पैक्स सिलिका और डिजिटल उपनिवेशवाद का नया युग

पाठ्यक्रम: GS3/ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

संदर्भ

  • राज्यसभा में यह चिंता व्यक्त की गई है कि भारत की पैक्स सिलिका में भागीदारी डिजिटल उपनिवेशवाद को जन्म दे सकती है।

पैक्स सिलिका के बारे में

  • पैक्स सिलिका एक अमेरिका-नेतृत्व वाली रणनीतिक पहल है जिसका उद्देश्य महत्त्वपूर्ण खनिजों से सुरक्षित, समृद्ध और नवाचार-आधारित सिलिकॉन आपूर्ति श्रृंखला का निर्माण करना है।
  • प्रथम पैक्स सिलिका शिखर सम्मेलन दिसंबर 2025 में आयोजित हुआ था और इसके हस्ताक्षरकर्ताओं में ऑस्ट्रेलिया, इज़राइल, जापान, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, ब्रिटेन, नीदरलैंड और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं।
    • ये देश मिलकर उन प्रमुख कंपनियों और निवेशकों का केंद्र हैं जो वैश्विक एआई आपूर्ति श्रृंखला को शक्ति प्रदान करते हैं।
    • भारत ने फरवरी 2026 में नई दिल्ली में आयोजित AI इम्पैक्ट समिट के दौरान इस पहल में शामिल हुआ।
  • इसका उद्देश्य जबरन निर्भरताओं को कम करना, कृत्रिम बुद्धिमत्ता की नींव रखने वाले संसाधनों और क्षमताओं की रक्षा करना, और यह सुनिश्चित करना है कि सहयोगी राष्ट्र बड़े पैमाने पर परिवर्तनकारी तकनीकों का विकास एवं परिनियोजन कर सकें।
  • देश वैश्विक प्रौद्योगिकी आपूर्ति श्रृंखला के रणनीतिक घटकों को सुरक्षित करने में साझेदारी करेंगे, जिनमें सॉफ़्टवेयर अनुप्रयोग और प्लेटफ़ॉर्म भी शामिल हैं।

डिजिटल उपनिवेशवाद क्या है?

  • डिजिटल उपनिवेशवाद उस व्यवस्था को संदर्भित करता है जिसमें विकसित देश या निगम अन्य राष्ट्रों के डिजिटल बुनियादी ढाँचे, डेटा और तकनीकी मानकों पर नियंत्रण रखते हैं।
    • विकासशील देश विदेशी प्लेटफ़ॉर्म, सॉफ़्टवेयर और डेटा पारिस्थितिक तंत्र पर निर्भर हो जाते हैं।
  • यह पारंपरिक उपनिवेशवाद के समान है, लेकिन इसमें नियंत्रण क्षेत्रीय नियन्त्रण के बजाय डेटा, एल्गोरिद्म और डिजिटल नेटवर्क के माध्यम से किया जाता है।

डिजिटल उपनिवेशवाद के संभावित प्रेरक के रूप में पैक्स सिलिका

  • प्रौद्योगिकी मानक निर्धारण में प्रभुत्व: पैक्स सिलिका का उद्देश्य एआई, सेमीकंडक्टर और डिजिटल बुनियादी ढाँचे में वैश्विक मानक स्थापित करना है।
    • यदि मानक उन्नत अर्थव्यवस्थाओं द्वारा नियंत्रित होते हैं, तो भारत को बाहरी तकनीकी मानदंड अपनाने और घरेलू विनियमों को विदेशी ढाँचों के अनुरूप बनाने के लिए बाध्य होना पड़ सकता है।
  • डेटा पारिस्थितिकी तंत्र पर नियंत्रण: डिजिटल अर्थव्यवस्था में डेटा मुख्य संसाधन है। ऐसे ढाँचों में भागीदारी से सीमा-पार डेटा प्रवाह बाहरी नियमों द्वारा नियंत्रित हो सकता है और विदेशी क्लाउड बुनियादी ढाँचे तथा एआई प्लेटफ़ॉर्म पर निर्भरता बढ़ सकती है।
    • इससे डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 की प्रभावशीलता पर प्रश्न उठते हैं।
  • प्रौद्योगिकी पर निर्भरता: विदेशी प्रौद्योगिकी प्रदाताओं पर अत्यधिक निर्भरता स्वदेशी नवाचार को सीमित कर सकती है और सेमीकंडक्टर तथा एआई जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में दीर्घकालिक निर्भरता उत्पन्न कर सकती है।
    • इससे भारत की आत्मनिर्भर डिजिटल क्षमताओं के निर्माण की क्षमता कमजोर हो सकती है।
  • रणनीतिक स्वायत्तता का क्षरण: डिजिटल बुनियादी ढाँचा राष्ट्रीय सुरक्षा से गहराई से जुड़ा है और डिजिटल प्रणालियों पर बाहरी प्रभाव नीति विकल्पों को सीमित कर सकता है तथा रणनीतिक क्षेत्रों में निर्णय-निर्माण को प्रभावित कर सकता है।

भारत के लिए पैक्स सिलिका का महत्व

  • पैक्स सिलिका में शामिल होना भारत को चीन से हटकर ऑस्ट्रेलिया जैसे सुरक्षित आपूर्तिकर्ताओं की ओर विविधीकरण करने में सहायता कर सकता है।
  • यह जापान और नीदरलैंड के साथ साझेदारी के माध्यम से निवेश और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को सुगम बना सकता है।
  • यह भारत की विशाल मोनाज़ाइट और थोरियम संसाधनों से दुर्लभ पृथ्वी खनिजों के उन्नत निष्कर्षण एवं प्रसंस्करण की क्षमताओं को बढ़ावा दे सकता है।

आगे की राह

  • पैक्स सिलिका पर परिचर्चा 21वीं सदी में डिजिटल उपनिवेशवाद से संबंधित व्यापक वैश्विक चिंता को दर्शाती है।
  • भारत को अपनी डिजिटल संप्रभुता की रक्षा करते हुए वैश्विक तकनीकी एकीकरण का सावधानीपूर्वक संतुलन करना होगा।
  • एक संतुलित दृष्टिकोण, जो आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दे और साथ ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सहभागिता करे, डिजिटल युग में नई निर्भरताओं से बचने के लिए अत्यंत आवश्यक होगा।

स्रोत: TH

 

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