भारत की नई निर्वासन नीति

पाठ्यक्रम: GS2/शासन 

समाचारों में

  • हाल ही में गृह मंत्रालय द्वारा नई निर्वासन नीति जारी की गई।

निर्वासन(Deportation) क्या है?

  • निर्वासन एक औपचारिक कानूनी प्रक्रिया है जिसमें भारत में अवैध रूप से ठहरने के संदेह वाले विदेशियों को हिरासत में लिया जाता है, न्यायालय में मुकदमा चलाया जाता है, और सभी कानूनी प्रक्रियाएँ पूर्ण होने तथा उनके गृह देश से पहचान की पुष्टि होने के बाद ही उन्हें निर्वासित किया जाता है।
    • पुशबैक अनौपचारिक और कानूनी रूप से परिभाषित न की गई कार्रवाइयाँ होती हैं, जो सीमाओं पर की जाती हैं, जहाँ सुरक्षा बल परिस्थितियों या विवेक के आधार पर किसी विदेशी को तुरंत वापस भेज सकते हैं।
  • नागरिकता अधिनियम, 1955 के अंतर्गत “अवैध प्रवासी” को उस विदेशी के रूप में परिभाषित किया गया है जिसने या तो बिना वैध यात्रा दस्तावेज़ों के भारत में प्रवेश किया हो, अथवा वैध रूप से प्रवेश करने के बाद भी निर्धारित अवधि से अधिक समय तक ठहराव किया हो।
  • चूँकि नागरिकता संबंधी विषय संघ सूची में आते हैं, इसलिए गृह मंत्रालय निर्वासन की देखरेख करता है और राज्य प्राधिकरणों को ज़िम्मेदारियाँ सौंपता है।

नई नीति की प्रमुख विशेषताएँ

  • 30-दिन सत्यापन समयसीमा: राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को संदेहास्पद अवैध प्रवासियों (विशेषकर बांग्लादेश और म्यांमार से) की पहचान 30 दिनों के अंदर सत्यापित करनी होगी; इस अवधि में सत्यापन न होने पर स्वतः निर्वासन की कार्यवाही प्रारंभ होगी।
  • जिला-स्तरीय विशेष कार्यबल (STFs): सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन को प्रत्येक जिले में पुलिस पर्यवेक्षण के अंतर्गत विशेष कार्यबल गठित करना होगा, जो अवैध प्रवासियों का पता लगाए, पहचान करे तथा निर्वासन की प्रक्रिया पूरी करे। प्रत्येक जिले में पर्याप्त निरोध केंद्र भी स्थापित किए जाएँगे।
  • बायोमेट्रिक एवं जनसांख्यिकीय डेटा: पहचान होने पर राज्य सरकार को तुरंत व्यक्ति का बायोमेट्रिक और जनसांख्यिकीय विवरण एकत्र कर विदेशी पहचान पोर्टल पर अपलोड करना होगा।
  • मासिक रिपोर्टिंग: सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों को उन व्यक्तियों का अभिलेख रखना होगा जिन्हें सीमा सुरक्षा बल और तटरक्षक को सौंपा गया है, तथा प्रत्येक माह की 15 तारीख को केंद्र को रिपोर्ट साझा करनी होगी।
  • डेटा साझाकरण: प्रवासन ब्यूरो को सार्वजनिक पोर्टल पर निर्वासित व्यक्तियों की सूची प्रकाशित करने का निर्देश दिया गया है; यह डेटा UIDAI, निर्वाचन आयोग और विदेश मंत्रालय के साथ भी साझा किया जाएगा ताकि भविष्य में निर्वासित व्यक्तियों को आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र या पासपोर्ट जारी न किया जा सके।

अवैध प्रवासियों से उत्पन्न चुनौतियाँ

  • राष्ट्रीय सुरक्षा खतरा: विशेषकर रोहिंग्या प्रवासियों को सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल हलफनामों में उग्रवादी नेटवर्क से जुड़े होने का उल्लेख किया गया है।
  • जनसांख्यिकीय दबाव: बड़े पैमाने पर बिना दस्तावेज़ों के प्रवास, विशेषकर असम, पश्चिम बंगाल एवं झारखंड जैसे सीमावर्ती राज्यों में, स्थानीय जनसंख्या संरचना को बदल देता है और आदिवासी व मूल निवासी समुदायों के साथ सामाजिक-राजनीतिक तनाव उत्पन्न करता है।
  • सार्वजनिक संसाधनों पर दबाव: अवैध प्रवासी सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS), स्वास्थ्य सेवाओं और आवास जैसी सब्सिडी वाली सुविधाओं का लाभ उठाते हैं, जिससे भारतीय नागरिकों के लिए निर्धारित कल्याणकारी तंत्र पर अतिरिक्त भार पड़ता है।
  • निर्वाचन अखंडता संबंधी चिंताएँ: गैर-नागरिकों द्वारा मतदाता पहचान पत्र रखने से निर्वाचन सूची की पवित्रता पर गंभीर प्रश्न उठते हैं, विशेषकर भारत-बांग्लादेश सीमा क्षेत्र के निर्वाचन क्षेत्रों में।
  • कानून एवं व्यवस्था: कई प्रमुख अपराध मामलों और दंगों में अवैध प्रवासियों की संलिप्तता रही है, जिससे अपराध एवं आंतरिक सुरक्षा को लेकर जनचिंता बढ़ी है।
  • शहरी अवसंरचना पर दबाव: महानगरों में अवैध प्रवासियों की अधिकता झुग्गी-झोपड़ियों की वृद्धि, स्वच्छता संकट और शहरी प्रशासनिक चुनौतियों को बढ़ाती है।

निर्वासन में चुनौतियाँ

  • राज्यविहीनता का जोखिम: निर्वासित व्यक्तियों, विशेषकर रोहिंग्या, को राज्यविहीन होने का खतरा है क्योंकि म्यांमार उन्हें नागरिक नहीं मानता।
  • गलत हिरासत: कार्यकर्ताओं और अधिकार समूहों ने मनमानी हिरासत, नागरिकता दस्तावेज़ों के अपर्याप्त सत्यापन एवं हिरासत में दुर्व्यवहार को लेकर चिंता जताई है।
  • गैर-प्रत्यावर्तन (Non-Refoulement) अंतराल: भारत 1951 शरणार्थी सम्मेलन का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है, फिर भी अंतर्राष्ट्रीय प्रथागत कानून व्यक्तियों को ऐसे स्थानों पर लौटाने से रोकता है जहाँ उन्हें उत्पीड़न का सामना करना पड़ सकता है।

आगे की राह

  • घरेलू शरणार्थी कानून बनाना: वास्तविक शरणार्थियों और अवैध आर्थिक प्रवासियों में अंतर करना; 1951 सम्मेलन को औपचारिक रूप से अंगीकार किए बिना अंतर्राष्ट्रीय मानवीय मानकों के अनुरूप नीति बनाना।
  • द्विपक्षीय प्रत्यावर्तन समझौते: बांग्लादेश और म्यांमार के साथ संरचित, समयबद्ध प्रत्यावर्तन ढाँचे पर बातचीत करना ताकि कानूनी रूप से अनुपालन एवं गरिमापूर्ण वापसी सुनिश्चित हो सके।
  • विदेशी न्यायाधिकरणों में सुधार: प्रशिक्षित निर्णायकों, पारदर्शी प्रक्रियाओं और समयबद्ध निर्णयों के साथ कार्यप्रणाली का मानकीकरण करना — जिससे गलत वर्गीकरण का जोखिम कम हो।
  • प्रौद्योगिकी के साथ विधिसम्मत प्रक्रिया: बायोमेट्रिक डेटाबेस और विदेशी पहचान पोर्टल का उपयोग कर पहचान की सटीकता बढ़ाना, साथ ही अनुच्छेद 21 के अंतर्गत न्यूनतम प्रक्रिया संबंधी सुरक्षा सुनिश्चित करना।

Source: TH

 

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