पाठ्यक्रम: GS3/भारतीय अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- रॉयल स्वीडिश विज्ञान अकादमी ने वर्ष 2026 के लिए अल्फ्रेड नोबेल की स्मृति में आर्थिक विज्ञान के क्षेत्र में स्वेरिगेस रिक्सबैंक पुरस्कार प्रदान किया है।
अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार एवं इसके प्राप्तकर्ता
- अल्फ्रेड नोबेल की स्मृति में आर्थिक विज्ञान के क्षेत्र में स्वेरिगेस रिक्सबैंक पुरस्कार, अर्थशास्त्र के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान को मान्यता प्रदान करता है।
- इस पुरस्कार के अंतर्गत 1.2 करोड़ स्वीडिश क्रोना की राशि प्रदान की जाती है, जिसे रॉबर्ट ई. हॉल और माइकल वुडफोर्ड के बीच समान रूप से विभाजित किया जाता है।
- यह पुरस्कार समष्टि आर्थिक स्थिरीकरण के सूक्ष्म आर्थिक आधारों पर उनके कार्य को मान्यता प्रदान करता है।
पुरस्कार विजेताओं के प्रमुख योगदान
- रॉबर्ट ई. हॉल: घरेलू उपभोग को समझना:
- उन्होंने स्पष्ट किया कि परिवारों का उपभोग मुख्यतः उनकी वर्तमान प्रयोज्य आय पर निर्भर करता है।
- उनके शोध ने विभिन्न परिवारों के बीच उपभोग संबंधी अंतर को रेखांकित किया। विशेष रूप से, ऐसे परिवार जो अपनी वर्तमान आय के आधार पर ही दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं, उनका उपभोग वर्तमान आय से सीमित रहता है।
- माइकल वुडफोर्ड: कंपनियों के व्यवहार एवं मूल्य निर्धारण को समझना:
- उन्होंने कंपनियों के मूल्य निर्धारण संबंधी निर्णयों तथा समग्र मुद्रास्फीति में भविष्य की अपेक्षाओं के महत्त्व को स्थापित किया।
- उन्होंने मूल्य निर्धारण संबंधी व्यवहार को उपभोग एवं माँग के सिद्धांतों के साथ समन्वित किया।
- उन्होंने रेखांकित किया कि पारदर्शी एवं विश्वसनीय मौद्रिक नीति, जनसामान्य की अपेक्षाओं को प्रभावित करके आर्थिक परिणामों को दिशा प्रदान करती है।
समष्टि आर्थिक स्थिरीकरण क्या है?
- समष्टि आर्थिक स्थिरीकरण से आशय सरकारों एवं केंद्रीय बैंकों द्वारा आर्थिक विकास, उत्पादन, मुद्रास्फीति और बेरोजगारी में होने वाले उतार-चढ़ाव को कम करने के लिए अपनाए जाने वाले राजकोषीय एवं मौद्रिक उपायों से है।
- आर्थिक मंदी के दौरान: ब्याज दरों में कमी, करों में राहत तथा सार्वजनिक व्यय में वृद्धि के माध्यम से माँग को प्रोत्साहित किया जा सकता है।
- अर्थव्यवस्था में अत्यधिक तीव्रता के दौरान: ब्याज दरों में वृद्धि तथा कठोर राजकोषीय नीतियों के माध्यम से मुद्रास्फीति को नियंत्रित किया जा सकता है।
स्थिरीकरण सिद्धांत का विकास
- केन्सवादी दृष्टिकोण: महामंदी के बाद जॉन मेनार्ड केन्स ने माँग, उत्पादन एवं रोजगार को पुनर्जीवित करने के लिए सरकारी हस्तक्षेप का समर्थन किया।
- नए दृष्टिकोण की आवश्यकता: 1970 के दशक में मुद्रास्फीतिजनित मंदी की स्थिति उत्पन्न हुई, जिसमें उच्च मुद्रास्फीति के साथ उच्च बेरोजगारी भी विद्यमान थी। तेल की कीमतों में अचानक वृद्धि ने पारंपरिक नीतिगत उपायों की सीमाओं को उजागर किया।
- हॉल एवं वुडफोर्ड का योगदान: उन्होंने परिवारों के वास्तविक व्यवहार, कंपनियों के मूल्य निर्धारण संबंधी निर्णयों तथा भविष्य की अपेक्षाओं को समष्टि आर्थिक विश्लेषण में सम्मिलित करके स्थिरीकरण सिद्धांत को अधिक सुदृढ़ बनाया।
आर्थिक नीति के लिए महत्त्व
- साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण: समष्टि आर्थिक परिणामों को व्यक्तियों के आर्थिक निर्णयों से जोड़ता है।
- अपेक्षाओं का प्रबंधन: स्पष्ट करता है कि विश्वसनीय नीतिगत घोषणाएँ वर्तमान उपभोग, निवेश एवं कीमतों को किस प्रकार प्रभावित करती हैं।
- नीतिगत प्रभावों का बेहतर संप्रेषण: नीति निर्माताओं को ब्याज दरों में परिवर्तन तथा राजकोषीय हस्तक्षेपों के संभावित प्रभावों का पूर्वानुमान लगाने में सहायता मिलती है।
- नीतिगत पारदर्शिता में वृद्धि: स्थिरीकरण संबंधी उपायों की प्रभावशीलता बढ़ाने तथा जनता का विश्वास सुदृढ़ करने में सहायक है।
भारत के लिए प्रासंगिकता
- मुद्रास्फीति का प्रबंधन: भारतीय रिज़र्व बैंक को मौद्रिक नीति निर्धारित करते समय आपूर्ति संबंधी आघातों, परिवारों की मुद्रास्फीति संबंधी अपेक्षाओं तथा कंपनियों के मूल्य निर्धारण संबंधी व्यवहार पर विचार करना चाहिए।
- माँग का पुनरुद्धार: आर्थिक मंदी के दौरान करों में कटौती तथा लक्षित सार्वजनिक व्यय के माध्यम से उपभोग एवं निवेश को प्रोत्साहन दिया जा सकता है।
- नीतिगत संचार: भारतीय रिज़र्व बैंक के स्पष्ट नीतिगत मार्गदर्शन से ऋण लेने, व्यय करने तथा निवेश संबंधी निर्णय प्रभावित हो सकते हैं।
- समावेशी नीति निर्माण: परिवार-स्तरीय आँकड़े कमजोर एवं संपन्न परिवारों के उपभोग संबंधी व्यवहार में अंतर को समझने में सहायता कर सकते हैं।
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