांग पेंशन योजना (IGNDPS)।
- पीएम-दक्ष (PM-DAKSH) जैसी कौशल विकास योजनाएँ।
- इन उपायों के बावजूद दिव्यांग पेंशन व्यवस्था अभी भी खंडित एवं अपर्याप्त बनी हुई है। अधिकांश राज्यों में पेंशन राशि केवल ₹300–₹500 प्रतिमाह है तथा कवरेज भी सीमित है।
वर्तमान प्रणाली की प्रमुख चुनौतियाँ
- खंडित एवं असमान पेंशन संरचना: दिव्यांग पेंशन राज्यों के बीच भिन्न-भिन्न है क्योंकि पात्रता मानदंड, लाभ राशि तथा कार्यान्वयन तंत्र में पर्याप्त अंतर पाया जाता है।
- ऐसी असमानताएँ समानता के सिद्धांत को कमजोर करती हैं।
- अपर्याप्त वित्तीय सहायता: वर्तमान पेंशन राशि मूलभूत जीवन-यापन व्यय, स्वास्थ्य देखभाल, सहायक उपकरणों की आवश्यकता तथा गतिशीलता संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
- प्रशासनिक जटिलता: प्रमाणीकरण, सत्यापन तथा लाभ वितरण में अनेक एजेंसियाँ शामिल होती हैं, जिसके कारण प्रायः विलंब, बहिष्करण संबंधी त्रुटियाँ तथा जवाबदेही संबंधी कमियाँ उत्पन्न होती हैं।
- कम सार्वजनिक व्यय: भारत दिव्यांग कल्याण पर सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का केवल लगभग 0.02 प्रतिशत व्यय करता है, जो अनेक विकासशील एवं विकसित देशों की तुलना में काफी कम है।
- अधिकार-आधारित दृष्टिकोण का अभाव: दिव्यांग पेंशन अभी भी मुख्यतः कल्याणकारी सहायता के रूप में कार्य करती है, न कि एक प्रवर्तनीय सामाजिक सुरक्षा अधिकार के रूप में, जो कि RPwD अधिनियम, 2016 की भावना के विपरीत है।
दिव्यांग पेंशन के आर्थिक आवश्यकता होने के कारण
- बहिष्करण की आर्थिक लागत: विश्व बैंक तथा संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) के अनुमानों के अनुसार, निम्न एवं मध्यम आय वाले देशों को शिक्षा, रोजगार तथा सामाजिक सुरक्षा प्रणालियों से दिव्यांगजनों के बहिष्करण के कारण GDP का 3–7 प्रतिशत तक हानि होती है।
- सकारात्मक आर्थिक गुणक प्रभाव: दिव्यांग आय सहायता से घरेलू उपभोग में वृद्धि होती है, आर्थिक लचीलापन सुदृढ़ होता है, निर्धनता में कमी आती है तथा श्रम बाजार में भागीदारी को प्रोत्साहन मिलता है।
- अनुमानतः इसका राजकोषीय गुणक 1.4 से 1.6 के बीच है, अर्थात् व्यय किया गया प्रत्येक रुपया व्यापक आर्थिक गतिविधियों को उत्पन्न करता है।
- अंतरराष्ट्रीय साक्ष्य: प्रो बोनो इकोनॉमिक्स (2025) के अनुसार, दिव्यांग आय सहायता से प्राप्त सामाजिक-आर्थिक लाभ कार्यक्रम की लागत से लगभग 48 प्रतिशत अधिक होते हैं।
- अतः दिव्यांग पेंशन सामाजिक संरक्षण, गरीबी उन्मूलन, आर्थिक प्रोत्साहन तथा मानव पूंजी निवेश के प्रभावी साधन के रूप में कार्य करती है।
न्यूनतम सार्वभौमिक दिव्यांग पेंशन आधार दर (MUDPFR) की आवश्यकता
- MUDPFR सभी पात्र दिव्यांगजनों को, उनके राज्य निवास की परवाह किए बिना, राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित न्यूनतम पेंशन की गारंटी प्रदान करेगा, जबकि राज्यों को अतिरिक्त राशि (टॉप-अप) देने की स्वतंत्रता होगी।
- संवैधानिक एवं विधिक आधार: यह प्रस्ताव निम्नलिखित प्रावधानों से वैधता प्राप्त करता है—
- अनुच्छेद 14 : विधि के समक्ष समानता।
- अनुच्छेद 21 : गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार।
- अनुच्छेद 41 : दिव्यांगता की स्थिति में सार्वजनिक सहायता।
- RPwD अधिनियम, 2016 की धारा 24 : सामाजिक सुरक्षा एवं पेंशन सहायता।
- राजकोषीय व्यवहार्यता: खाद्य सब्सिडी, अवसंरचना तथा अन्य कल्याणकारी कार्यक्रमों पर होने वाले व्यय की तुलना में ऐसा व्यय वित्तीय दृष्टि से वहनीय एवं सतत है।
वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाएँ
- कई देशों ने राष्ट्रीय स्तर पर एकसमान दिव्यांग सहायता प्रणालियाँ अपनाई हैं—
- दक्षिण अफ्रीका : राष्ट्रीय दिव्यांग अनुदान ।
- ब्राज़ील: बेनेफिसियो डे प्रेस्टासाओ कंटिनुआडा।
- ऑस्ट्रेलिया : दिव्यांग सहायता पेंशन ।
- न्यूज़ीलैंड :राष्ट्रीय दिव्यांग आय सहायता।
- केन्या, रवांडा, थाईलैंड और इंडोनेशिया:राष्ट्रीय दिव्यांग सहायता कार्यक्रम।
- ये प्रणालियाँ दर्शाती हैं कि केंद्रीय स्तर पर निर्धारित मानक एकरूपता, पोर्टेबिलिटी, पारदर्शिता तथा समावेशन को बेहतर बनाते हैं।
संस्थागत सुधार की आवश्यकता
- प्रस्तावित राष्ट्रीय दिव्यांग पेंशन प्राधिकरण (NDPA): भारत एक समर्पित प्राधिकरण की स्थापना कर सकता है, जो निम्नलिखित कार्यों के लिए उत्तरदायी हो—
- एकसमान पात्रता मानक: पारदर्शी एवं राष्ट्रीय स्तर पर लागू पात्रता मानदंडों का निर्धारण।
- राष्ट्रीय दिव्यांग रजिस्ट्री: लाभार्थियों की निर्बाध पहचान हेतु UDID, आधार तथा DBT प्लेटफॉर्म का एकीकरण।
- पोर्टेबिलिटी: राज्यों के बीच प्रवास की स्थिति में भी लाभों की निरंतरता सुनिश्चित करना।
- शिकायत निवारण: सुलभ एवं समयबद्ध शिकायत समाधान तंत्र उपलब्ध कराना।
- प्रदर्शन निगरानी: राज्य स्तर पर कार्यान्वयन एवं परिणामों का मूल्यांकन एवं अनुश्रवण।
- पेंशन को रोजगार से जोड़ना: अंतरराष्ट्रीय अनुभव दर्शाते हैं कि दिव्यांग पेंशन तब अधिक प्रभावी होती है जब उसे रोजगार एवं कौशल विकास कार्यक्रमों के साथ एकीकृत किया जाता है।
- इससे दिव्यांगजन निर्भरता से आगे बढ़कर उत्पादक आर्थिक भागीदारी की ओर अग्रसर हो सकते हैं।
- भारत निम्नलिखित योजनाओं के साथ अभिसरण को सुदृढ़ कर सकता है—
- पीएम-दक्ष (PM-DAKSH) कौशल विकास पहलें;
- राष्ट्रीय प्रशिक्षुता प्रोत्साहन योजना (NAPS);
- नियोक्ता प्रोत्साहन कार्यक्रम;
- सुलभ कार्यस्थल नीतियाँ;
- सहायक प्रौद्योगिकी समर्थन।
- अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के संदर्भ में प्रासंगिकता: एक सार्वभौमिक दिव्यांग पेंशन ढाँचा निम्नलिखित के प्रति भारत की प्रतिबद्धताओं को सुदृढ़ करेगा—
- विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (UNCRPD);
- सतत विकास लक्ष्य का लक्ष्य 1.3 (सामाजिक संरक्षण);
- अंतरराष्ट्रीयश्रम संगठन की सामाजिक संरक्षण न्यूनतम स्तर संबंधी अनुशंसा;
- G20 नई दिल्ली नेताओं की घोषणा में निहित समावेशी विकास संबंधी पहलियाँ।
आगे की राह
- भारत पहले ही आधार-सक्षम DBT, UPI, पीएम-किसान, खाद्य सुरक्षा कार्यक्रमों तथा स्वास्थ्य बीमा योजनाओं के माध्यम से बड़े पैमाने पर कल्याणकारी लाभों के वितरण की अपनी क्षमता प्रदर्शित कर चुका है।
- आवश्यक तकनीकी अवसंरचना उपलब्ध है; चुनौती केवल नीतिगत प्राथमिकता निर्धारण की है।
- न्यूनतम सार्वभौमिक दिव्यांग पेंशन आधार दर (MUDPFR)—
- न्यूनतम आय सुरक्षा सुनिश्चित करेगी;
- अंतरराज्यीय असमानताओं को कम करेगी;
- गरिमा एवं समानता को प्रोत्साहन देगी;
- समावेशी विकास को सुदृढ़ करेगी; तथा
- संवैधानिक नैतिकता को आगे प्रोत्साहित करेगी।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न]: भारत में दिव्यांगजन (PwDs) द्वारा कल्याणकारी लाभों तक पहुँच प्राप्त करने में सामना की जाने वाली चुनौतियों का परीक्षण कीजिए। दिव्यांग व्यक्तियों के लिए समान व्यवहार एवं गरिमापूर्ण जीवन सुनिश्चित करने हेतु राष्ट्रीय स्तर पर एक समान ढाँचे की आवश्यकता पर चर्चा कीजिए। |
स्रोत: TH
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दिव्यांग व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार