नदी घाटी प्रबंधन योजना

पाठ्यक्रम: GS2/ राजव्यवस्था

समाचारों में

  • भारत सरकार ने नदी घाटी प्रबंधन (RBM) योजना को 16वें वित्त आयोग की अवधि (2026–27 से 2030–31) तक जारी रखने की स्वीकृति प्रदान की है। इस योजना के लिए ₹2,183 करोड़ का वित्तीय प्रावधान किया गया है।

नदी घाटी प्रबंधन योजना क्या है?

  • नदी घाटी प्रबंधन योजना जल शक्ति मंत्रालय के अंतर्गत एक केंद्रीय क्षेत्रक पहल है। इसका उद्देश्य भारत की जल शासन प्रणाली को बिखरे हुए परियोजना-स्तरीय हस्तक्षेपों से हटाकर समग्र घाटी-स्तरीय दृष्टिकोण की ओर ले जाना है।
  • नदियों, सहायक नदियों, झीलों और भूजल को अलग-अलग इकाइयों के रूप में देखने के बजाय, यह योजना संपूर्ण नदी घाटी को एक परस्पर जुड़ी हुई जलवैज्ञानिक इकाई के रूप में मान्यता देती है।
    • नदी घाटी वह संपूर्ण भू-क्षेत्र है जिसे एक नदी और उसकी सभी सहायक नदियाँ जल निकासी करती हैं। इसे भारत की मौलिक जलवैज्ञानिक योजना इकाई माना जाता है। इसके प्रमुख घटक हैं:
      • जलागम क्षेत्र (Watershed): घाटियों को अलग करने वाली सीमा।
      • संगम (Confluence): जहाँ नदियाँ मिलती हैं।
      • मुख (Mouth): जहाँ नदी समुद्र या महासागर में गिरती है।

संस्थागत संरचना

  • यह योजना तीन विशिष्ट संस्थाओं के माध्यम से संचालित होती है, जिनके कार्यक्षेत्र अलग-अलग हैं:
    • ब्रह्मपुत्र बोर्ड: विशेष रूप से पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए — ब्रह्मपुत्र और बराक नदी प्रणालियों हेतु नदी घाटी योजना, बाढ़ नियंत्रण, कटाव प्रबंधन एवं जल निकासी विकास।
    • केंद्रीय जल आयोग (CWC): जलवैज्ञानिक सर्वेक्षण करता है और जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख जैसे दुर्गम क्षेत्रों में बहुउद्देशीय जल संसाधन परियोजनाओं के विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन (DPR) तैयार करता है।
    • राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण (NWDA): राष्ट्रीय स्तर पर नदियों के परस्पर जोड़ने (ILR) कार्यक्रम का नेतृत्व करता है — अंतर-घाटी जल अंतरण परियोजनाओं के लिए व्यवहार्यता प्रतिवेदन और DPR तैयार करता है।

इस योजना का महत्व

  • सीमा-पार जल कूटनीति: सिंधु (पाकिस्तान के साथ साझा) और ब्रह्मपुत्र (चीन व बांग्लादेश के साथ साझा) विश्व की सबसे संवेदनशील नदियों में हैं। घाटी-स्तरीय वास्तविक समय डेटा भारत को डेटा संप्रभुता एवं अंतर्राष्ट्रीय जल संधियों में वार्ता की शक्ति प्रदान करता है।
  • जलवायु लचीलापन: अनियमित मानसून, हिमनदी झील विस्फोट बाढ़ (GLOFs) और लंबे सूखे बढ़ रहे हैं। परियोजना-स्तरीय प्रतिक्रियाओं के बजाय घाटी-स्तरीय ढाँचा ही प्रणालीगत जलवायु लचीलापन बनाने में सक्षम है।
  • अंतर-राज्यीय जल समानता: भारत के 81% भौगोलिक क्षेत्र अंतर-राज्यीय घाटियों में आता है। समन्वित घाटी-स्तरीय शासन एकतरफा ऊपरी धारा की कार्रवाइयों को रोकने और निम्न धारा में समान जल पहुँच सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।
  • जलविद्युत और सिंचाई क्षमता का उपयोग: हिमालयी नदी परियोजनाओं के DPR तैयार करने से पूर्वोत्तर और जम्मू-कश्मीर क्षेत्रों में अप्रयुक्त जलविद्युत क्षमता एवं सिंचाई संभावनाएँ खुलती हैं, जहाँ ऊर्जा तथा जल की कमी आर्थिक विकास को सीधे प्रभावित करती है।

चुनौतियाँ

  • भू-आकृति और लॉजिस्टिक्स: जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और पूर्वोत्तर में परियोजनाओं की कार्य अवधि सामान्यतः केवल चार से छह माह होती है। खराब संपर्क व्यवस्था लागत बढ़ाती है तथा समयसीमा को प्रभावित करती है।
  • अंतर-राज्यीय विवाद: बाध्यकारी राष्ट्रीय जल आवंटन ढाँचे के अभाव में नदी जल बँटवारा लगातार कानूनी और राजनीतिक विवाद उत्पन्न करता है, जिससे ILR एवं DPR अनुमोदन जटिल हो जाते हैं।
  • वास्तविक समय डेटा की कमी: ऐतिहासिक रूप से कमजोर प्रवाह निगरानी नेटवर्क के कारण जलवैज्ञानिक पूर्वानुमान प्रायः गलत रहे हैं। इस डेटा अंतराल को दूर करना योजना की सफलता के लिए आधारभूत है।
  • पारिस्थितिक संतुलन: बाँध और बैराज जैसी बड़ी संरचनाएँ तलछट प्रवाह को बदलती हैं, जलीय जैव विविधता को बाधित करती हैं एवं निचली धारा की समुदायों को प्रभावित करती हैं। वर्तमान परियोजना मूल्यांकन ढाँचे इन संचयी पारिस्थितिक लागतों को पर्याप्त रूप से नहीं पकड़ते।
  • लागत वृद्धि: ब्रह्मपुत्र जैसी गतिशील नदियों में तट-क्षरण रोधी कार्य प्रायः प्रारंभिक बजट अनुमान से अधिक हो जाते हैं।

आगे की राह

  • सभी प्राथमिक घाटियों में LiDAR और ड्रोन सर्वेक्षण का विस्तार कर उच्च-रिज़ॉल्यूशन डिजिटल ऊँचाई मॉडल तैयार करना।
  • NEHARI (पूर्वोत्तर हाइड्रोलिक एवं संबद्ध अनुसंधान संस्थान) को सुदृढ़ कर पूर्वोत्तर राज्यों में तकनीकी क्षमता का निर्माण करना।
  • DPR मूल्यांकन प्रोटोकॉल में अनिवार्य पर्यावरणीय प्रवाह आकलन को संस्थागत रूप देना ताकि अवसंरचना विकास और पारिस्थितिक संरक्षण में संतुलन स्थापित हो।
  • लंबे समय से अनुशंसित राष्ट्रीय जल ढाँचा कानून को लागू करना, जिससे अंतर-राज्यीय जल आवंटन विवाद सुलझ सकें और ILR कार्यान्वयन के लिए स्थिर कानूनी आधार मिल सके।

स्रोत: PIB

 

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