भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली: प्रमुख चिंताएँ और आगे की राह

पाठ्यक्रम: GS2/शासन

संदर्भ

  • हाल ही में बॉम्बे हाई कोर्ट ने मुंबई ट्रेन ब्लास्ट मामले (2006) में पूर्व में दोषी ठहराए गए सभी 12 लोगों को बरी कर दिया है, यह कहते हुए कि अभियोजन पक्ष उनके अपराध को सिद्ध करने में पूरी तरह विफल रहा।
    • इस निर्णय ने भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता एवं प्रभावशीलता को लेकर परिचर्चा को पुनः शुरू कर दिया है, और यह आतंकवाद के पीड़ितों को न्याय दिलाने की सामूहिक क्षमता पर सवाल उठाता है।

भारत में आपराधिक न्याय प्रणाली

  •  भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली अभूतपूर्व पेंडेंसी से जूझ रही है, जिससे समय पर न्याय की पहुंच और संस्थागत दक्षता पर गंभीर चिंता उत्पन्न हो रही है।
  • लंबित मामलों की स्थिति:
    • अगस्त 2024 तक भारतीय न्यायालयों में 5.84 करोड़ मामले लंबित हैं; जिनमें लगभग 80% आपराधिक मामले हैं.।
      • इनमें से 1 लाख से अधिक मामले अपीलीय न्यायालयों में लंबित हैं।
    • प्रत्येक वर्ष लगभग 60% मामले निपटाए जाते हैं, जबकि शेष 40% पेंडेंसी में जुड़ते जाते हैं।
    • राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG) के अनुसार:
      • 10% मामले 10 वर्षों से अधिक समय से लंबित हैं।
      • 32% मामले एक वर्ष से कम पुराने हैं, लेकिन देरी शुरू से ही होती है।
  • भारत में दोषसिद्धि और बरी किए जाने की दर:
    • राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार:
      • 2022 में दोषसिद्धि दर: 54.2%, जो 2021 के 57% से कम है।
      • ऐतिहासिक औसत (2000–2022): लगभग 42.5%, जिसका उच्चतम स्तर 2020 में 59.2% था।

भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली की संरचनात्मक समस्याएँ:

  • पुलिस और जांच प्रणाली:
    • संसाधन की कमी और अत्यधिक भार: मानव संसाधन की कमी, कमजोर प्रशिक्षण और वैज्ञानिक जांच तकनीकों का अभाव प्रभावी अपराध पहचान एवं अभियोजन को बाधित करता है।
    • फॉरेंसिक ढांचे की कमी: कबूलनामों पर अत्यधिक निर्भरता और साक्ष्यों के कमजोर संरक्षण से न्यायिक मानकों की पूर्ति नहीं हो पाती।
    • राजनीतिक हस्तक्षेप: बार-बार स्थानांतरण और व्यावसायिक स्वायत्तता की कमी से जांच अधिकारियों की निष्पक्षता और मनोबल प्रभावित होता है।
  • अभियोजन और न्यायपालिका:
    • कमजोर अभियोजन: अभियोजक प्रायः अपर्याप्त प्रशिक्षित, अति-कार्यभार से दबे हुए और स्वतंत्र रूप से मुकदमा लड़ने में सक्षम नहीं होते।
    • न्यायिक विलंब: बड़े पैमाने पर लंबित मामले (50 मिलियन से अधिक) लंबी सुनवाई, बार-बार स्थगन और देरी वाले न्याय का कारण बनते हैं।
    • न्यायाधीशों की कमी: न्यायाधीशों की प्रति लाख जनसंख्या दर विधि आयोग की अनुशंसा (50 प्रति मिलियन) से काफी कम है।
    • कानूनी सहायता की गुणवत्ता: गरीब और हाशिए पर रहने वाले लोग गुणवत्ता युक्त रक्षा नहीं ले पाते, जिससे उन्हें प्रणालीगत हानि का सामना करना पड़ता है।
  • हिरासत, जमानत और विचाराधीन कैदी जनसंख्या:
    • विचाराधीन कैदियों की बड़ी संख्या: भारत की जेलों की दो-तिहाई जनसंख्या विचाराधीन कैदियों की है—जिनमें से कई आरोपों के लिए अधिकतम सजा से भी अधिक समय तक कैद में रहते हैं।
    • कठोर जमानत प्रावधान: विशेष कानूनों (जैसे UAPA, TADA) के तहत जमानत मिलना कठिन है, जिससे बिना दोषसिद्धि लंबे समय तक कैद होती है।
  • पीड़ितों के अधिकार और समर्थन:
    • पीड़ितों की आवश्यकताओं की उपेक्षा: ध्यान सामान्यतः आरोपी और राज्य पर रहता है, जिससे पीड़ितों के अधिकार, भागीदारी एवं मुआवजे को नजरअंदाज किया जाता है।
  • आतंकवाद और विशेष कानून:
    • असाधारण कानून, साधारण समस्याएँ: UAPA जैसे कानून आतंकवाद से सख्ती से निपटने का लक्ष्य रखते हैं, लेकिन साक्ष्य संग्रह में चूक और दुरुपयोग से गलत दोषसिद्धि एवं असली अपराधियों के छूटने की घटनाएँ सामने आती हैं।

भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली के लिए प्रमुख सुधार:

  • आयोग और रिपोर्टें:
    • मलिमथ समिति (2003), विधि आयोग आदि ने कई सुधार सुझाए हैं—जैसे पुलिस की स्वायत्तता मजबूत करना, केस प्रबंधन, पीड़ित मुआवजा और तकनीक का उपयोग।
  • विधायी प्रयास:
    • भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023: भारतीय दंड संहिता 1860 का स्थान लेती है।
    • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023: दंड प्रक्रिया संहिता के स्थान पर।
    • भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA), 2023: भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 के स्थान पर।
    • ये नए अपराधों को परिभाषित करते हैं: मोब लिंचिंग, संगठित अपराध और साइबर अपराध।
      • यौन अपराधों को लैंगिक रूप से तटस्थ बनाते हैं।
      • छोटे अपराधों के लिए सामुदायिक सेवा जैसी सजा का प्रावधान करते हैं।
  • न्यायिक दिशा-निर्देश:
    • सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस सुधार, तेज सुनवाई, कानूनी सहायता सुधार और जेलों को खाली करने का समर्थन किया है।

आगे की राह:

  • पुलिस और जांच प्रणाली को सुदृढ़ करना:
    • वैज्ञानिक विधियाँ: फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं में निवेश, तकनीकी स्टाफ की भर्ती, और डिजिटल साक्ष्य के उपयोग को बढ़ावा।
    • स्वायत्तता और जवाबदेही: पुलिस नियुक्तियों का राजनीतिकरण समाप्त करना, निश्चित कार्यकाल तय करना, और स्वतंत्र निगरानी संस्थाएँ बनाना।
  • अभियोजन और कानूनी सहायता का पुनर्गठन:
    • स्वतंत्र अभियोजन सेवा: कार्यपालिका से स्वतंत्र, अच्छी तरह प्रशिक्षित और पर्याप्त स्टाफ।
    • गुणवत्तापूर्ण कानूनी सहायता: राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण को मजबूत बनाना, गरीबों को सक्षम प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना।
  • न्यायिक दक्षता:
    • केस प्रबंधन प्रणाली: ई-कोर्ट, स्मार्ट शेड्यूलिंग और पेपरलेस दस्तावेज़ीकरण।
    • विशेष न्यायालय: आतंकवाद, यौन हिंसा और आर्थिक अपराधों के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट
    • न्यायिक रिक्तियाँ: सभी स्तरों पर पदों को भरना और जजों। को जटिल कानूनों में प्रशिक्षित करना (जैसे साइबर, आतंकवाद और सफेदपोश अपराध)।
  • विचाराधीन कैदियों के लिए सुधार:
    • जमानत सुधार: जमानत को सामान्य और जेल को अपवाद बनाना, विशेषतः गैर-हिंसक अपराधों के मामलों में।
    • नियमित समीक्षा: विचाराधीन कैद की न्यायिक समीक्षा अनिवार्य बनाना।
  •  पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण:
  • भागीदारी और संरक्षण: प्रक्रिया संबंधी अधिकार बढ़ाना, गवाह संरक्षण, और पीड़ितों को गरिमापूर्ण न्याय तक पहुंच देना।
  • मुआवजा और पुनर्वास: समयबद्ध योजनाओं के माध्यम से मुआवजा और मानसिक-सामाजिक समर्थन को संस्थागत बनाना।
  • आतंकवाद से लड़ते समय अधिकारों की रक्षा:
    • सुरक्षा और स्वतंत्रता का संतुलन: निवारक हिरासत और आतंकवाद विरोधी कानूनों के उपयोग में कठोर सुरक्षा उपायों को लागू करना ताकि दुरुपयोग न हो।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न] भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली के सामने आने वाली प्रमुख चुनौतियों का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए। समतापूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए कौन से सुधार आवश्यक हो सकते हैं?

Source: IE

 

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