सूरहा ताल : भारत का 100वाँ रामसर स्थल
पाठ्यक्रम: GS-3 / पर्यावरण
संदर्भ
- उत्तर प्रदेश के बलिया जिले स्थित जयप्रकाश नारायण पक्षी विहार (सूरहा ताल) को भारत के 100वें रामसर स्थल के रूप में नामित किया गया है।
परिचय
- वर्ष 1991 में स्थापित यह पक्षी विहार सूरहा ताल के आसपास विकसित है, जो गंगा नदी के बदलते प्रवाह मार्ग से निर्मित एक प्राकृतिक एवं बारहमासी ऑक्सबो झील है।
- यह गंगा एवं घाघरा नदियों के संगम के निकट इंडो-गंगा के मैदान में स्थित है।
- यहाँ साइबेरिया एवं मध्य एशिया से आने वाले अनेक प्रवासी पक्षियों का आवास है, जिनमें प्रमुख हैं—
- ग्रेलैग गूज
- पिनटेल
- कॉमन टील
- बार-हेडेड गूज
- स्थानीय पक्षी प्रजातियों में सारस, हेरॉन तथा कॉर्मोरेंट प्रमुख हैं।
रामसर अभिसमय
- रामसर आर्द्रभूमि अभिसमय पर वर्ष 1971 में ईरान के रामसर नगर में हस्ताक्षर किए गए थे।
- यह अभिसमय वर्ष 1975 में प्रभावी हुआ।
- भारत 1 फरवरी 1982 को इसका पक्षकार बना।
- वर्तमान में विश्वभर में 2,500 से अधिक रामसर स्थल अधिसूचित हैं।
स्रोत: AIR
आइसोब्यूटेनॉल
पाठ्यक्रम: GS-3 / विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
संदर्भ
- भारत द्वारा एथेनॉल से आगे बढ़कर अपनी जैव-ईंधन रणनीति का विस्तार किए जाने के बीच, सरकार कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने के लिए 15% तक आइसोब्यूटेनॉल मिश्रित डीज़ल के उपयोग का मूल्यांकन कर रही है।
परिचय
- आइसोब्यूटेनॉल एक अल्कोहल-आधारित जैव ईंधन है, जिसे वैकल्पिक ईंधन के रूप में डीज़ल में मिश्रित किया जा सकता है।
- इसमें उच्च ऊर्जा सामग्री होती है तथा इसके दहन गुण पारंपरिक हाइड्रोकार्बन ईंधनों के अधिक निकट होते हैं।
- इसके परिणामस्वरूप एथेनॉल की तुलना में बेहतर ईंधन दक्षता प्राप्त होती है तथा वाहन की माइलेज पर अपेक्षाकृत कम प्रभाव पड़ता है।
- यह वायुमंडल से कम नमी अवशोषित करता है, जिससे भंडारण एवं ईंधन प्रणाली से जुड़ी चुनौतियाँ कम होती हैं।
- यह ईंधन प्रणाली के घटकों, पाइपलाइनों एवं भंडारण अवसंरचना के लिए अपेक्षाकृत कम संक्षारक (Corrosive) है।
- वर्तमान इंजनों एवं ईंधन वितरण नेटवर्क में अपेक्षाकृत कम संशोधनों के साथ इसका उपयोग किया जा सकता है।
स्रोत: India Today
जन समर्थ पोर्टल
पाठ्यक्रम: GS-2 / सरकारी पहलें
संदर्भ
- जन समर्थ पोर्टल ने डिजिटल वित्तीय समावेशन तथा निर्बाध ऋण वितरण को बढ़ावा देने के अपने चार वर्ष पूर्ण कर लिए हैं।
परिचय
- वर्ष 2022 में प्रारंभ किया गया जन समर्थ पोर्टल 16 ऋण-संबद्ध सरकारी योजनाओं के अंतर्गत लाभ प्राप्त करने हेतु एक एकल-खिड़की डिजिटल मंच है।
- यह कृषि, व्यवसाय, आवास, नवीकरणीय ऊर्जा एवं आजीविका जैसे क्षेत्रों में संस्थागत ऋण तक पहुँच को सुगम बनाता है।
- यह पोर्टल 8 भाषाओं में उपलब्ध है।
- इस पर बैंकों, गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) तथा सहकारी बैंकों सहित 269 ऋणदाता संस्थानों को जोड़ा गया है।
- यह पोर्टल पूर्णतः डिजिटल ऋण प्रसंस्करण की सुविधा प्रदान करता है।
- इसके अंतर्गत UIDAI, UDYAM, AgriStack, GST तथा केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) जैसे डेटाबेस के माध्यम से वास्तविक समय सत्यापन किया जाता है।
स्रोत: PIB
विदेशी निवेशकों के लिए कर-मुक्त सरकारी बॉन्ड
पाठ्यक्रम: GS-3 / अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- भारत सरकार ने 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी रूप से विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) तथा विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) के सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश पर पूँजीगत लाभ कर तथा स्रोत पर कर कटौती को समाप्त कर दिया है।
प्रमुख प्रावधान
- विदेशी निवेशकों को अब निम्न करों का भुगतान नहीं करना होगा—
- सरकारी बॉन्ड निवेश पर 12.5% दीर्घकालिक पूँजीगत लाभ कर
- सरकारी बॉन्ड निवेश पर 30% अल्पकालिक पूँजीगत लाभ कर
- सरकारी प्रतिभूतियों से अर्जित ब्याज आय पर स्रोत पर कर कटौती
- यह कर छूट विदेशी संस्थागत निवेशकों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय निपटान बैंक (BIS) पर भी लागू होगी।
निर्णय के पीछे कारण
- इस उपाय का उद्देश्य विदेशी पूँजी प्रवाह को आकर्षित करना तथा भारत के ऋण बाजार को सुदृढ़ करना है।
- यह कदम रुपये को समर्थन देने, अनुमानित भुगतान संतुलन ( BoP) घाटे को कम करने तथा कमजोर विदेशी निवेश प्रवाह के बीच बाह्य क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ाने में सहायक होगा।
प्रमुख आर्थिक शब्द
- दीर्घकालिक पूँजीगत लाभ कर (LTCG Tax): यह कर उन लाभों पर लगाया जाता है जो सरकारी प्रतिभूतियों को 12 महीने से अधिक समय तक रखने के बाद उनकी बिक्री से अर्जित होते हैं।
- अल्पकालिक पूँजीगत लाभ कर (STCG Tax): यह कर उन लाभों पर लगाया जाता है जो सरकारी प्रतिभूतियों को 12 महीने या उससे कम अवधि तक रखने के बाद उनकी बिक्री से अर्जित होते हैं।
- स्रोत पर कर कटौती : यह कर गैर-निवासी निवेशकों द्वारा सरकारी बॉन्ड से अर्जित ब्याज आय पर स्रोत पर ही काटा जाने वाला कर है।
स्रोत: IE
वित्त वर्ष 2025–26 में भारत की जीडीपी वृद्धि 7.7%
पाठ्यक्रम: GS-3 / अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- आर्थिक एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा जारी वित्त वर्ष 2025–26 के प्रोविजनल जीडीपी अनुमान के अनुसार भारत की अर्थव्यवस्था में 7.7% की वृद्धि दर्ज की गई है। यह विगत अनुमान 7.6% से अधिक तथा वित्त वर्ष 2024–25 में दर्ज 7.1% वृद्धि से उल्लेखनीय रूप से ऊँची है।
प्रमुख तथ्य
- विनिर्माण आधारित विस्तार: विनिर्माण क्षेत्र ने वित्त वर्ष 2025–26 में 10.7% की मजबूत वृद्धि दर्ज की।
- सेवा क्षेत्र का बेहतर प्रदर्शन: व्यापार, मरम्मत, होटल, परिवहन, संचार, प्रसारण एवं भंडारण से संबंधित सेवा क्षेत्र में 11% की वृद्धि दर्ज की गई।
- उपभोग आधारित वृद्धि: निजी अंतिम उपभोग व्यय ( PFCE), जो घरेलू खर्च का प्रमुख संकेतक है, में 7.7% की वृद्धि हुई।
- निवेश गतिविधियों में वृद्धि: सकल स्थिर पूँजी निर्माण ( GFCF), जो निवेश एवं परिसंपत्ति सृजन का संकेतक है, में 8.2% की वृद्धि दर्ज की गई।
वृद्धि के प्रमुख कारक
- संरचनात्मक सुधार: निरंतर आर्थिक सुधारों के कार्यान्वयन ने उत्पादकता एवं व्यवसाय दक्षता में सुधार किया।
- सुदृढ़ घरेलू मांग: उपभोग व्यय में वृद्धि ने वस्तुओं एवं सेवाओं की मांग को बढ़ाया, जिससे विकास मुख्यतः घरेलू आर्थिक आधारों द्वारा संचालित रहा।
- पूँजीगत व्यय में वृद्धि: सरकारी अवसंरचना पर बढ़े हुए पूँजीगत व्यय ने निवेश गति को सुदृढ़ किया तथा विनिर्माण, निर्माण एवं सेवा क्षेत्रों में गुणक प्रभाव उत्पन्न किया।
सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के बारे में
- सकल घरेलू उत्पाद (GDP) किसी देश की घरेलू सीमा के अंदर एक निश्चित अवधि (त्रैमासिक या वार्षिक) में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के कुल मौद्रिक मूल्य को दर्शाता है।
- जारीकर्ता संस्थान: राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO), MoSPI द्वारा जारी किया जाता है।
- आधार वर्ष : वर्तमान आधार वर्ष: 2022–23
- जीडीपी की गणना की विधियाँ
- व्यय विधि : इसमें अर्थव्यवस्था में अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं पर किए गए सभी व्ययों का योग किया जाता है।
- आय विधि : इसमें उत्पादन के सभी साधनों (श्रम, पूँजी आदि) द्वारा अर्जित आय का योग किया जाता है।
- उत्पादन/मूल्य संवर्धन विधि: इसमें उत्पादन प्रक्रिया के प्रत्येक चरण में सृजित मूल्य का योग किया जाता है।
स्रोत: AIR
आधार वर्ष 2022-23 के साथ जिला घरेलू उत्पाद (DDP) अनुमान
पाठ्यक्रम: GS-3 / अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO), सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा आधार वर्ष 2022-23 के साथ जिला घरेलू उत्पाद (DDP) के संकलन हेतु मसौदा दिशा-निर्देश (Draft Guidelines) जारी किए गए हैं।
परिचय
- यह दिशा-निर्देश राज्य एवं केंद्र शासित प्रदेशों में जिला घरेलू उत्पाद के संकलन हेतु एक व्यापक एवं एकरूप ढाँचा प्रदान करता है।
- उद्देश्य: संशोधित आधार वर्ष 2022-23 के अंतर्गत जिला स्तर के आर्थिक आकलनों में संगति , तुलनीयता तथा पद्धतिगत मानकीकरण सुनिश्चित करना।
जिला घरेलू उत्पाद (DDP)
- जिला घरेलू उत्पाद (DDP) ऐसे सांख्यिकीय माप हैं, जिनका उपयोग किसी निश्चित अवधि में किसी जिले के अंदर उत्पादित वस्तुओं एवं सेवाओं के कुल मूल्य की गणना के लिए किया जाता है।
- यह राज्य स्तर पर सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) तथा राष्ट्रीय स्तर पर सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के तुलनीय, लेकिन अधिक सूक्ष्म स्तर के आर्थिक संकेतक हैं, जो जिलों की आर्थिक संरचना एवं प्रदर्शन पर विस्तृत जानकारी प्रदान करते हैं।
- उपयोगिता: विभिन्न जिलों के आर्थिक प्रदर्शन की तुलना करने में सहायक
- पिछड़े क्षेत्रों की पहचान करने में उपयोगी
- स्थानीय विकास योजनाओं के निर्माण एवं नीति निर्धारण में सहायक
सूर्य के 11-वर्षीय गतिविधि चक्र से जुड़े नए संकेतों का अध्ययन
पाठ्यक्रम: GS-3 / विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी / अंतरिक्ष
संदर्भ
- कोडाइकनाल सौर वेधशाला , जो भारत में सौर डेटा के सबसे लंबे सतत संग्रह के लिए जानी जाती है, ने भविष्य में सौर चक्र की भविष्यवाणी से संबंधित महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टियाँ प्रदान की हैं।
परिचय
- सूर्य में उत्पन्न ऊर्जा को उसके बाह्य परतों में संवहन प्रक्रिया के माध्यम से स्थानांतरित किया जाता है।
- संवहन कोशिकाएँ छोटे पैमाने की ग्रैनुलेशन तथा बड़े पैमाने की सुपरग्रैनुलेशन संरचनाओं का निर्माण करती हैं।
- ये संरचनाएँ सूर्य की सतह पर एक जाल जैसी संरचना बनाती हैं।
- इन कोशिकाओं का औसत जीवनकाल लगभग 24 घंटे होता है।
- इनका आकार लगभग 30,000 किलोमीटर होता है।
- ठंडी अंतर-ग्रैन्युलर धारियों की चौड़ाई लगभग 6,000 किलोमीटर होती है।
- सुपरग्रैनुलेशन की उत्पत्ति, आकार तथा 11-वर्षीय सौर चक्र से इनके संबंध को अभी तक पूर्ण रूप से समझा नहीं गया है।
- हालिया अध्ययन: भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान द्वारा कोडाइकनाल सौर वेधशाला के 100 वर्षों से अधिक पुराने डेटा के आधार पर किए गए एक अध्ययन ने इन प्रश्नों पर नई रोशनी डाली है।
- प्रमुख निष्कर्ष: सुपरग्रैन्युलर गुण, जैसे कि धारियों की चौड़ाई एवं तीव्रता, स्थानीय चुंबकीय फ्लक्स तथा सौर गतिविधि स्तरों से प्रभावित होते हैं।
- विश्लेषण से यह पुष्टि हुई है कि यद्यपि कोई भी एक अक्षांश सौर चक्र का पूर्णतः अनुसरण नहीं करता, फिर भी विशिष्ट अक्षांशों पर विभिन्न मानकों के बीच महत्वपूर्ण सहसंबंध पाए जाते हैं।
- यह अध्ययन सौर गतिविधि की भविष्यवाणी में इन सहसंबंधों के महत्व को रेखांकित करता है।
सौर चक्र
- सौर चक्र वह चक्र है जिसमें सूर्य का चुंबकीय क्षेत्र लगभग प्रत्येक 11 वर्षों में परिवर्तन से गुजरता है।
- सूर्य एक विशाल विद्युत-आवेशित गर्म गैस का गोला है। यह आवेशित गैस गति करती है, जिससे एक शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है।
- लगभग प्रत्येक 11 वर्ष में सूर्य का चुंबकीय क्षेत्र पूरी तरह पलट जाता है, जिससे उत्तर एवं दक्षिण ध्रुवों का स्थान बदल जाता है।
- इसके बाद लगभग आगामी 11 वर्षों में यह प्रक्रिया पुनः दोहराई जाती है।
- सौर चक्र का प्रभाव: सूर्य की सतह पर गतिविधियाँ, जैसे सूर्य कलंक (Sunspots), इस चक्र से प्रभावित होती हैं।
- चुंबकीय क्षेत्र में परिवर्तन के साथ सूर्य की सतही गतिविधि भी बदलती है।

- सौर चक्र की निगरानी: सौर चक्र की निगरानी के लिए मुख्य रूप से सूर्य कलंकों की संख्या का उपयोग किया जाता है।
- सौर चक्र की शुरुआत को सौर न्यूनतम कहा जाता है, जब सूर्य पर सबसे कम सूर्य कलंक होते हैं।
- समय के साथ सौर गतिविधि एवं सूर्य कलंकों की संख्या बढ़ती है।
- चक्र के मध्य को सौर अधिकतम कहा जाता है, जब सूर्य पर सर्वाधिक सूर्य कलंक होते हैं।
- इसके बाद गतिविधि घटकर पुनः सौर न्यूनतम की ओर जाती है और नया चक्र प्रारंभ होता है।
- पूर्वानुमान: वैज्ञानिक विभिन्न तरीकों से आगामी सौर चक्र की तीव्रता का पूर्वानुमान लगाते हैं, जिनमें शामिल हैं—
- डायनमो मॉडल आधारित सैद्धांतिक गणनाएँ
- बाह्यगणन तकनीकें
- पूर्वसूचक विधियाँ
- पूर्वसूचक विधि
- इस विधि में सौर गतिविधि के किसी विशिष्ट समय पर मापे गए मानों का उपयोग करके आगामी सौर अधिकतम की तीव्रता का अनुमान लगाया जाता है।
स्रोत: PIB
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