पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था; न्यायपालिका
संदर्भ
- जैसे ही भारत विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है, न्यायपालिका को सुदृढ़ करना भारत की आर्थिक गति को बनाए रखने के लिए एक पूर्वापेक्षा है।
भारत की वृद्धि के लिए कानूनी क्षमता क्यों महत्वपूर्ण है?
- न्यायपालिका को विकसित होना होगा ताकि वह तीव्रता से जटिल होते आर्थिक और नियामक मामलों को संभाल सके, क्योंकि भारत का GDP $4.18 ट्रिलियन पार कर चुका है तथा 2030 तक $7.3 ट्रिलियन तक पहुँचने की संभावना है।
- यह राष्ट्र की बढ़ती आकांक्षाओं को रेखांकित करता है कि वह वैश्विक स्तर पर अग्रणी भूमिका निभाए, जिससे कानूनी और न्यायिक क्षमता निर्माण भारत की आर्थिक शासन रणनीति का केंद्रीय स्तंभ बन जाए।
1991 सुधारों से 21वीं सदी की चुनौतियों तक
- आर्थिक सुधार (1991): भारत की अर्थव्यवस्था राज्य-नियंत्रित प्रणाली से बाज़ार-आधारित अर्थव्यवस्था में परिवर्तित हुई, जिसके बाद निजी उद्यम, विदेशी निवेश और बुनियादी ढाँचे के विस्तार में तीव्र वृद्धि हुई, जिससे जटिल कॉर्पोरेट एवं वाणिज्यिक कानूनी मुद्दे उत्पन्न हुए।
- उदारीकरण से पहले भारतीय न्यायालय मुख्यतः दीवानी, आपराधिक और पारिवारिक विवादों को संभालती थीं।
- आज वे FDI-संबंधित संघर्षों, कॉर्पोरेट पुनर्गठन मामलों, वित्तीय क्षेत्र विवादों और उभरती डिजिटल अर्थव्यवस्था की चुनौतियों का सामना कर रही हैं।
- इसके लिए न्यायपालिका का दक्ष, वाणिज्यिक रूप से साक्षर और तकनीकी रूप से सक्षम होना आवश्यक है।
भारत की न्यायपालिका की वर्तमान स्थिति
- लंबित मामलों की समस्या: वर्तमान में न्यायपालिका के सभी स्तरों पर 4.8 करोड़ मामले लंबित हैं, जिनमें से लगभग आधे में सरकारी संस्थाएँ शामिल हैं।
- इनमें से एक करोड़ से अधिक दीवानी मामले अनसुलझे हैं, जिनमें 57% एक वर्ष से अधिक समय से लंबित हैं।
- केवल सर्वोच्च न्यायालय में ही 89,000 से अधिक मामले लंबित हैं, जिनमें से कुछ 1980 के दशक से हैं।
- न्यायाधीशों की गंभीर कमी: भारत में उच्च न्यायालय में प्रत्येक 18.7 लाख लोगों पर केवल एक न्यायाधीश है।
- उच्च न्यायालयों में 33% से अधिक स्वीकृत पद रिक्त हैं, जिससे चार वर्षों में मामलों की लंबितता में 20% की वृद्धि हुई है।
- बुनियादी ढाँचे की कमी: वाणिज्यिक मुकदमेबाजी, जिसमें दिवाला और दिवालियापन संहिता (IBC) के मामले शामिल हैं, तीव्रता से बढ़ी है। केवल NCLT में ही 31 मार्च 2025 तक 14,961 मामले लंबित थे।
- लेकिन भारत की न्यायिक संरचना अभी भी 20वीं सदी के मॉडल पर कार्य कर रही है, जो 21वीं सदी की वाणिज्यिक वास्तविकताओं को संभालने के लिए सक्षम नहीं है।
- अनुबंध लागू करने में कमी: अनुबंध लागू करने में भारत की रैंक 163वीं है, जो एक बड़ी चिंता है, भले ही ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस रैंकिंग में सुधार हुआ है (2014 में 142वीं से 2020 में 63वीं)।
- वर्तमान में प्रथम स्तर के न्यायालय में एक सामान्य वाणिज्यिक विवाद को सुलझाने में औसतन लगभग 1,500 दिन लगते हैं।
- विश्व बैंक के अनुसार, न्यायिक दक्षता में देरी सीधे समय, लागत और न्यायिक प्रक्रियाओं की गुणवत्ता को प्रभावित करती है, जिससे निवेशकों का विश्वास एवं आर्थिक गति कमजोर होती है।
न्यायिक दक्षता निर्माण के स्तंभ
- कॉर्पोरेट गवर्नेंस और कंपनी कानून: न्यायाधीशों को बोर्ड संरचनाओं, न्यासी कर्तव्यों, शेयरधारक समझौतों और ESG तथा डिजिटल गवर्नेंस जैसे उभरते क्षेत्रों में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।
- न्यायिक अकादमियों को शिक्षाविदों, विधि फर्मों और नियामकों के साथ मिलकर उन्नत कॉर्पोरेट कानून पाठ्यक्रम तैयार करना चाहिए।
- वाणिज्यिक अनुबंध और जटिल लेन-देन: न्यायाधीशों को PPP मॉडल, परियोजना वित्त और सीमा-पार अनुबंध विवादों पर प्रशिक्षण की आवश्यकता है।
- दुबई इंटरनेशनल फाइनेंशियल सेंटर (DIFC) अपने संयुक्त न्यायिक और वित्तीय प्रशिक्षण पहलों के माध्यम से एक वैश्विक मॉडल प्रस्तुत करता है।
- वित्तीय, बैंकिंग, बीमा और दिवालियापन कानून: पुनर्गठन सिद्धांतों, मूल्यांकन विधियों और आर्थिक विश्लेषण की गहरी समझ आवश्यक है।
- अमेरिकी दिवालियापन न्यायालय इसका उदाहरण हैं, जो फेडरल जुडिशियल सेंटर द्वारा संचालित वार्षिक न्यायिक शिक्षा कार्यक्रमों के माध्यम से विशेषज्ञता प्रदान करते हैं।
- प्रतिस्पर्धा कानून और बाज़ार अर्थशास्त्र: न्यायाधीशों को बाज़ार परिभाषा, प्रभुत्व और आर्थिक साक्ष्य जैसे अवधारणाओं को समझना होगा।
- यूरोपीय न्यायिक प्रशिक्षण नेटवर्क इसका उदाहरण है, जो EU न्यायाधीशों को औद्योगिक अर्थशास्त्र प्रशिक्षण प्रदान करता है।
- प्रौद्योगिकी, डिजिटल अर्थव्यवस्था और डेटा गवर्नेंस: न्यायाधीशों को एल्गोरिद्मिक जवाबदेही और अनुबंध कानून में AI को संभालने के लिए तैयार रहना चाहिए, क्योंकि AI, फिनटेक एवं डेटा गवर्नेंस कानूनी परिदृश्य को आकार दे रहे हैं।
- सिंगापुर और एस्टोनिया ने प्रौद्योगिकी-संबंधी न्यायनिर्णय के लिए संरचित प्रशिक्षण शुरू किया है।
निष्कर्ष
- भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने लंबित मामलों को कम करना एक प्रमुख संस्थागत लक्ष्य बताया है, और इसे प्राप्त करने के लिए एक प्रणालीगत पुनर्कल्पना की आवश्यकता है, जो न्यायिक शिक्षा, तकनीकी आधुनिकीकरण एवं वाणिज्यिक कानून साक्षरता को भारत की कानूनी पारिस्थितिकी में एकीकृत करे।
- न्यायिक क्षमता निर्माण का उद्देश्य प्रणाली का समर्थन करना और सतत आर्थिक शासन का आधार बनना है, क्योंकि भारत $7.3 ट्रिलियन आर्थिक लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न]: भारत की आर्थिक गति को बनाए रखने में कानूनी और न्यायिक क्षमता की भूमिका का परीक्षण कीजिए। न्यायपालिका को देश की बदलती आर्थिक आकांक्षाओं के अनुरूप बनाने के लिए कौन-से सुधार आवश्यक हैं? |
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