ताजमहल
पाठ्यक्रम: GS1 / इतिहास एवं संस्कृति
संदर्भ
- इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने ताजमहल का सर्वेक्षण कराने की मांग संबंधी एक याचिका पर केंद्र सरकार तथा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को नोटिस जारी किया है। याचिका में दावा किया गया है कि ताजमहल वास्तव में “तेजो महालय” नामक एक हिंदू मंदिर है।
परिचय
- याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि ताजमहल मूलतः भगवान शिव का मंदिर था, जिसे “तेजो महालय” के नाम से जाना जाता था।
- तेजो महालय सिद्धांत को पी. एन. ओक ने अपनी पुस्तकों ताजमहल इज़ ए टेम्पल पैलेस (1965) तथा ताजमहल: द ट्रू स्टोरी (1989) के माध्यम से लोकप्रिय बनाया।
- किंतु इतिहासकारों ने समकालीन अभिलेखों, पुरातात्त्विक साक्ष्यों, अभिलेखों अथवा किसी भी ऐसे स्थापत्य प्रमाण के अभाव में, जो इस स्मारक को मुगल-पूर्व हिंदू मंदिर से जोड़ता हो, इस दावे को निरंतर अस्वीकार किया है।
ताजमहल
- ताजमहल 17वीं शताब्दी का एक मुगल मकबरा है, जो आगरा में यमुना नदी के दाहिने तट पर स्थित है। इसे वर्ष 1983 में विश्व धरोहर स्थल (UNESCO) घोषित किया गया।
- इसका निर्माण मुगल सम्राट शाहजहाँ ने अपनी पत्नी मुमताज़ महल (अर्जुमंद बानो बेगम) की स्मृति में कराया था। इसका निर्माण वर्ष 1632 ई. में प्रारंभ हुआ तथा 1648 ई. में पूर्ण हुआ।
- मुगल अभिलेखों में इसे “रौज़ा-ए-मुनव्वरा” (प्रकाशित समाधि) कहा गया है।
- मुख्य वास्तुकार: उस्ताद अहमद लाहौरी।
- इस स्मारक के निर्माण हेतु भूमि आमेर के मिर्जा राजा जयसिंह से प्राप्त की गई थी, जिसके बदले शाहजहाँ ने उन्हें उचित प्रतिपूर्ति प्रदान की थी।
- स्थापत्य विशेषताएँ: ताजमहल मुगल स्थापत्य कला की सर्वोच्च उपलब्धि का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें फ़ारसी, तैमूरी तथा भारतीय स्थापत्य परंपराओं का उत्कृष्ट समन्वय दिखाई देता है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—
- श्वेत मकराना संगमरमर का उपयोग।
- पूर्ण द्विपार्श्वीय सममिति।
- चारबाग शैली का उद्यान विन्यास।
- क़ुरआनी सुलेख।
- इस्लामी अंत्येष्टि स्थापत्य के विशिष्ट तत्व।
- पिएत्रा ड्यूरा अलंकरण कला का व्यापक उपयोग, जिसमें अर्द्ध-बहुमूल्य पत्थरों को संगमरमर में जड़कर अत्यंत आकर्षक पुष्पीय एवं ज्यामितीय आकृतियाँ निर्मित की जाती हैं।

मंगल पांडे की जयंती
पाठ्यक्रम: GS1 / आधुनिक इतिहास
संदर्भ
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महान क्रांतिकारी एवं स्वतंत्रता सेनानी मंगल पांडे की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
मंगल पांडे
- परिचय: मंगल पांडे का जन्म 19 जुलाई, 1827 को वर्तमान उत्तर प्रदेश के बलिया जनपद के नगवा ग्राम में एक भूमिहार ब्राह्मण परिवार में हुआ था।
- उन्होंने 22 वर्ष की आयु में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में भर्ती होकर 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री में सेवा की।
- विद्रोह की चिंगारी: ब्रिटिश सरकार ने हाल ही में एनफील्ड राइफल को सेना में शामिल किया था, जिसकी कारतूसों को प्रयोग से पूर्व दाँतों से काटकर खोलना पड़ता था।
- यह अफवाह फैल गई कि इन कारतूसों पर गाय एवं सूअर की चर्बी का लेप किया गया है।
- यह बात हिंदू एवं मुस्लिम दोनों समुदायों के सैनिकों की धार्मिक भावनाओं के विरुद्ध थी।
- मंगल पांडे ने ऐसे कारतूसों का प्रयोग करने से इंकार कर दिया तथा 29 मार्च, 1857 को बैरकपुर में अपने सार्जेंट मेजर पर गोली चलाकर विद्रोह का प्रथम शंखनाद किया।
- इसी घटना ने 1857 के विद्रोह को जन्म दिया, जिसे सिपाही विद्रोह अथवा भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम भी कहा जाता है।
- मंगल पांडे का सैन्य न्यायालय द्वारा मुकदमा चलाया गया तथा 8 अप्रैल, 1857 को उन्हें फाँसी दे दी गई। बाद में उनकी रेजिमेंट को भी भंग कर दिया गया।
- परिणाम: 10 मई, 1857 को मेरठ के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया और यह शीघ्र ही एक व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन का रूप ले गया।
- विद्रोही सैनिक दिल्ली पहुँचे और अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह द्वितीय को अपना प्रतीकात्मक नेता स्वीकार करने के लिए तैयार किया।
- सितंबर 1857 तक अंग्रेजों ने लाल किला पुनः अपने अधिकार में ले लिया तथा बहादुर शाह द्वितीय को रंगून निर्वासित कर दिया, जहाँ 1862 में उनका निधन हो गया।
- विद्रोह का प्रभाव: इस विद्रोह के साथ ही ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन स्थायी रूप से समाप्त हो गया।
- 1858 की महारानी विक्टोरिया की घोषणा तथा भारत शासन अधिनियम, 1858 के माध्यम से शासन का नियंत्रण सीधे ब्रिटिश क्राउन के हाथों में चला गया।
- इसके साथ ही गवर्नर-जनरल के स्थान पर वायसराय का पद स्थापित किया गया तथा लॉर्ड कैनिंग भारत के प्रथम वायसराय बने।
1857 के विद्रोह के अन्य प्रमुख नेता
- नाना साहब (कानपुर): पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र थे।
- अंग्रेजों ने उनकी पेंशन बंद कर दी थी।
- उन्होंने कानपुर के विद्रोह का नेतृत्व किया।
- बाद में वे 1859 में नेपाल चले गए, जहाँ संभवतः उनका निधन हुआ।
- वीर कुँवर सिंह (बिहार): भोजपुर के लगभग 80 वर्षीय जमींदार थे।
- उन्होंने गुरिल्ला युद्ध का नेतृत्व किया।
- 1858 में जगदीशपुर पर पुनः अधिकार किया तथा कुछ समय बाद अपने घावों के कारण उनका निधन हो गया।
- मौलवी लियाकत अली (इलाहाबाद): उन्होंने कुछ समय के लिए खुसरो बाग से इलाहाबाद पर नियंत्रण स्थापित किया।
- 1872 में उन्हें गिरफ्तार कर अंडमान भेज दिया गया।
- रानी लक्ष्मीबाई (झाँसी): उन्हें व्यपगत सिद्धांत के अंतर्गत उत्तराधिकार से वंचित कर दिया गया।
- उन्होंने 1858 में जनरल ह्यू रोज़ की सेना के विरुद्ध वीरतापूर्वक युद्ध किया।
- खान बहादुर खान (बरेली): उन्होंने 82 वर्ष की आयु में बरेली में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का नेतृत्व किया।
- उन्होंने सर कॉलिन कैंपबेल की सेना का सामना किया।
- बेगम हज़रत महल (लखनऊ): वे नवाब वाजिद अली शाह की पत्नी थीं।
- उन्होंने लखनऊ में विद्रोह का नेतृत्व किया तथा अपने पुत्र बिरजिस कद्र को शासक घोषित किया।
- 1879 में नेपाल में निर्वासन के दौरान उनका निधन हुआ।
स्रोत: PIB
शब्द संग्रहालय
पाठ्यक्रम: GS2 / राजव्यवस्था एवं शासन
संदर्भ
- केंद्रीय गृह मंत्री ने कोलकाता में ‘शब्द संग्रहालय’ के प्रथम चरण का उद्घाटन किया।
परिचय
- इसका विकास राष्ट्रीय पुस्तकालय द्वारा केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के अधीन किया गया है।
- यह देश का प्रथम अनुभवात्मक भाषा संग्रहालय है, जिसे ‘शब्दलोक’ के नाम से भी जाना जाता है।
- यह भारत की 22 अनुसूचित भाषाओं का उत्सव मनाता है तथा उनकी यात्रा को मौखिक परंपराओं और प्राचीन पांडुलिपियों से लेकर मुद्रित कृतियों एवं आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक पाठों तक प्रदर्शित करता है।
- संग्रहालय में नौ दीर्घाएँ हैं, जो भाषाओं के इतिहास तथा भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति पर उनके प्रभाव के विभिन्न आयामों को प्रदर्शित करती हैं।
- इसका उद्देश्य भाषा को एक ऐसी जीवंत इकाई के रूप में प्रस्तुत करना है, जिसने निरंतर समाज को आकार दिया है और स्वयं भी समाज से प्रभावित होती रही है।
आठवीं अनुसूची
- भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में भारत गणराज्य की मान्यता प्राप्त राजभाषाओं का उल्लेख किया गया है।
- भारतीय संविधान का भाग-17 अनुच्छेद 343 से 351 तक राजभाषा संबंधी प्रावधानों से संबंधित है।
- वर्तमान में आठवीं अनुसूची में निम्नलिखित 22 भाषाएँ सम्मिलित हैं—
असमिया, बांग्ला, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, ओड़िया, पंजाबी, संस्कृत, सिंधी, तमिल, तेलुगु, उर्दू, बोडो, संथाली, मैथिली तथा डोगरी। - इनमें से 14 भाषाएँ संविधान लागू होने के समय ही सम्मिलित थीं।
- इसके पश्चात्—
- 1967 में सिंधी,
- 1992 में कोंकणी, मणिपुरी एवं नेपाली, तथा
- 2003 के 92वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा बोडो, डोगरी, मैथिली एवं संथाली को आठवीं अनुसूची में सम्मिलित किया गया।
स्रोत: TH
विरोध-प्रदर्शन का अधिकार
पाठ्यक्रम: GS2 / शासन
समाचार में
- हाल ही में दिल्ली पुलिस ने कहा कि कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) को जंतर-मंतर पर अपना विरोध-प्रदर्शन जारी रखने अथवा संसद तक प्रस्तावित मार्च निकालने की अनुमति प्राप्त नहीं है।
विरोध-प्रदर्शन के अधिकार से संबंधित विधिक प्रावधान
- भारत में विरोध-प्रदर्शन का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के अंतर्गत प्रदत्त वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा अनुच्छेद 19(1)(ख) के अंतर्गत प्रदत्त बिना हथियारों के शांतिपूर्वक एकत्र होने के अधिकार द्वारा संरक्षित है।
- तथापि, यह अधिकार लोक व्यवस्था, सुरक्षा तथा अन्य संवैधानिक हितों को बनाए रखने हेतु लगाए गए युक्तिसंगत प्रतिबंधों के अधीन है।
- न्यायालयों ने सदैव यह माना है कि शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन लोकतंत्र का एक महत्त्वपूर्ण अंग है, किंतु इसका विधिसम्मत होना आवश्यक है।
- तथापि, यह अधिकार लोक व्यवस्था, सुरक्षा तथा अन्य संवैधानिक हितों को बनाए रखने हेतु लगाए गए युक्तिसंगत प्रतिबंधों के अधीन है।
- अनुमति प्राप्त करने की शर्तें: विधि एवं व्यवस्था राज्य सूची का विषय है, इसलिए प्रत्येक राज्य में विरोध-प्रदर्शन एवं सार्वजनिक सभाओं की अनुमति प्रदान करने के लिए अलग-अलग नियम निर्धारित हैं।
- प्रदर्शन के आयोजकों को संबंधित पुलिस प्राधिकरण से अनापत्ति प्रमाण-पत्र (NOC) प्राप्त करना होता है। इसके लिए संबंधित क्षेत्र के स्थानीय पुलिस थाने, पुलिस आयुक्त कार्यालय अथवा पुलिस उपायुक्त (DCP) कार्यालय में आवेदन प्रस्तुत करना होता है।
- आवेदन में आयोजकों का विवरण, प्रदर्शन का उद्देश्य, अवधि, स्थान, संभावित प्रतिभागियों की संख्या, रैली का मार्ग तथा ध्वनि-विस्तारक यंत्र, तंबू आदि की व्यवस्था का उल्लेख करना आवश्यक होता है।
- इसके अतिरिक्त, आवेदकों को पहचान-पत्र, निवास प्रमाण-पत्र, छायाचित्र तथा अन्य आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करने होते हैं।
- कुछ मामलों में पुलिस भीड़-नियंत्रण, सार्वजनिक सुविधाओं एवं समन्वय संबंधी अतिरिक्त जानकारी मांग सकती है तथा आयोजकों से शपथ-पत्र भी प्रस्तुत करने की अपेक्षा कर सकती है।
- अनुमति अस्वीकार करने के आधार: भारत में विरोध-प्रदर्शन का अधिकार निरपेक्ष अधिकार नहीं है, बल्कि यह युक्तिसंगत प्रतिबंधों के अधीन है।
- यदि किसी प्रदर्शन से लोक व्यवस्था, सुरक्षा, भारत की संप्रभुता एवं अखंडता, नैतिकता अथवा न्यायालय की अवमानना, मानहानि या अपराध के लिए उकसाने जैसे वैधानिक हितों को खतरा उत्पन्न होता है, तो संबंधित प्राधिकारी अनुमति देने से मना कर सकते हैं अथवा पूर्व में दी गई अनुमति वापस ले सकते हैं।
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के अंतर्गत भी प्राधिकारियों को निषेधाज्ञा जारी करने तथा चल रहे विरोध-प्रदर्शनों पर रोक लगाने का अधिकार प्राप्त है।
- हालांकि, अनुमति अस्वीकार करने अथवा वापस लेने के प्रत्येक निर्णय के लिए स्पष्ट कारण बताना आवश्यक है, जिसमें संभावित जोखिमों एवं खतरों का उल्लेख किया जाए।
स्रोत: IE
इलेक्ट्रॉनिक स्वर्ण रसीदें (EGRs)
पाठ्यक्रम: GS3 / अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- वर्ष 2026 में राष्ट्रीय स्टॉक एक्सचेंज (NSE) ने इलेक्ट्रॉनिक स्वर्ण रसीदें (EGRs) प्रारंभ कीं।
परिचय
- इलेक्ट्रॉनिक स्वर्ण रसीदें (EGRs) विनिमय पर कारोबार योग्य प्रतिभूतियाँ हैं, जो भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) द्वारा विनियमित तिजोरियों में सुरक्षित रखे गए निर्धारित शुद्धता वाले भौतिक स्वर्ण के स्वामित्व का प्रतिनिधित्व करती हैं।
- इन्हें डिमैट खाते में इलेक्ट्रॉनिक रूप में रखा जा सकता है, विभिन्न मूल्यवर्गों में खरीदा एवं बेचा जा सकता है तथा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार भौतिक स्वर्ण में परिवर्तित किया जा सकता है।
- EGRs दो शुद्धता मानकों में उपलब्ध हैं—
- 999 (99.9% शुद्ध स्वर्ण)
- 995 (99.5% शुद्ध स्वर्ण)
- प्रत्येक शुद्धता श्रेणी में निवेशकों के लिए छह मूल्यवर्ग उपलब्ध हैं—
- 10 मिलीग्राम
- 100 मिलीग्राम
- 1 ग्राम
- 10 ग्राम
- 100 ग्राम
- 1 किलोग्राम
- विभिन्न मूल्यवर्ग उपलब्ध होने के कारण EGRs प्रथम बार निवेश करने वालों तथा अनुभवी निवेशकों, दोनों के लिए उपयुक्त हैं।
- जो निवेशक भौतिक स्वर्ण प्राप्त करना चाहते हैं, वे आवश्यकता पड़ने पर निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार EGRs को भौतिक स्वर्ण में परिवर्तित कर सकते हैं।
महत्त्व
- EGRs भौतिक स्वर्ण के लाभों को इलेक्ट्रॉनिक निवेश की सुविधा के साथ जोड़ते हैं।
- SEBI द्वारा मान्यता प्राप्त प्रतिभूति होने के कारण प्रत्येक EGR निर्धारित शुद्धता एवं निश्चित मात्रा वाले स्वर्ण द्वारा समर्थित होता है, जिसे SEBI द्वारा विनियमित तिजोरियों में सुरक्षित रखा जाता है।
- इससे स्वर्ण में निवेश का एक पारदर्शी एवं मानकीकृत माध्यम उपलब्ध होता है तथा शुद्धता एवं व्यक्तिगत भंडारण से संबंधित चिंताएँ समाप्त हो जाती हैं।
- EGRs विनिमय पर कारोबार के माध्यम से पारदर्शी मूल्य-निर्धारण सुनिश्चित करते हैं, जिससे किसी भी समय पूरे देश में स्वर्ण का एक समान मूल्य उपलब्ध होता है।
- EGRs निवेशकों को तरलता, निपटान की गारंटी, परस्पर विनिमेयता तथा निवेश पोर्टफोलियो में विविधीकरण का लाभ प्रदान करते हैं।
स्रोत: TH
भारतीय ई-वाणिज्य परिषद (ECCI)
पाठ्यक्रम: GS3 / अर्थव्यवस्था
समाचार में
- इंटरनेट एवं मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (IAMAI) ने बेंगलुरु में भारतीय ई-वाणिज्य परिषद (ECCI) का शुभारंभ किया।
भारतीय ई-वाणिज्य परिषद (ECCI) की आवश्यकता
- भारत का डिजिटल वाणिज्य बाजार 120 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक का अनुमानित है और तीव्र गति से विस्तार कर रहा है।
- यह केवल ऑनलाइन खुदरा व्यापार तक सीमित न रहकर त्वरित वाणिज्य, सीमा-पार व्यापार तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित खरीदारी जैसे नए क्षेत्रों तक विस्तृत हो रहा है।
- इसके साथ ही आँकड़ों की सुरक्षा, भुगतान प्रणाली तथा उपभोक्ता संरक्षण से संबंधित नियम भी तेजी से विकसित हो रहे हैं।
- IAMAI का मानना है कि इस क्षेत्र को सरकार के साथ एक संगठित एवं संस्थागत संवाद व्यवस्था की आवश्यकता है, ताकि नियम बनने के बाद प्रतिक्रिया देने के बजाय उनके निर्माण की प्रक्रिया में ही सार्थक भागीदारी सुनिश्चित की जा सके।
ECCI की प्रमुख भूमिकाएँ
- खंडित क्षेत्र को एकीकृत प्रतिनिधित्व प्रदान करना: वर्तमान में ई-वाणिज्य क्षेत्र का संबंध वाणिज्य मंत्रालय, इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, उपभोक्ता मामले विभाग, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) तथा उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्द्धन विभाग (DPIIT) जैसे अनेक संस्थानों से है।
- प्रत्येक कंपनी द्वारा अलग-अलग संवाद स्थापित करने के स्थान पर ECCI पूरे क्षेत्र का समन्वित प्रतिनिधित्व करेगा।
- आँकड़ों पर आधारित नीति संवाद: ECCI उद्योग और सरकार के बीच शोध एवं साक्ष्यों पर आधारित सेतु के रूप में कार्य करेगा, जिससे नीति निर्माण अधिक तथ्यपरक एवं प्रभावी बन सके।
- भारतीय विक्रेताओं को वैश्विक बाजार से जोड़ना: परिषद का प्रमुख उद्देश्य सीमा-पार ई-वाणिज्य को सरल बनाना तथा भारतीय ब्रांडों, निर्यातकों एवं सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) को वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं से जोड़कर अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुँच उपलब्ध कराना है।
- लघु उद्यमों का डिजिटलीकरण: ECCI ऐसे ढाँचे विकसित करेगा, जिनसे सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम डिजिटल परिवर्तन को अपनाकर राष्ट्रीय एवं वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में सीधे भाग ले सकें।
- ई-वाणिज्य में AI के लिए मानक विकसित करना: परिषद AI के उत्तरदायी उपयोग, त्वरित वाणिज्य की लॉजिस्टिक्स व्यवस्था तथा भुगतान अवसंरचना से संबंधित सर्वोत्तम कार्य-प्रणालियाँ विकसित करेगी।
इंटरनेट एवं मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (IAMAI)
- IAMAI भारत में डिजिटल सेवाओं एवं मोबाइल मूल्य-वर्धित सेवाओं का प्रतिनिधित्व करने वाला एक गैर-लाभकारी उद्योग संगठन है।
- इसकी स्थापना वर्ष 2004 में हुई थी।
- यह तकनीकी नवाचार आधारित नवोद्यमों तथा प्रमुख ई-वाणिज्य कंपनियों सहित सैकड़ों भारतीय एवं बहुराष्ट्रीय कंपनियों का प्रतिनिधित्व करता है।
- इसका उद्देश्य सार्वजनिक नीतियों को प्रभावित करना तथा भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था के विकास को प्रोत्साहित करना है।
स्रोत: TH
RBI द्वारा SNFA श्रेणी की शुरुआत
पाठ्यक्रम: GS3 / अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने वाणिज्यिक बैंक–तनावग्रस्त परिसंपत्तियों के समाधान संबंधी निर्देश, 2025 के अंतर्गत तृतीय संशोधन निर्देश, 2026 जारी किए हैं।
परिचय
- नए नियम यह निर्धारित करते हैं कि बैंक ऋण चूक करने वाले उधारकर्ताओं से प्राप्त गैर-वित्तीय परिसंपत्तियों का अधिग्रहण, मूल्यांकन, प्रबंधन एवं निपटान किस प्रकार करेंगे।
- RBI ने ऋण चूक की स्थिति में निर्दिष्ट गैर-वित्तीय परिसंपत्तियों (SNFAs) की अवधारणा प्रस्तुत की है।
- इन परिसंपत्तियों के निपटान के लिए मुख्यतः (SARFAESI) अधिनियम के सिद्धांतों के अनुरूप सार्वजनिक नीलामी को अनिवार्य किया गया है।
- साथ ही, इन परिसंपत्तियों को मूल उधारकर्ता अथवा उससे संबंधित पक्षों को पुनः बेचने पर प्रतिबंध लगाया गया है।
- इस व्यवस्था से वसूली प्रक्रिया में दुरुपयोग की संभावना कम होगी तथा पारदर्शिता बढ़ेगी।
SNFAs क्या हैं?
- SNFAs वे अचल परिसंपत्तियाँ हैं, जिन्हें बैंक ऋण की अदायगी न होने की स्थिति में अपने अधिकार में ले लेते हैं।
- इनमें आवासीय भवन, वाणिज्यिक संपत्तियाँ, औद्योगिक भूमि अथवा अन्य अचल संपत्तियाँ सम्मिलित हैं, जिन्हें बकाया ऋण के निपटान के रूप में स्वीकार किया जाता है।
- बैंक किसी परिसंपत्ति को SNFA तभी घोषित कर सकते हैं, जब संबंधित ऋण को आधिकारिक रूप से गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (NPA) घोषित किया जा चुका हो।
- परिसंपत्ति का अधिग्रहण बैंक के बकाया ऋण के पूर्ण अथवा आंशिक निपटान के रूप में होना चाहिए।
- संशोधन के अनुसार प्रत्येक वाणिज्यिक बैंक को SNFAs के अधिग्रहण एवं निपटान के लिए विस्तृत आंतरिक नीति तैयार करनी होगी।
- SNFAs को अब सकल NPA, शुद्ध NPA अथवा तनावग्रस्त परिसंपत्तियों का हिस्सा नहीं माना जाएगा।
- इन्हें बैंक की बैलेंस शीट में “दावों की संतुष्टि हेतु अर्जित गैर-बैंकिंग परिसंपत्तियाँ” शीर्षक के अंतर्गत पृथक रूप से प्रदर्शित किया जाएगा।
स्रोत: IE
वर्ष 2024 के लिए 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार
पाठ्यक्रम: विविध
संदर्भ
- वर्ष 2024 के दौरान केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) से प्रमाणित फिल्मों के लिए 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की घोषणा की गई।
परिचय
- राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित फिल्म सम्मान हैं, जिनकी घोषणा प्रतिवर्ष भारतीय सिनेमा की उत्कृष्ट प्रतिभाओं को सम्मानित करने के लिए की जाती है।
- इनका उद्देश्य कलात्मक, तकनीकी तथा सामाजिक दृष्टि से उत्कृष्ट फिल्मों के निर्माण को प्रोत्साहित करना है।
- ये पुरस्कार तीन श्रेणियों में प्रदान किए जाते हैं—
- फीचर फिल्में
- गैर-फीचर फिल्में
- सिनेमा पर सर्वश्रेष्ठ लेखन
इतिहास
- राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की शुरुआत वर्ष 1954 में ‘राज्य पुरस्कार’ के नाम से हुई थी।
- प्रारंभ में केवल विभिन्न भारतीय भाषाओं की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों को सम्मानित किया जाता था।
- वर्ष 1968 से कलाकारों एवं तकनीशियनों के लिए पृथक पुरस्कार प्रारंभ किए गए।
- नरगिस दत्त प्रथम सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री तथा उत्तम कुमार पहले सर्वश्रेष्ठ अभिनेता बने।
प्रमुख पुरस्कार विजेता
- सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म: आर्टिकल 370 (हिंदी)
- सर्वश्रेष्ठ गैर-फीचर फिल्म: भंगार (मराठी एवं अंग्रेज़ी)
- सर्वश्रेष्ठ वृत्तचित्र: राम-नामी (हिंदी)
- सर्वश्रेष्ठ अभिनेता: ममूटी (ब्रमायुगम) तथा कार्तिक आर्यन (चंदू चैंपियन)
- सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री: यामी गौतम (आर्टिकल 370)
स्रोत: PIB
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संक्षिप्त समाचार 20-07-2026