पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन; संघवाद
संदर्भ
- आगामी परिसीमन भारत के लोकतांत्रिक विकास में एक महत्वपूर्ण क्षण है क्योंकि यह संघीय संतुलन, प्रतिनिधित्व और शासन परिणामों को प्रभावित करता है।
परिसीमन के बारे में
- परिसीमन का अर्थ है निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनः निर्धारण ताकि जनसंख्या के आधार पर समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके।
- यह लोकतांत्रिक सिद्धांत ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण तंत्र है।
संवैधानिक ढाँचा
- अनुच्छेद 81: राज्यों के बीच लोकसभा सीटों का आवंटन।
- अनुच्छेद 82: प्रत्येक जनगणना के बाद निर्वाचन क्षेत्रों का पुनः समायोजन।
- अनुच्छेद 170: राज्य विधानसभाओं के लिए समान प्रावधान।
- अनुच्छेद 327 एवं 328: संसद/राज्य विधानसभाएँ चुनावों पर कानून बना सकती हैं।
- अनुच्छेद 329: परिसीमन मामलों में न्यायालयों का हस्तक्षेप निषिद्ध।
- ये प्रावधान प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन को संवैधानिक दायित्व बनाते हैं।
- 42वाँ संशोधन (1976): सीट आवंटन को 2000 तक स्थगित किया।
- 84वाँ संशोधन (2002): जनसंख्या नियंत्रण को प्रोत्साहित करने हेतु स्थगन को 2026 तक बढ़ाया।
परिसीमन आयोग
- कानूनी आधार: परिसीमन आयोग अधिनियम (1952, 1962, 1972, 2002) के तहत गठित।
- संरचना: सेवानिवृत्त सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीश (अध्यक्ष), मुख्य निर्वाचन आयुक्त (या नामित), राज्य निर्वाचन आयुक्त।
- विशेषताएँ: स्वतंत्र एवं अर्ध-न्यायिक निकाय; आदेश कानून का बल रखते हैं; इन्हें न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
भारत में परिसीमन के पक्ष में तर्क
- वोट की समानता सुनिश्चित करता है (एक व्यक्ति, एक वोट): परिसीमन के बिना, अधिक जनसंख्या अधिक वाले निर्वाचन क्षेत्रों के सांसद दूसरों की तुलना में कहीं ज़्यादा लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
- परिसीमन चुनावी समानता को बहाल करता है।
- गलत बंटवारे को ठीक करता है: लंबे समय तक रोक (1976–2026) की वजह से कम ग्रोथ वाले राज्यों का प्रतिनिधित्व अधिक हो गया है; और अधिक विकास वाले राज्यों का रिप्रेजेंटेशन कम हो गया है।परिसीमन इस इम्बैलेंस को ठीक करता है, जिससे सीटों को आबादी के हिसाब से फिर से अलाइन किया जाता है।
- लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को सुदृढ़ करता है: वर्तमान जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करता है।
- निर्वाचित प्रतिनिधियों की जवाबदेही और नागरिकों के प्रति उत्तरदायित्व को बढ़ाता है।
- शासन और नीतिगत परिणामों में सुधार करता है: छोटे और संतुलित निर्वाचन क्षेत्रों से सांसदों तक पहुँच आसान होती है।
- शिकायत निवारण की क्षमता बेहतर होती है।
- राजनीतिक जवाबदेही को बढ़ाता है: प्रतिनिधि समान जनसंख्या आकार वाले क्षेत्रों की सेवा करते हैं।
- यह चुनावी विकृतियों और असमान राजनीतिक प्रभाव को कम करता है।
- जनसांख्यिकीय परिवर्तनों (शहरीकरण एवं प्रवासन) को प्रतिबिंबित करता है: तीव्र शहरीकरण ने अत्यधिक भीड़भाड़ वाले शहरी निर्वाचन क्षेत्रों और कम जनसंख्या वाले ग्रामीण क्षेत्रों का निर्माण किया है।
- परिसीमन (Delimitation) निष्पक्ष शहरी प्रतिनिधित्व और संतुलित ग्रामीण-शहरी राजनीतिक भार सुनिश्चित करता है।
- संघवाद को सुदृढ़ करता है: यद्यपि कुछ चिंताएँ मौजूद हैं, परिसीमन वास्तविक जनसंख्या के अनुरूप प्रतिनिधित्व को संरेखित करता है और लोकतांत्रिक संघवाद को मजबूत करता है।
- चुनावी असमानता और पक्षपात से सुरक्षा प्रदान करता है :यह कुछ क्षेत्रों को संरचनात्मक लाभ मिलने से रोकता है।
- विकृत राजनीतिक परिणामों को रोकता है।
- समावेशी लोकतंत्र को बढ़ावा देता है: हाशिए पर रहने वाले समूहों और अनुसूचित जाति/जनजाति समुदायों के लिए बेहतर प्रतिनिधित्व सक्षम करता है।
- आरक्षित सीटों के समायोजन के माध्यम से न्यायसंगत भागीदारी सुनिश्चित करता है।
भारत में परिसीमन के विरुद्ध तर्क
- जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों को दंडित करना: दक्षिणी एवं कुछ पश्चिमी राज्यों ने सफलतापूर्वक प्रजनन दर को कम किया है।
- केवल जनसंख्या के आधार पर परिसीमन करने से इन राज्यों की सीटों में कमी आती है, जिससे जनसंख्या नियंत्रण नीतियों के प्रति निरुत्साह उत्पन्न होता है।
- परिवर्तित जनसांख्यिकीय प्रवृत्तियाँ:
- राज्यों के बीच प्रजनन संक्रमण:
- प्रारंभिक उपलब्धि वाले राज्य (TFR ≤ 2.1, वर्ष 2005 तक): केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक आदि
- विलंबित उपलब्धि वाले राज्य: बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड आदि
- स्थायी असमानता (NFHS-5, 2019–21):
- निम्न TFR वाले राज्य: ~1.64
- उच्च TFR वाले राज्य: ~2.38
- पिछड़े राज्यों में लगभग 45% अधिक प्रजनन दर
- राज्यों के बीच प्रजनन संक्रमण:
- संघवाद के लिए खतरा: भारत केवल जनसंख्या का समुच्चय नहीं, बल्कि राज्यों का संघ है।
- परिसीमन से अधिक जनसंख्या वाले उत्तरी राज्यों का प्रभुत्व बढ़ सकता है और छोटे या विकसित राज्यों की आवाज़ कमजोर हो सकती है।
- उत्तर–दक्षिण राजनीतिक विभाजन: संभावित परिणामस्वरूप उत्तरी राज्यों को अधिक सीटें मिलेंगी और दक्षिणी राज्यों का प्रभाव घटेगा, जिससे क्षेत्रीय तनाव एवं राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ सकता है।
- विकासात्मक प्रदर्शन की अनदेखी: केवल जनसंख्या आधारित दृष्टिकोण उच्च जनसंख्या वृद्धि को पुरस्कृत करता है और मानव विकास तथा सुशासन की उपेक्षा करता है, जिससे नीतिनिर्माण में विकृत प्रोत्साहन उत्पन्न होते हैं।
- बहुसंख्यकवाद का जोखिम:
बड़े राज्यों को अधिक सीटें मिलने से राष्ट्रीय राजनीति में उनका वर्चस्व बढ़ सकता है, जिससे अल्पसंख्यक आवाज़ें और छोटे राज्यों की सौदेबाजी शक्ति कमजोर हो सकती है। - राजनीतिक अस्थिरता एवं विरोध: जिन राज्यों का प्रभाव कम होगा, वे सुधारों का विरोध कर सकते हैं, जिससे राजनीतिक गतिरोध उत्पन्न हो सकता है और कार्यान्वयन में बाधाएँ आ सकती हैं।
- सहकारी संघवाद का विकृति: वर्तमान व्यवस्था जनसंख्या और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन बनाती है।
- अचानक परिवर्तन राज्यों के बीच विश्वास को कमजोर कर सकते हैं और केंद्र–राज्य संबंधों को प्रभावित कर सकते हैं।
- शहरी पक्षपात की चिंता: तीव्र शहरी जनसंख्या वृद्धि के कारण शहरी क्षेत्रों का अधिक प्रतिनिधित्व हो सकता है, जिससे ग्रामीण मुद्दों की उपेक्षा और नीतिगत असंतुलन का खतरा बढ़ता है।
- जटिलता एवं प्रशासनिक चुनौतियाँ: सीमाओं का पुनर्निर्धारण राजनीतिक रूप से संवेदनशील और प्रशासनिक रूप से जटिल है, जिससे विवाद एवं पक्षपात के आरोप उत्पन्न हो सकते हैं।
- परिसीमन स्थगन एक सोची-समझी नीति थी: 42वें एवं 84वें संशोधनों ने असमान पुनर्वितरण के जोखिमों को स्वीकार किया था। अचानक स्थगन हटाने से दशकों की नीति-सहमति प्रभावित हो सकती है।
परिसीमन में संघवाद सुनिश्चित करने के उपाय
- जनसांख्यिकीय प्रदर्शन (DemPer) सिद्धांत: वित्त आयोग के सूत्र से प्रेरित यह सिद्धांत जनसंख्या (50%) और प्रदर्शन संकेतकों का संयोजन करता है।
- इसे केवल 543 से अधिक अतिरिक्त सीटों पर लागू करने का सुझाव:
- 10%: प्रारंभिक प्रजनन उपलब्धि (2005 से पूर्व)
- 90%: TFR में कमी की दर (2005–2021)
- अपेक्षित परिणाम:
- सभी राज्यों को सीटों में वृद्धि (कोई पूर्ण कमी नहीं)
- बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों की उचित हिस्सेदारी बनी रहे
- बड़े राज्यों को अधिक सीटें मिलें, परंतु संतुलित रूप में
- इसे केवल 543 से अधिक अतिरिक्त सीटों पर लागू करने का सुझाव:
- वर्तमान सीट हिस्सेदारी की सुरक्षा (अनावर्धन सिद्धांत): यह सुनिश्चित किया जाए कि किसी भी राज्य की वर्तमान सीटों में कमी न हो; परिवर्तन केवल अतिरिक्त सीटों पर लागू हों।
- लोकसभा की कुल सदस्य संख्या में वृद्धि: सीटों को लगभग 700 तक बढ़ाकर शून्य-योग (zero-sum) स्थिति से बचा जा सकता है।
- क्रमिक अनुपातिकता (ह्रासमान आनुपातिकता): बड़े राज्यों को अधिक सीटें मिलें, परंतु पूर्णतः आनुपातिक नहीं; छोटे राज्यों को प्रति व्यक्ति अपेक्षाकृत अधिक प्रतिनिधित्व मिले।
- राज्यसभा की भूमिका को सुदृढ़ करना: राज्यसभा राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है। इसकी विधायी भूमिका और संघीय संतुलन को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
- संवैधानिक सुरक्षा एवं न्यायिक निगरानी: यह सुनिश्चित किया जाए कि परिसीमन संघवाद जैसे मूल ढांचे का उल्लंघन न करे; सीमित न्यायिक समीक्षा का प्रावधान किया जा सकता है।
- सहकारी संघवाद को बढ़ावा: केंद्र और राज्यों के बीच संवाद तथा सहमति-आधारित सुधार आवश्यक हैं।
निष्कर्ष
- भारत एक ऐसे महत्वपूर्ण बिंदु पर खड़ा है जहाँ जनसांख्यिकीय वास्तविकताएँ संवैधानिक आदर्शों से जुड़ती हैं।
- यद्यपि अनुच्छेद 81 संख्यात्मक समानता पर बल देता है, किंतु बदलती असमानताओं के संदर्भ में निष्पक्षता, प्रोत्साहन और संघीय स्थिरता को समाहित करने वाली व्यापक व्याख्या आवश्यक है।
- जनसंख्या के साथ-साथ जनसांख्यिकीय प्रदर्शन को सम्मिलित करने वाला संतुलित परिसीमन दृष्टिकोण समान प्रतिनिधित्व, प्रोत्साहित शासन और संघ की स्थायी एकता सुनिश्चित कर सकता है।
| मुख्य परीक्षा दैनिक अभ्यास प्रश्न [प्रश्न] भारत की संघीय संरचना के लिए परिसीमन से उत्पन्न चुनौतियों पर चर्चा कीजिए। ऐसे उपाय सुझाव दीजिए जिनसे यह प्रक्रिया निर्वाचन समानता और संघीय संतुलन दोनों को सुनिश्चित कर सके। |
स्रोत: TH