पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था एवं शासन
संदर्भ
- हाल ही में केंद्र सरकार ने तीन महत्वपूर्ण विधेयक प्रस्तुत किए हैं, जिनमें ‘संविधान (एक सौ इकतीसवाँ संशोधन) विधेयक, 2026’ शामिल है। यह भारत की संसदीय संरचना और संघीय संतुलन को पुनः आकार देने की संभावना रखता है।
लोकसभा में सीट वृद्धि के चरण
- प्रारंभिक चरण (स्वतंत्रता-उपरांत विस्तार):
- प्रथम लोकसभा (1952): कुल 489 सीटें; 1951 की जनगणना पर आधारित; प्रथम परिसीमन आयोग (1952)।
- द्वितीय एवं तृतीय लोकसभा (1957–1962): जनसंख्या वृद्धि और राज्यों के पुनर्गठन के कारण सीटों में क्रमिक वृद्धि।
- मुख्य विस्तार चरण (1960–1970 का दशक):
- 1961 की जनगणना के बाद (परिसीमन आयोग, 1963): सीटें बढ़कर लगभग 520 हुईं।
- 1971 की जनगणना के बाद (परिसीमन आयोग, 1973): सीटें बढ़कर 543 हुईं (वर्तमान शक्ति); यह तीव्र जनसंख्या वृद्धि को दर्शाता है।
- स्थगन अवधि (1976–2026):
- 42वाँ संविधान संशोधन (1976): 1971 की जनगणना के आधार पर सीट आवंटन को स्थगित किया गया; उद्देश्य था जनसंख्या नियंत्रण को प्रोत्साहित करना और परिवार नियोजन में सफल राज्यों को दंडित न करना।
- 84वाँ संशोधन (2001): स्थगन को 2026 तक बढ़ाया गया; इस अवधि में कुल सीटों में कोई वृद्धि नहीं हुई; केवल सीमाओं का पुनः समायोजन (2002 परिसीमन) किया गया।
संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026 की प्रमुख प्रावधान
- लोकसभा की शक्ति में वृद्धि: लोकसभा की अधिकतम शक्ति 550 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव।
- इसमें राज्यों से निर्वाचित सदस्य और केंद्र शासित प्रदेशों (दिल्ली, जम्मू-कश्मीर, पुदुच्चेरी) से प्रतिनिधित्व शामिल होगा।
- इसका उद्देश्य जनसंख्या वृद्धि के अनुरूप बेहतर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है।
- सीट आवंटन का आधार: प्रत्येक राज्य के लिए सीटें भारत की कुल जनसंख्या के अनुपात में राज्य की जनसंख्या पर आधारित होंगी।
- जनसंख्या उस जनगणना पर आधारित होगी जिसे संसद कानून द्वारा निर्दिष्ट करेगी; यह आवश्यक नहीं कि नवीनतम जनगणना ही हो।
- इससे संसद को संदर्भ जनगणना चुनने में लचीलापन मिलेगा।

- परिसीमन आवश्यकता: विधेयक सीटों के पुनः आवंटन और महिलाओं के आरक्षण के क्रियान्वयन को जोड़ता है। दोनों केवल परिसीमन अभ्यास के बाद ही प्रभावी होंगे।
- महिला आरक्षण प्रावधान: एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। प्रमुख शर्तें:
- परिसीमन के बाद प्रभावी।
- आरक्षण प्रारंभ से 15 वर्षों तक मान्य।
- संवैधानिक योजना में संशोधन: विधेयक निम्नलिखित प्रावधानों में संशोधन करता है:
- अनुच्छेद 81 (लोकसभा की संरचना)
- जनगणना से जुड़ा परिसीमन ढाँचा
- आरक्षण और सीट आवंटन से संबंधित प्रावधान
संविधान संशोधन विधेयक
- यह संसद में प्रस्तुत विधायी प्रस्ताव है, जिसका उद्देश्य संविधान के प्रावधानों में संशोधन, जोड़ या निरसन करना है।
- कौन प्रस्तुत कर सकता है?
- इसे संसद के किसी भी सदन (लोकसभा या राज्यसभा) में प्रस्तुत किया जा सकता है।
- केवल संसद को ऐसे विधेयक प्रस्तुत करने का अधिकार है; राज्य ऐसे विधेयक प्रस्तुत नहीं कर सकते।
- प्रक्रिया (अनुच्छेद 368):
- विशेष बहुमत: संसद में कुल सदस्यता के बहुमत और उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों के 2/3 बहुमत से पारित होना आवश्यक।
- राज्य अनुमोदन (यदि आवश्यक): जब संशोधन संघीय प्रावधानों को प्रभावित करता है, जैसे राष्ट्रपति का चुनाव, शक्तियों का वितरण और न्यायपालिका, तब कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं द्वारा अनुमोदन आवश्यक होता है।
- राष्ट्रपति की स्वीकृति: पारित होने के बाद विधेयक राष्ट्रपति को स्वीकृति हेतु भेजा जाता है। स्वीकृति के बाद यह संविधान संशोधन अधिनियम बन जाता है।
- मुख्य विशेषताएँ:
- गतिरोध की स्थिति में संयुक्त बैठक का कोई प्रावधान नहीं।
- न्यायिक समीक्षा लागू (मूल संरचना सिद्धांत)।
- संसद की शक्ति सीमित है और वह संविधान की मूल संरचना को परिवर्तित नहीं कर सकती।
प्रमुख निहितार्थ
- राजनीतिक शक्ति का पुनर्वितरण:
- सीट आवंटन पर लगाया गया स्थगन (2026 के बाद की शर्त) समाप्त।
- सीट वितरण 2011 की जनगणना पर आधारित।
- इससे जनसंख्या-बहुल उत्तरी राज्यों को अधिक प्रतिनिधित्व मिलेगा और ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ का सिद्धांत सुनिश्चित होगा।
- ऐसा पुनर्वितरण क्षेत्रीय राजनीतिक विषमता को और तीव्र कर सकता है।
- लोकसभा बनाम राज्यसभा का सुदृढ़ीकरण:
- लोकसभा का विस्तार; राज्यसभा अपरिवर्तित।
- संयुक्त बैठकों में लोकसभा का प्रभुत्व बढ़ेगा।
- इससे द्विसदनीय संतुलन और संघीय सुरक्षा कमजोर होगी।
- परिसीमन निर्णयों में कार्यपालिका का प्रभुत्व:
- संसद यह तय कर सकती है कि परिसीमन कब किया जाए और किस जनगणना का उपयोग हो।
- इसके लिए साधारण बहुमत पर्याप्त है, जिससे सत्तारूढ़ सरकार को महत्वपूर्ण नियंत्रण प्राप्त होता है।
- इससे परिसीमन के राजनीतिकरण की आशंका बढ़ती है।
- मंत्रिपरिषद का विस्तार:
- लोकसभा की शक्ति का 15% मंत्रिपरिषद की सीमा है; इससे कार्यपालिका का संरक्षण बढ़ सकता है और शासन की जटिलता भी।
- विधायी भागीदारी में कमी:
- बड़ी लोकसभा से व्यक्तिगत सांसदों की भागीदारी घटेगी। प्रश्नकाल और शून्यकाल में अवसर कम होंगे।
- समस्या और गंभीर होती है क्योंकि संसद का वार्षिक सत्र 70 दिनों से भी कम होता है।
तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य
- यूनाइटेड किंगडम का उदाहरण: हाउस ऑफ कॉमन्स में 650 सदस्य हैं।
- इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं: वर्ष में 150 से अधिक बैठक दिवस, सशक्त समिति प्रणाली, और विधेयकों की अनिवार्य समीक्षा।
निष्कर्ष
- प्रस्तावित सुधारों का उद्देश्य प्रतिनिधित्व की समानता को बढ़ाना है, किन्तु साथ ही यह संघीय संतुलन को परिवर्तित करते हैं, कार्यपालिका का नियंत्रण सुदृढ़ करते हैं, द्विसदनीयता को कमजोर करते हैं और विधायी विचार-विमर्श की गुणवत्ता को घटाने का जोखिम उत्पन्न करते हैं।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न: प्रस्तावित परिसीमन (Delimitation) के अंतर्गत 2026 के बाद लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण भारत के संघीय संतुलन को पुनः आकार देने की संभावना रखता है। परिसीमन के प्रतिनिधित्व, संघवाद और राजनीतिक शक्ति-संतुलन पर निहितार्थों पर चर्चा कीजिए। |
स्रोत: TH
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