पाठ्यक्रम: GS3/ पर्यावरण
संदर्भ
- संघ मंत्रिमंडल ने संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन और पेरिस समझौते के अंतर्गत भारत के अद्यतन राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) 2031–2035 को स्वीकृति दी है।
राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) क्या हैं?
- NDCs देश-विशिष्ट जलवायु कार्ययोजनाएँ हैं जिन्हें पेरिस समझौते के अंतर्गत प्रस्तुत किया जाता है।
- इनमें ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने और जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन हेतु लक्ष्यों का विवरण होता है।
- महत्वाकांक्षा बढ़ाने के लिए इन्हें समय-समय पर संशोधित किया जाता है।
भारत के NDC के मार्गदर्शक सिद्धांत
- भारत का NDC समान किंतु भिन्न उत्तरदायित्व एवं संबंधित क्षमताएँ (CBDR-RC) के सिद्धांत पर आधारित है। यह दृष्टिकोण समानता और जलवायु न्याय पर बल देता है।
- भारत का NDC विकासात्मक आवश्यकताओं, ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु प्रतिबद्धताओं के बीच संतुलन स्थापित करता है।
NDC 3.0 (2031–2035) के प्रमुख लक्ष्य
- उत्सर्जन तीव्रता में कमी: भारत ने 2005 के स्तर की तुलना में 2035 तक GDP की उत्सर्जन तीव्रता (CO₂ प्रति GDP इकाई) को 47% तक घटाने का संकल्प लिया है।
- भारत पहले ही 2005 से 2020 के बीच लगभग 36% उत्सर्जन तीव्रता कम कर चुका है।
- गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता का विस्तार: भारत ने 2035 तक अपनी स्थापित विद्युत क्षमता का 60% गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से प्राप्त करने का लक्ष्य रखा है।
- 2026 तक भारत ने पहले ही 52% से अधिक गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता हासिल कर ली है।
- कार्बन सिंक का निर्माण: भारत ने 2035 तक वन और वृक्ष आवरण के माध्यम से 3.5 से 4 अरब टन CO₂ समकक्ष का कार्बन सिंक बनाने का संकल्प लिया है।
भारत के NDC लक्ष्यों को प्राप्त करने में चुनौतियाँ
- प्रौद्योगिकी और नवाचार अंतराल: ग्रीन हाइड्रोजन, बैटरी भंडारण, कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण (CCUS) जैसी महत्वपूर्ण तकनीकें अभी महंगी हैं और व्यावसायिक रूप से व्यापक नहीं हैं।
- जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता: ऊर्जा सुरक्षा और लागत कारणों से भारत की ऊर्जा संरचना में कोयला प्रमुख बना हुआ है। गैर-जीवाश्म क्षमता 50% से अधिक है, लेकिन वास्तविक विद्युत उत्पादन में इसका हिस्सा लगभग 25% ही है।
- अवसंरचना दबाव: तीव्र शहरीकरण के कारण शहर उत्सर्जन में बड़ा योगदान देते हैं। आवास, परिवहन और उद्योग की बढ़ती मांग कार्बन पदचिह्न को बढ़ाती है।
NDC लक्ष्यों को प्राप्त करने हेतु प्रमुख सरकारी पहल
- पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना – घरेलू स्तर पर रूफटॉप सौर ऊर्जा को बढ़ावा देना और जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली खपत को कम करना।
- पीएम-कुसुम (प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान) – कृषि में डीज़ल उपयोग घटाने हेतु सौर पंप और विकेन्द्रीकृत सौर संयंत्रों को बढ़ावा देना।
- राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन – कठिन-से-घटाए जाने वाले क्षेत्रों का डीकार्बोनाइजेशन और भारत को वैश्विक ग्रीन हाइड्रोजन केंद्र के रूप में स्थापित करना।
- उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाएँ – सौर मॉड्यूल, बैटरी और विद्युत वाहनों के घरेलू निर्माण को समर्थन।
- ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर परियोजना – नवीकरणीय ऊर्जा के एकीकरण हेतु प्रसारण अवसंरचना को सुदृढ़ करना।
- राष्ट्रीय वनीकरण कार्यक्रम – वन आवरण बढ़ाकर कार्बन सिंक का निर्माण।
आगे की राह
- भारत को ग्रीन बॉन्ड, मिश्रित वित्त और निजी क्षेत्र की भागीदारी के माध्यम से जलवायु वित्त जुटाने को बढ़ाना चाहिए, साथ ही वैश्विक जलवायु वित्त की सक्रिय रूप से मांग करनी चाहिए।
- भारत को कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण (CCUS), हाइड्रोजन एवं भंडारण समाधान जैसी उभरती तकनीकों में अनुसंधान और नवाचार में निवेश करना चाहिए।
- भारत को कोयले पर निर्भरता को क्रमिक और न्यायसंगत संक्रमण रणनीति के माध्यम से धीरे-धीरे कम करना चाहिए, जिससे रोजगार एवं क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं की रक्षा हो सके।
स्रोत: PIB
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