बहुपक्षवाद: विखंडित होते विश्व में नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था को बनाए रखना

पाठ्यक्रम: GS2/अंतर्राष्ट्रीय संबंध

संदर्भ

  • हाल ही में, भारत ने बहुपक्षवाद और सामूहिक वैश्विक कार्रवाई के प्रति अपनी अटूट प्रतिबद्धता को पुनः दोहराया है। यह घोषणा अमेरिका द्वारा 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अलग होने की घोषणा के बाद आई, जिनमें भारत-फ्रांस द्वारा संचालित अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) भी शामिल है।

बहुपक्षवाद के बारे में

  • बहुपक्षवाद सहयोग का वह तरीका है जिसमें तीन या अधिक देश साझा नियमों, मानदंडों और संस्थागत ढाँचों के आधार पर सामान्य मुद्दों पर मिलकर कार्य करते हैं।
  • यह कई देशों को सामूहिक रूप से वैश्विक चुनौतियों का सामना करने में संलग्न करता है, बजाय अकेले (एकपक्षवाद) या केवल एक साझेदार (द्विपक्षवाद) के साथ कार्य करने के।
    • वैश्विक और सीमा-पार चुनौतियों का समाधान करने में बहुपक्षीय सहयोग केंद्रीय भूमिका निभाता है।
  • मुख्य विशेषताएँ:
    • सहमत मानदंडों और प्रक्रियाओं के माध्यम से सामूहिक निर्णय-निर्माण।
    • भाग लेने वाले राज्यों के बीच साझा जिम्मेदारी और पारस्परिकता।
    • संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों के माध्यम से संस्थागत वैधता।

ऐतिहासिक विकास

  • प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध: ‘लीग ऑफ नेशंस’ का गठन हुआ और आगे चलकर संयुक्त राष्ट्र तथा अन्य वैश्विक संस्थाओं की स्थापना हुई।
    • विश्व युद्धों के दौर में शांति, सुरक्षा, अर्थशास्त्र और विकास को संचालित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र, WHO, IMF एवं विश्व बैंक जैसी स्थायी बहुपक्षीय संस्थाओं की स्थापना हुई।

बहुपक्षवाद के सिद्धांत

  • समावेशिता: समान शर्तों पर व्यापक राज्यों की भागीदारी।
  • परामर्श और समन्वय: निर्णय लेने से पहले राज्यों द्वारा परामर्श और वार्ता।
  • साझा मानदंड और पारस्परिकता: सदस्य ऐसे मानदंडों पर सहमत होते हैं जो अंतःक्रियाओं को नियंत्रित करते हैं और दायित्वों को संतुलित करते हैं।
  • संस्थागत ढाँचे: अंतरराष्ट्रीय संगठन वार्ता और क्रियान्वयन के लिए मंच के रूप में कार्य करते हैं।
    • ये सिद्धांत बहुपक्षवाद को अस्थायी गठबंधनों या क्षेत्रीय सहयोग से अलग करते हैं जिनमें सार्वभौमिक मानदंडों की कमी हो सकती है।

वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में बहुपक्षवाद क्यों महत्वपूर्ण है?

  • वैश्विक चुनौतियों का समाधान: जलवायु परिवर्तन, महामारी, आतंकवाद, गरीबी और प्रवासन जैसी समस्याओं का समाधान अकेला कोई राष्ट्र नहीं कर सकता।
  • शांति और सुरक्षा बनाए रखना: द्वितीय विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं को भविष्य के वैश्विक संघर्षों को रोकने के लिए संवाद, वार्ता और विवाद समाधान को बढ़ावा देने हेतु बनाया गया।
  • नियम-आधारित स्थिर वैश्विक व्यवस्था को बढ़ावा देना: WTO और UN जैसे ढाँचे सुनिश्चित करते हैं कि व्यापार, मानवाधिकार और विकास लक्ष्यों पर निष्पक्ष रूप से वार्ता एवं पालन हो।
  • राज्यों के बीच सहयोग और विश्वास बढ़ाना: G20, BRICS और UNGA जैसे मंच छोटे और बड़े राज्यों को वैश्विक एजेंडा तय करने में समान आवाज़ देते हैं।
  • वैश्विक विकास लक्ष्यों को बढ़ावा देना: सतत विकास, स्वास्थ्य और शिक्षा पहलें प्रायः अंतरराष्ट्रीय वित्तपोषण, ज्ञान साझा करने और बहुपक्षीय समझौतों से प्राप्त नीतिगत ढाँचों पर निर्भर करती हैं।

बहुपक्षवाद से जुड़ी चिंताएँ और मुद्दे

  • भूराजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और महाशक्ति प्रतिस्पर्धा: अमेरिका, चीन, रूस और अन्य प्रमुख राज्यों के बीच तनाव बहुपक्षीय मंचों में सहमति को जटिल बना रहे हैं।
  • राष्ट्रवाद और संरक्षणवादी नीतियों का उदय: घरेलू हितों को प्राथमिकता देने से सामूहिक कार्रवाई कमजोर होती है।
  • संस्थागत वैधता और प्रतिनिधित्व की कमी: UNSC और कुछ ब्रेटन वुड्स संस्थाएँ अभी भी द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की शक्ति संरचनाओं पर आधारित हैं।
  • संचालनात्मक कमजोरियाँ और धीमी निर्णय-प्रक्रिया: सर्वसम्मति जैसी प्रक्रियाएँ त्वरित कार्रवाई को धीमा कर देती हैं।
  • वित्तीय और संसाधन संबंधी दबाव: वित्तीय कमी संस्थाओं की क्षमता को कमजोर करती है।
  • वैश्विक दक्षिण की असमानताएँ: जलवायु परिवर्तन और आर्थिक आघातों का प्रभाव अधिक होता है लेकिन प्रभावशीलता कम रहती है।
  • विखंडन और वैकल्पिक सहयोग मॉडल का उदय: द्विपक्षीय और क्षेत्रीय व्यवस्थाएँ अंतरराष्ट्रीय सहयोग को खंडित कर सकती हैं।
  • तकनीकी और मुद्दा-विशिष्ट चुनौतियाँ: डिजिटल शासन, एआई नियमों और डेटा नीतियों पर वैश्विक सहमति बनाना कठिन है।

भारत कैसे सक्रिय रूप से बहुपक्षवाद को पुनः पुष्टि करता है?

  • भारतीय संविधान और प्रतिबद्धता: अनुच्छेद 51 (DPSP) अंतरराष्ट्रीय शांति और सहयोग को बढ़ावा देने, अंतरराष्ट्रीय कानून को बनाए रखने एवं संवाद व मध्यस्थता के माध्यम से विवादों के समाधान को प्रोत्साहित करने का निर्देश देता है।
  • नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था में भारत की भूमिका: भारत सार्वजनिक रूप से नियम-आधारित सहयोग के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराता है।
  • बहु-मंच भागीदारी:
    • संयुक्त राष्ट्र (UN): शांति स्थापना, SDGs, मानवाधिकार संवाद और सुरक्षा सहयोग।
    • WTO: व्यापार नियमों और विवाद तंत्र पर वकालत।
    • G20 / BRICS / SCO / Quad: आर्थिक, स्वास्थ्य, जलवायु और सुरक्षा चुनौतियों पर कार्य।
  • संस्थागत सुधार और भागीदारी: भारत UNSC, WTO और G20 जैसे प्रमुख संस्थानों में सुधार की मांग करता है।
  • भारतीय-आयोजित संवाद (रायसीना डायलॉग): भारत की वैश्विक आवाज़ को सुदृढ़ करता है और उत्तर-दक्षिण व वैश्विक दक्षिण की प्राथमिकताओं को जोड़ता है।
  • मुद्दा-आधारित बहुपक्षीय पहलें:
    • जलवायु और ऊर्जा: अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) का सह-संस्थापक।
    • विकास सहयोग: सतत विकास, अवसंरचना और क्षमता निर्माण में वैश्विक दक्षिण देशों के साथ साझेदारी।
    • दक्षिण-दक्षिण सहयोग: BRICS, IBSA, इंडिया-अफ्रीका फोरम के माध्यम से साझा प्रगति को बढ़ावा देना।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न] संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा वैश्विक संगठनों से हटने के संदर्भ में भारत द्वारा बहुपक्षवाद की पुनः पुष्टि उसकी अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और वैश्विक शासन के दृष्टिकोण को कैसे दर्शाती है, इस पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: ANI


 

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