भारत की जल शासन व्यवस्था

पाठ्यक्रम: GS2/शासन; GS3/जल संरक्षण

संदर्भ

  • प्रधानमंत्री मोदी ने एक लेख साझा किया जिसमें भारत की जल-सुरक्षित भविष्य प्राप्त करने की व्यापक दृष्टि को रेखांकित किया गया है।

लेख की मुख्य विशेषताएँ

  • भारत का जल शासन संरक्षण, सतत उपयोग और सक्रिय सामुदायिक भागीदारी की नींव पर आधारित है।
  • यह आगे इस बात पर बल देता है कि जल शक्ति मंत्रालय की स्थापना ने देशभर में समग्र और एकीकृत जल प्रबंधन की दिशा में एक निर्णायक परिवर्तन को चिह्नित किया।

भारत में जल उपलब्धता

  • भारत में विश्व की 18% जनसंख्या निवास करती है, लेकिन इसके पास केवल 4% स्वच्छ जल संसाधन हैं, जिससे उपलब्ध जल प्रणालियों पर अत्यधिक दबाव पड़ता है।
  • जल शक्ति मंत्रालय के अधीन केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) की वार्षिक भूजल गुणवत्ता रिपोर्ट 2024 के अनुसार, भारत में औसत भूजल दोहन स्तर 60.4% है।
  • दक्षिणी राज्य, विशेषकर कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश, देश में सबसे गंभीर एवं बहुआयामी जल चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।

भारत में जल शासन

  • संवैधानिक प्रावधान:
    • राज्य विषय: जल मुख्यतः राज्य सूची (सातवीं अनुसूची) की प्रविष्टि 17 के अंतर्गत आता है।
    • संघ की भूमिका: संघ सूची की प्रविष्टि 56 के अंतर्गत अंतर-राज्यीय नदियों का विनियमन।
    • अनुच्छेद 262: संसद को अंतर-राज्यीय जल विवादों का निपटारा करने का अधिकार है।

भारत में जल शासन की प्रमुख समस्याएँ

  • खंडित संस्थागत ढाँचा: जल शासन राज्य सूची में होने के कारण अत्यधिक खंडित है, जिससे राज्यों के बीच अधिकार क्षेत्रीय संघर्ष उत्पन्न होते हैं।
  • अभियांत्रिकी-केंद्रित दृष्टिकोण का प्रभुत्व: भारत की जल प्रबंधन नीतियाँ ऐतिहासिक रूप से बाँध, नहर और सिंचाई प्रणालियों जैसी बड़े पैमाने की अवसंरचना पर केंद्रित रही हैं।
    • यह दृष्टिकोण आपूर्ति वृद्धि को प्राथमिकता देता है जबकि पारिस्थितिकीय स्थिरता और माँग प्रबंधन की उपेक्षा करता है।
  • कृषि नीतियाँ: धान और गेहूँ जैसी जल-प्रधान फसलों को बढ़ावा देने वाली कृषि नीतियों ने अत्यधिक भूजल दोहन को उत्पन्न कर दिया है।
  • पारिस्थितिकी-आधारित दृष्टिकोण का अभाव: जल शासन भूमि, जल और पारिस्थितिक तंत्रों के अंतर्संबंधों को पर्याप्त रूप से शामिल नहीं करता।
    • पर्यावरणीय प्रवाह (ई-फ्लो) की प्रायः उपेक्षा की जाती है, जिससे नदियों और आर्द्रभूमियों का क्षरण होता है।
  • कमज़ोर डेटा प्रणाली: देशभर में विश्वसनीय, व्यापक और सुलभ जल डेटा का अभाव है। इससे खराब योजना, अक्षम आवंटन और अनियंत्रित जल दोहन होता है।
  • माँग-पक्षीय प्रबंधन की उपेक्षा: जल नीतियाँ मुख्यतः आपूर्ति बढ़ाने पर केंद्रित हैं, जबकि माँग प्रबंधन पर सीमित ध्यान दिया जाता है।
    • जल उपयोग दक्षता, संरक्षण प्रथाओं और यथोचित मूल्य निर्धारण को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता।

प्रतिमान परिवर्तन की आवश्यकता

  • खंडित और अभियांत्रिकी-प्रधान दृष्टिकोण से हटकर एक व्यापक शासन ढाँचे की ओर बढ़ने की आवश्यकता है।
  • जल को साझा और सीमित संसाधन मानते हुए विभिन्न क्षेत्रों में समन्वित प्रबंधन किया जाना चाहिए।
  • ध्यान आपूर्ति वृद्धि से हटकर स्थिरता, दक्षता और समानता पर केंद्रित होना चाहिए।

सरकारी पहलें

  • जल शक्ति अभियान (2019): जल संरक्षण और जल-संकटग्रस्त जिलों में भूजल पुनर्भरण पर केंद्रित।
  • AMRUT 2.0 योजना (2021): सभी शहरी स्थानीय निकायों/शहरों में शुरू की गई, जिससे शहर ‘आत्मनिर्भर’ और ‘जल सुरक्षित’ बन सकें।
    • इसमें जल निकायों का पुनर्जीवन और हरित क्षेत्र व पार्कों का विकास भी शामिल है।
  • अमृत सरोवर मिशन: प्रति ज़िले 75 जल निकायों के विकास और पुनर्जीवन का लक्ष्य।
  • राष्ट्रीय जलभृत मानचित्रण कार्यक्रम (NAQUIM): जलभृतों की पहचान और समझ में सहायता करता है ताकि सतत प्रबंधन किया जा सके।
  • अटल भूजल योजना: प्राथमिक क्षेत्रों में भूजल प्रबंधन सुधारने हेतु शुरू की गई, जहाँ स्थिति गंभीर और अति-दोहन वाली है।
  • जल जीवन मिशन (JJM): प्रत्येक ग्रामीण परिवार को सुनिश्चित पेयजल उपलब्ध कराने हेतु; 2019 से सरकार राज्यों के साथ साझेदारी में इसे लागू कर रही है।
    • यह पहल नियमित और दीर्घकालिक आधार पर निर्धारित गुणवत्ता वाले पर्याप्त जल की आपूर्ति नल कनेक्शन के माध्यम से सुनिश्चित करती है।

स्रोत: PIB

 

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