भारत में इच्छामृत्यु से संबंधित न्यायिक सिद्धांतों का विकास

पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था एवं शासन; स्वास्थ्य से संबंधित मुद्दे

संदर्भ

  • भारत में इच्छामृत्यु तथा गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 की न्यायिक व्याख्या के माध्यम से विकसित हुआ है, जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है।
  • हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय कि स्थापित विधिक दिशानिर्देशों के अंतर्गत जीवनरक्षक प्रणाली को हटाने की अनुमति दी जा सकती है, मृत्यु के अंतिम चरण की देखभाल तथा गरिमामय मृत्यु के संबंध में भारत के न्यायिक सिद्धांतों के निरंतर विकास को दर्शाता है।

पृष्ठभूमि: हरिश राणा मामला 

  • वर्ष 2013 में 20 वर्षीय हरिश राणा गंभीर रूप से घायल हो गए, जिसके परिणामस्वरूप वे पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट[Persistent Vegetative State (PVS)] अर्थात स्थायी वनस्पतिक अवस्था में चले गए। इस स्थिति में उन्हें अपने आसपास की कोई चेतना नहीं थी और जीवित रहने के लिए निरंतर चिकित्सकीय सहायता की आवश्यकता थी।
  • 13 वर्षों तक उनके माता-पिता और चिकित्सकों ने निरंतर देखभाल प्रदान की, किंतु कोई चिकित्सकीय सुधार नहीं हुआ।
  • इसके बाद उनके माता-पिता ने भारत के सर्वोच्च न्यायालय का दृष्टिकोण करते हुए जीवनरक्षक प्रणाली हटाने की अनुमति मांगी, ताकि प्रकृति अपना स्वाभाविक मार्ग अपना सके।
  • इसने न्यायालय को इस अनुरोध का मूल्यांकन संवैधानिक अधिकारों, चिकित्सकीय नैतिकता तथा निष्क्रिय इच्छामृत्यु से संबंधित विद्यमान दिशानिर्देशों के परिप्रेक्ष्य में करने के लिए बाध्य किया।

संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 21 और गरिमा का अधिकार

  • न्यायालय ने बार-बार यह कहा है कि अनुच्छेद 21 के अंतर्गत “जीवन” का अर्थ मात्र जैविक अस्तित्व नहीं है, बल्कि गरिमा के साथ जीवन है।
  • न्यायपालिका ने धीरे-धीरे जीवन के अर्थ का विस्तार करते हुए इसमें स्वायत्तता, निजता तथा शारीरिक अखंडता जैसे तत्वों को भी सम्मिलित किया।

भारत में इच्छामृत्यु न्यायशास्त्र का विकास

  • ज्ञान कौर बनाम पंजाब राज्य (1996):इस मामले ने गरिमा संबंधी बहस की आधारशिला रखी। प्रमुख निर्णय:
    • सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के अंतर्गत “गरिमा के साथ जीने के अधिकार” को मान्यता दी।
    • हालाँकि न्यायालय ने इस विचार को अस्वीकार कर दिया कि अनुच्छेद 21 में “मरने का अधिकार” भी शामिल है।
    • न्यायालय ने यह भी कहा कि आत्महत्या या सहायक आत्महत्या को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त नहीं हो सकता।
  • अरुणा शानबाग मामला (2011): अरुणा शानबाग एक क्रूर हमले के बाद कई दशकों तक पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट  में रहीं। उनके जीवनरक्षक साधनों को हटाने के लिए एक याचिका दायर की गई। प्रमुख परिणाम:
    • न्यायालय ने विशिष्ट याचिका को अस्वीकार कर दिया, किंतु सीमित परिस्थितियों में निष्क्रिय इच्छामृत्यु को मान्यता दी।
    • जीवनरक्षक उपचार को हटाने के लिए दिशानिर्देश निर्धारित किए गए।
    • दुरुपयोग को रोकने के लिए उच्च न्यायालयों तथा चिकित्सा बोर्डों की स्वीकृति आवश्यक बताई गई।
    • न्यायालय ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु की इस सतर्क मान्यता के समर्थन में अंतरराष्ट्रीय विधिक विकासों का भी सहारा लिया।
  • विधि आयोग की रिपोर्टें (2006 और 2012): विधि आयोग ने निष्कर्ष निकाला कि यदि किसी असाध्य रोगी के सर्वोत्तम हित में जीवनरक्षक उपचार को रोका या हटाया जाता है, तो इसे आपराधिक दायित्व का कारण नहीं माना जाना चाहिए।
    • इन रिपोर्टों ने बाद के न्यायिक निर्णयों तथा नैतिक विमर्शों को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया।
  • कॉमन कॉज़ बनाम भारत संघ (2018): वर्ष 2018 में संविधान पीठ का यह निर्णय भारतीय संवैधानिक विधि में एक महत्वपूर्ण माइलस्टोन सिद्ध हुआ। प्रमुख निष्कर्ष:
    • गरिमा के साथ मरने का अधिकार अनुच्छेद 21 का हिस्सा है।
    • रोगियों को चिकित्सकीय उपचार से मना करने का अधिकार है।
    • व्यक्ति एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव्स (लिविंग बिल) तैयार कर सकते हैं।
    • कठोर सुरक्षा उपायों के अधीन निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी गई।
    • इस निर्णय ने गरिमा को निजता, स्वायत्तता और आत्मनिर्णय से जोड़ा तथा पूर्ववर्ती न्यायिक निर्णयों, जैसे पुट्टस्वामी निजता निर्णय (2017), से प्रेरणा ली।
  • 2023 में स्पष्टीकरण :सर्वोच्च न्यायालय ने 2023 में प्रक्रियात्मक आवश्यकताओं को सरल बनाया, जिससे लिविंग विल और उपचार हटाने की प्रक्रिया अधिक व्यावहारिक बन गई।
    • इन सभी निर्णयों को सामूहिक रूप से अब कॉमन कॉज़ दिशानिर्देश के नाम से जाना जाता है।

हरिश राणा मामले में सर्वोच्च न्यायालय का विश्लेषण 

  • सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि क्लिनिकली असिस्टेड न्यूट्रिशन एंड हाइड्रेशन (CANH) भी चिकित्सकीय उपचार की श्रेणी में आता है, अतः इसे कॉमन कॉज़ के दिशानिर्देशों के अंतर्गत विधिक रूप से हटाया जा सकता है। न्यायालय ने यह अवलोकन किया कि:
    • CANH के लिए विशेषीकृत चिकित्सकीय निगरानी की आवश्यकता होती है।
      इसमें निरंतर चिकित्सकीय मूल्यांकन तथा आपातकालीन चिकित्सा प्रबंधन सम्मिलित होता है।
  • रोगी के सर्वोत्तम हित में उपचार का समापन :न्यायालय ने यह बल दिया कि उपचार का उद्देश्य चिकित्सकीय लाभ प्रदान करना होना चाहिए।
    • यदि कोई चिकित्सकीय हस्तक्षेप केवल जैविक अस्तित्व को लंबा करता है और स्वस्थ होने की संभावना नहीं है, तो उसका निरंतर जारी रहना रोगी के हित में नहीं माना जा सकता।
    • चिकित्सा बोर्डों और परिवार के विचारों पर विचार करने के पश्चात न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि जीवनरक्षक प्रणाली को हटाना रोगी के सर्वोत्तम हित के अनुरूप है।

गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार में प्रमुख चिंताएँ एवं मुद्दे

  • जीवन की पवित्रता बनाम गरिमा का अधिकार : इच्छामृत्यु की अनुमति देने से जीवन की पवित्रता के सिद्धांत को क्षति पहुँचने की आशंका व्यक्त की जाती है।
    •  दूसरी ओर, किसी व्यक्ति को अपरिवर्तनीय पीड़ा की स्थिति में जीवित रहने के लिए बाध्य करना अनुच्छेद 21 के अंतर्गत उसकी गरिमा और स्वायत्तता का उल्लंघन माना जा सकता है।
  • चिकित्सकों की नैतिक भूमिका : चिकित्सकीय नैतिकता परंपरागत रूप से जीवन को बचाने पर बल देती है, जिसका आधार हिप्पोक्रेटिक शपथ (Hippocratic Oath) है।
    •  उपचार को समाप्त करना इस प्रकार की दुविधा उत्पन्न करता है कि क्या चिकित्सक जीवन का अंत कर रहे हैं या केवल प्राकृतिक मृत्यु को होने दे रहे हैं।
  • सांस्कृतिक और धार्मिक संवेदनशीलताएँ :  भारत में अनेक धर्म इच्छामृत्यु का विरोध करते हैं, क्योंकि वे जीवन को पवित्र मानते हैं और इसे मानव नियंत्रण के अधीन नहीं मानते।
    •  इस कारण विभिन्न समुदायों में इसकी नैतिक स्वीकृति भिन्न-भिन्न स्तरों पर पाई जाती है।
  • कानूनी ढाँचे में अस्पष्टता : बार-बार न्यायिक टिप्पणियों के बावजूद भारत में इच्छामृत्यु तथा जीवन के अंतिम चरण की देखभाल के संबंध में अभी भी समग्र विधायी व्यवस्था का अभाव है।
  • जटिल प्रक्रियाएँ :कॉमन कॉज़ के दिशानिर्देशों के अनुसार प्राथमिक चिकित्सा बोर्ड, द्वितीयक चिकित्सा बोर्ड, आवश्यक दस्तावेज़ीकरण तथा सहमति की प्रक्रिया आवश्यक होती है।
    •  कई अस्पतालों के पास इन प्रक्रियाओं को प्रभावी रूप से लागू करने हेतु पर्याप्त अवसंरचना उपलब्ध नहीं है।
  • निष्क्रिय और सक्रिय इच्छामृत्यु के बीच अंतर : निष्क्रिय इच्छामृत्यु (जीवनरक्षक उपचार को हटाना) को सुरक्षा उपायों के अंतर्गत अनुमति दी गई है।
    •  इसके विपरीत सक्रिय इच्छामृत्यु (मृत्यु के उद्देश्य से जानबूझकर दवा या पदार्थ का प्रशासन) अब भी अवैध है।
  • जागरूकता का अभाव : कई रोगी और उनके परिवार लिविंग विल या एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव्स के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं रखते।
    • अनेक अस्पतालों में भी इस संबंध में स्पष्ट प्रोटोकॉल का अभाव है।
  • चिकित्सकीय अवसंरचना की सीमाएँ : छोटे अस्पतालों में दिशानिर्देशों के अंतर्गत अपेक्षित बहु-विशेषज्ञ चिकित्सा बोर्ड उपलब्ध नहीं होते।
  • आर्थिक कारक : जीवन के अंतिम चरण की चिकित्सा देखभाल अत्यंत महँगी हो सकती है।
    • कभी-कभी परिवार आर्थिक कठिनाइयों के कारण इच्छामृत्यु का विकल्प चुनने का प्रयास कर सकते हैं, जो रोगी के वास्तविक हित से भिन्न हो सकता है।
  • संपत्ति और उत्तराधिकार संबंधी विवाद : उत्तराधिकार या पारिवारिक विवादों से जुड़े मामलों में इन प्रावधानों के दुरुपयोग की संभावना भी बनी रहती है।
  • स्वास्थ्य सेवा में असमानता : भारत में अनेक रोगियों को उपशामक देखभाल (palliative care) या गुणवत्तापूर्ण जीवनरक्षक उपचार तक पर्याप्त पहुँच नहीं मिलती।
    •  इच्छामृत्यु पर होने वाली परिचर्चा कभी-कभी जीवन के अंतिम चरण की बेहतर देखभाल व्यवस्था की आवश्यकता को पीछे छोड़ सकती है।
  • उपशामक देखभाल अवसंरचना का अभाव : भारत में विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में हॉस्पिस और उपशामक देखभाल सुविधाएँ अत्यंत सीमित हैं।

संबंधित उपाय: दुरुपयोग के विरुद्ध सुरक्षा प्रावधान 

  • इच्छामृत्यु के प्रावधानों के दुरुपयोग को रोकने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक सुरक्षा उपाय निर्धारित किए हैं:
    • प्राथमिक चिकित्सा बोर्ड द्वारा मूल्यांकन;
    • द्वितीय स्वतंत्र चिकित्सा बोर्ड द्वारा पुनरावलोकन;
    • परिवार के सदस्यों की सहमति और सहभागिता;
    • रोगी की चिकित्सकीय स्थिति का दस्तावेज़ीकरण;
    • कॉमन कॉज़ के दिशानिर्देशों का अनुपालन।
  • इन उपायों का उद्देश्य व्यक्तिगत गरिमा और संभावित दबाव या दुरुपयोग से संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करना है।

आगे की राह

  • सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार यह “पवित्र आशा” व्यक्त की है कि संसद इच्छामृत्यु और जीवन के अंतिम चरण से संबंधित निर्णयों पर एक विधि बनाएगी। ऐसा कानून निम्नलिखित उद्देश्यों को पूरा कर सकता है:
    • स्पष्ट प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय प्रदान करना;
    • चिकित्सकों को संभावित दायित्व से संरक्षण देना;
    • रोगियों की स्वायत्तता और गरिमा सुनिश्चित करना; तथा
    • दुरुपयोग को रोकना।
  • भारत को इच्छामृत्यु तथा लिविंग विल से संबंधित एक स्पष्ट वैधानिक ढाँचे की आवश्यकता है, जिससे अस्पष्टता समाप्त हो और रोगियों तथा चिकित्सा पेशेवरों दोनों के अधिकारों की रक्षा हो सके। इसके लिए निम्नलिखित प्रमुख कदम आवश्यक हैं:
    • जीवन के अंतिम चरण से संबंधित चिकित्सकीय निर्णयों पर संसदीय कानून का निर्माण;
    • एडवांस डायरेक्टिव्स के संबंध में जन-जागरूकता बढ़ाना;
    • अस्पतालों और चिकित्सकों के लिए नैतिक दिशानिर्देश विकसित करना।

निष्कर्ष

  • हरिश राणा का मामला मृत्यु में गरिमा के संबंध में भारत की संवैधानिक समझ के विकास में एक महत्वपूर्ण चरण का प्रतिनिधित्व करता है।
  • न्यायिक व्याख्या के माध्यम से यह धीरे-धीरे स्वीकार किया गया है कि गरिमा का सिद्धांत मानव अस्तित्व के अंतिम चरणों तक विस्तृत होना चाहिए, जबकि प्रारंभिक रूप से अनुच्छेद 21 मुख्यतः जीवन की रक्षा पर केंद्रित था।
  • ऐसे मामलों के माध्यम से न्यायपालिका निरंतर संवैधानिक नैतिकता को आकार दे रही है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि विधि जटिल नैतिक वास्तविकताओं का समुचित समाधान प्रदान करते हुए मानव गरिमा की रक्षा करे।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न:] सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के दायरे का क्रमिक रूप से विस्तार करते हुए उसमें ‘गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार’ को भी सम्मिलित किया है। प्रमुख न्यायिक निर्णयों के संदर्भ में भारत में इच्छामृत्यु संबंधी न्यायशास्त्र के विकास का परीक्षण कीजिए।

Source: TH

 

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