पाठ्यक्रम:GS2/शिक्षा; सामाजिक मुद्दे
संदर्भ
- UDISE+ 2025–26 रिपोर्ट भारत की स्कूली शिक्षा प्रणाली के व्यापक विस्तार को दर्शाती है, साथ ही क्षेत्रीय, सामाजिक, बुनियादी ढाँचे तथा शिक्षकों से संबंधित असमानताओं के निरंतर बने रहने को भी रेखांकित करती है।
भारत की स्कूली शिक्षा प्रणाली के बारे में
- UDISE+ 2025–26 के अनुसार, भारत विश्व की सबसे बड़ी स्कूली शिक्षा प्रणालियों में से एक है, जिसमें लगभग 14.7 लाख विद्यालय, 24 करोड़ विद्यार्थी और 1.02 करोड़ शिक्षक शामिल हैं।

- यह प्रणाली आधारभूत, प्रारंभिक, मध्य एवं माध्यमिक चरणों में विस्तृत है तथा इसमें सरकारी, सहायता प्राप्त और निजी संस्थान शामिल हैं।
- शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 6–14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा की गारंटी प्रदान करता है।
- हालाँकि, वर्तमान चुनौती केवल शिक्षा तक पहुँच के विस्तार तक सीमित नहीं है, बल्कि विद्यालयों में विद्यार्थियों की निरंतरता, सीखने के परिणामों, समानता एवं गुणवत्ता को सुनिश्चित करना भी आवश्यक है।
संवैधानिक एवं नीतिगत परिप्रेक्ष्य
- शिक्षा समवर्ती सूची (प्रविष्टि 25) में शामिल है, जिससे केंद्र और राज्य दोनों को कानून बनाने तथा नीतियों के कार्यान्वयन का अधिकार प्राप्त है।
- प्रमुख संवैधानिक प्रावधानों में शामिल हैं:
- अनुच्छेद 21A: 6–14 वर्ष के बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार।
- अनुच्छेद 45: प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा।
- अनुच्छेद 46: अनुसूचित जातियों (SC), अनुसूचित जनजातियों (ST) तथा कमजोर वर्गों के शैक्षिक एवं आर्थिक हितों को बढ़ावा देना।
- अनुच्छेद 15(4) एवं 15(5): शिक्षा में वंचित सामाजिक समूहों के लिए विशेष प्रावधान।
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 सार्वभौमिक आधारभूत साक्षरता एवं संख्यात्मक ज्ञान, बहुविषयक शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा से परिचय, प्रौद्योगिकी के एकीकरण तथा समान शैक्षिक अवसर सुनिश्चित करने पर जोर देती है।
UDISE+ 2025–26 के प्रमुख निष्कर्ष
- विस्तार के साथ असमान पहुँच : विद्यालयी भागीदारी एवं विद्यार्थियों के विद्यालय में बने रहने की स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन भौगोलिक असमानताएँ अभी भी स्पष्ट रूप से विद्यमान हैं।
- आधार सीडिंग आंध्र प्रदेश में 99.6% तथा चंडीगढ़ में 99% तक पहुँच गई है, जबकि मेघालय में यह केवल 35% है। राष्ट्रीय औसत 90.2% है।
- मेघालय में आधारभूत चरण का सकल नामांकन अनुपात (GER) 131 है, जबकि बिहार में यह केवल 24 है। माध्यमिक स्तर पर चंडीगढ़ में यह 109 है, जबकि बिहार में 48 है।

- सामाजिक असमानताएँ बनी हुई हैं : राष्ट्रीय स्तर पर GER अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के विद्यार्थियों में सर्वाधिक 49%, इसके बाद सामान्य वर्ग में 27%, SC में 17% तथा ST में 10% है।
- राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में नामांकन की सामाजिक संरचना में पर्याप्त अंतर है। मिजोरम, मेघालय, लद्दाख और लक्षद्वीप जैसे क्षेत्रों में ST विद्यार्थियों का नामांकन विशेष रूप से अधिक है, जबकि पंजाब में SC विद्यार्थियों का प्रतिनिधित्व अधिक है।
- लिंग समानता सूचकांक दर्शाता है कि अधिकांश राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में लड़कियों की भागीदारी लड़कों की तुलना में अधिक है। यह लैंगिक समावेशन की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

- शिक्षकों की उपलब्धता में असमानता: विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात (PTR) में काफी अंतर पाया जाता है।
- झारखंड में माध्यमिक स्तर पर PTR 43 तक पहुँच जाता है, जो शिक्षकों पर अत्यधिक कार्यभार का संकेत देता है, जबकि सिक्किम में यह केवल 6 है।
- ग्रामीण एवं दूरदराज के विद्यालयों में शिक्षकों की कमी बनी हुई है। वहाँ शिक्षकों को बहु-कक्षीय शिक्षण तथा गैर-शैक्षणिक कार्यों का अतिरिक्त भार भी उठाना पड़ता है।


- विद्यालय छोड़ना अभी भी चिंता का विषय: बिहार में प्रारंभिक चरण में विद्यालय छोड़ने की दर 7.9% तथा मध्य चरण में 9% है, जो सर्वाधिक है।
- माध्यमिक स्तर पर लद्दाख में विद्यालय छोड़ने की दर सर्वाधिक 14.8% है, जिसके बाद कर्नाटक का स्थान है।
- ये प्रवृत्तियाँ माध्यमिक शिक्षा में सुचारु संक्रमण तथा उसकी पूर्णता सुनिश्चित करने में आने वाली कठिनाइयों को दर्शाती हैं।
- बुनियादी ढाँचे एवं समावेशन में अंतर: विद्युत एवं पेयजल तक पहुँच में सुधार हुआ है, लेकिन बुनियादी ढाँचे की उपलब्धता अभी भी असमान है।
- दूरदराज, जनजातीय, पहाड़ी एवं सीमावर्ती क्षेत्रों में परिवहन तथा विद्यालयों तक पहुँच से संबंधित अधिक कठिनाइयाँ हैं।
- SC/ST समुदायों, अल्पसंख्यकों, गरीब परिवारों तथा दिव्यांग बच्चों को अभी भी अतिरिक्त बाधाओं का सामना करना पड़ता है।

प्रमुख मुद्दे एवं चिंताएँ
- क्षेत्रीय असमानताएँ: नामांकन, विद्यालय छोड़ने की दर, विद्यालयों की उपलब्धता, बुनियादी ढाँचे तथा विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात में राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों के बीच व्यापक अंतर है।
- पहाड़ी, जनजातीय, सीमावर्ती तथा भौगोलिक रूप से दूरस्थ क्षेत्रों में विद्यालयों की कमी और सीमित परिवहन सुविधा एक प्रमुख समस्या है।
- सामाजिक असमानताएँ: SC, ST, अल्पसंख्यक तथा आर्थिक रूप से वंचित विद्यार्थियों को अधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
- GER शिक्षा तक असमान पहुँच को दर्शाता है, जिसमें सामाजिक समूहों तथा शिक्षा के विभिन्न स्तरों के बीच बड़े अंतर विद्यमान हैं।
- बिहार, उत्तर प्रदेश एवं लद्दाख विभिन्न शैक्षिक स्तरों पर अपेक्षाकृत अधिक विद्यालय छोड़ने की दर वाले क्षेत्रों में शामिल हैं।
- शिक्षकों की कमी एवं कार्यभार: ग्रामीण, दूरदराज एवं आर्थिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों में प्रशिक्षित शिक्षकों की अभी भी कमी है।
- विशेषकर माध्यमिक स्तर तथा अधिक जनसंख्या वाले राज्यों में शिक्षकों पर कार्यभार अधिक होने के कारण विद्यार्थियों को व्यक्तिगत ध्यान कम मिल पाता है।
- बुनियादी ढाँचे की कमी: पेयजल एवं विद्युत की उपलब्धता में सुधार हुआ है, लेकिन अनेक ग्रामीण एवं वंचित क्षेत्रों में अभी भी आवश्यक सुविधाओं का अभाव है।
- कई विद्यालयों में दिव्यांग बच्चों के लिए सुगम कक्षाएँ, समावेशी बुनियादी ढाँचा तथा अनुकूल शिक्षण पद्धतियाँ उपलब्ध नहीं हैं।
- डिजिटल विभाजन: डिजिटल संसाधनों तक पहुँच में अंतर विभिन्न क्षेत्रों एवं समुदायों के बीच सीखने के अवसरों में बाधाएँ उत्पन्न करता है।
- लैंगिक एवं समावेशन संबंधी समस्याएँ: लड़कियों की भागीदारी में सुधार हुआ है, फिर भी विद्यालय छोड़ने की दर कम करने तथा माध्यमिक शिक्षा में सुचारु संक्रमण सुनिश्चित करने से संबंधित चिंताएँ बनी हुई हैं।
- उच्च कक्षाओं में कमजोर संक्रमण: शिक्षा तक पहुँच में सुधार हमेशा प्राथमिक से माध्यमिक स्तर तक बेहतर संक्रमण या विद्यार्थियों के विद्यालय में बने रहने में परिवर्तित नहीं हुआ है।
संबंधित सुधार एवं पहल
- सरकार की प्रमुख पहलों में NEP 2020, समग्र शिक्षा, PM SHRI विद्यालय, NIPUN भारत, PM POSHAN, DIKSHA, UDISE+ तथा राष्ट्रीय साधन-सह-योग्यता छात्रवृत्ति योजना शामिल हैं।
- इन पहलों का उद्देश्य आधारभूत शिक्षा, बुनियादी ढाँचे, पोषण, शिक्षक क्षमता, डिजिटल पहुँच तथा शैक्षिक समावेशन को सुदृढ़ करना है।
आगे की राह: भारत की स्कूली शिक्षा प्रणाली का सुदृढ़ीकरण
- भारत को पहुँच-केंद्रित दृष्टिकोण से समानता एवं सीखने-केंद्रित दृष्टिकोण की ओर बढ़ने की आवश्यकता है।
- शैक्षिक रूप से वंचित जिलों को आवश्यकता-आधारित बुनियादी ढाँचे एवं परिवहन निवेश के माध्यम से लक्षित किया जाना चाहिए।
- शिक्षकों की तैनाती को तर्कसंगत बनाया जाए तथा ग्रामीण, जनजातीय एवं कठिन क्षेत्रों में कार्यरत शिक्षकों को प्रोत्साहन दिया जाए।
- माध्यमिक विद्यालयों में संक्रमण को बेहतर बनाने के साथ आधारभूत साक्षरता एवं संख्यात्मक ज्ञान को सुदृढ़ किया जाए।
- कक्षा-कक्षीय शिक्षण को प्रतिस्थापित किए बिना किफायती डिजिटल बुनियादी ढाँचे एवं उपकरणों तक पहुँच का विस्तार किया जाए।
- विद्यालयों को वास्तव में दिव्यांग-अनुकूल एवं समावेशी बनाया जाए, जिसमें सुगम भवन, सहायक प्रौद्योगिकी तथा प्रशिक्षित शिक्षक उपलब्ध हों।
- जिला स्तर पर लक्षित हस्तक्षेप, निगरानी एवं परिणाम-आधारित नीति निर्माण के लिए UDISE+ के आँकड़ों का उपयोग किया जाए।
- शैक्षिक हस्तक्षेपों को गरीबी उन्मूलन, पोषण, सामाजिक सुरक्षा तथा लैंगिक-संवेदनशील नीतियों के साथ एकीकृत किया जाए।
निष्कर्ष
- UDISE+ 2025–26 यह दर्शाता है कि भारत ने स्कूली शिक्षा के विस्तार, विद्यार्थियों की भागीदारी में सुधार तथा बुनियादी ढाँचे को सुदृढ़ करने में उल्लेखनीय प्रगति की है।
- लेकिन क्षेत्रीय एवं सामाजिक असमानताओं का बने रहना यह दर्शाता है कि सार्वभौमिक पहुँच समान शैक्षिक अवसर का पर्याय नहीं है।
- NEP 2020 की परिकल्पना तथा SDG 4—सभी के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए लक्षित सार्वजनिक निवेश, शिक्षकों की समान एवं प्रभावी तैनाती तथा वंचित समुदायों के लिए मजबूत सहायता तंत्र आवश्यक हैं।
- अतः भारत के शिक्षा क्षेत्र में आगामी परिवर्तन विस्तार से समानता, गुणवत्ता एवं सीखने के परिणामों की ओर होना चाहिए।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न]: भारत की स्कूली शिक्षा प्रणाली ने शिक्षा तक पहुँच एवं नामांकन के विस्तार में महत्वपूर्ण प्रगति की है, किंतु क्षेत्रीय, सामाजिक एवं बुनियादी ढाँचे से संबंधित असमानताएँ अभी भी समान और न्यायसंगत शैक्षिक परिणामों की प्राप्ति में बाधक बनी हुई हैं। चर्चा कीजिए। |
स्रोत: TH
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