भारत के विनिर्माण केंद्रों में औद्योगिक अशांति

पाठ्यक्रम: GS3/ अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • नोएडा में हाल ही में हुए हिंसक प्रदर्शनों ने भारत के औद्योगिक क्षेत्रों—मानेसर, सूरत, पानीपत और बरौनी—में बढ़ती श्रमिक अशांति की लहर को उजागर किया है।

प्रदर्शनों का स्वरूप और प्रसार

  • इन प्रदर्शनों में वस्त्र, ऑटोमोबाइल, रिफाइनरी और इलेक्ट्रॉनिक्स सहित अनेक औद्योगिक क्षेत्रों के श्रमिकों का बड़े पैमाने पर जुटान हुआ।
  • प्रारंभ में शांतिपूर्ण प्रदर्शन के रूप में शुरू हुए ये आंदोलन धीरे-धीरे हिंसक घटनाओं में बदल गए, जिनमें आगजनी, तोड़फोड़ और कानून प्रवर्तन अधिकारियों के साथ संघर्ष शामिल थीं।

श्रमिक अशांति के मूल कारण

  • वेतन स्थिरता: श्रमिकों ने श्रम सुधारों के बाद वेतन वृद्धि की अपेक्षा की थी, किंतु अपेक्षित लाभ बुनियादी स्तर पर नहीं मिले, जिससे असंतोष बढ़ा।
  • अनौपचारिकता और संविदात्मक रोजगार: औद्योगिक श्रमिकों का बड़ा हिस्सा संविदा पर कार्यरत है, जिससे रोजगार की सुरक्षा का अभाव, स्थायी श्रमिकों की तुलना में कम वेतन और सामाजिक सुरक्षा तक सीमित पहुँच होती है। इससे श्रम बाज़ार में द्विस्तरीय संरचना बनी है और असमानता बढ़ी है।
  • प्रभाव का प्रसार: एक औद्योगिक केंद्र में हुए प्रदर्शन ने अन्य केंद्रों को प्रभावित किया। विशेषकर मानेसर और नोएडा के बीच यह नेटवर्क आधारित श्रमिक चेतना को दर्शाता है।
  • जीवनयापन लागत में वृद्धि: वैश्विक व्यवधानों, विशेषकर होरमुज़ जलडमरूमध्य के आसपास, ने ईंधन और एलपीजी की कीमतें बढ़ा दीं, जिससे आवश्यक वस्तुओं की लागत बढ़ी एवं प्रवासी श्रमिकों पर असमान रूप से प्रभाव पड़ा।
  • न्यूनतम वेतन संशोधन में असमानता: राज्यों में वेतन संशोधन अनियमित और असमान रहे हैं। उदाहरण: हरियाणा ने लगभग एक दशक बाद वेतन संशोधित किया। इससे पड़ोसी क्षेत्रों के श्रमिकों में तुलनात्मक असंतोष उत्पन्न हुआ।

अशांति के निहितार्थ

  • आर्थिक निहितार्थ: अशांति ने औद्योगिक उत्पादन को बाधित किया और प्रमुख विनिर्माण क्षेत्रों की आपूर्ति श्रृंखलाओं को प्रभावित किया। यह अस्थिरता निवेशकों के विश्वास और भारत की विश्वसनीय विनिर्माण गंतव्य की स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।
  • सामाजिक निहितार्थ: अशांति प्रवासी और अनौपचारिक श्रमिकों में बढ़ती आर्थिक असुरक्षा को दर्शाती है। इससे विपरीत प्रवासन और शहरी क्षेत्रों में कमजोर वर्गों के बीच संकट बढ़ सकता है।
  • शासन संबंधी निहितार्थ: प्रदर्शन श्रम कानूनों के क्रियान्वयन और विवाद समाधान तंत्र की प्रभावशीलता में कमियों को उजागर करते हैं।

श्रमिक कल्याण हेतु सरकारी उपाय

  • राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन मानक: सरकार ने राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन लागू किया है, जो राज्यों को न्यूनतम वेतन तय करने के लिए मानक प्रदान करता है और अत्यधिक वेतन असमानताओं को कम करता है।
  • अटल बीमित व्यक्ति कल्याण योजना: बीमित श्रमिकों को बेरोजगारी की स्थिति में राहत और वित्तीय सहायता प्रदान करती है।
  • ई-श्रम पोर्टल: असंगठित श्रमिकों का राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करने हेतु शुरू किया गया, जिससे कल्याणकारी योजनाओं का लक्षित वितरण संभव हो सके।
  • भारत के श्रम संहिताएँ: भारत ने 29 श्रम कानूनों को चार व्यापक श्रम संहिताओं में समेकित किया है ताकि विनियमनों को सरल बनाया जा सके और श्रम बाज़ार की दक्षता बढ़ाई जा सके।
    • वेतन संहिता, 2019: राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन की शुरुआत कर वेतन विनियमन को मानकीकृत करने का प्रयास।
    • औद्योगिक संबंध संहिता, 2020: ट्रेड यूनियनों, औद्योगिक विवादों, छँटनी और सेवा समाप्ति को विनियमित करती है।
    • व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य परिस्थितियाँ संहिता, 2020: कार्यस्थल सुरक्षा और स्वास्थ्य मानकों को एकीकृत करती है।
    • सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020: संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों के श्रमिकों, जिसमें गिग वर्कर भी शामिल हैं, को सामाजिक सुरक्षा कवरेज प्रदान करती है।

आगे की राह

  • सरकार, नियोक्ताओं और श्रमिकों के बीच त्रिपक्षीय संवाद तंत्र को सुदृढ़ किया जाना चाहिए ताकि संघर्षों को रोका जा सके।
  • सरकार को समयबद्ध और मुद्रास्फीति-सूचकांकित न्यूनतम वेतन संशोधन तंत्र स्थापित करना चाहिए ताकि श्रमिकों की वास्तविक आय जीवनयापन लागत के विरुद्ध सुरक्षित रहे।
  • वेतन संहिता और सामाजिक सुरक्षा संहिता जैसे श्रम सुधारों का प्रभावी क्रियान्वयन प्राथमिकता होना चाहिए ताकि श्रमिकों को वास्तविक लाभ मिल सके।
  • सामाजिक सुरक्षा योजनाओं जैसे भविष्य निधि और स्वास्थ्य बीमा का कवरेज संविदात्मक और प्रवासी श्रमिकों तक विस्तारित किया जाना चाहिए।

Source: IE

 

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