भारत को बुजुर्गों की देखभाल के लिए प्रशिक्षित कार्यबल की आवश्यकता 

पाठ्यक्रम: GS2/शासन; GS3/अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • वर्ष 2050 तक भारत में 60 वर्ष और उससे अधिक आयु की जनसंख्या बढ़कर 34.7 करोड़ होने का अनुमान है। यह एक सुदृढ़ देखभाल व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

परिचय

  • नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2022 में भारत में 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों की अनुमानित संख्या लगभग 14.9 करोड़ थी, जिसके वर्ष 2050 तक बढ़कर 34.7 करोड़ होने का अनुमान है। यह कुल जनसंख्या का लगभग 20.8% होगा।
  • यदि भारत अभी से उचित योजना नहीं बनाता है, तो वृद्धजन देखभाल व्यवस्था एक गंभीर चुनौतीपूर्ण स्थिति में पहुँच सकती है।

भारत की वृद्ध होती जनसंख्या से संबंधित आँकड़े

  • राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग द्वारा गठित जनसंख्या पूर्वानुमान संबंधी तकनीकी समूह की रिपोर्ट के अनुसार, 60 वर्ष और उससे अधिक आयु की जनसंख्या वर्ष 2011 के लगभग 10 करोड़ से बढ़कर वर्ष 2036 तक 23 करोड़ होने का अनुमान है।
    • कुल जनसंख्या में इस आयु वर्ग की हिस्सेदारी 8.4% से बढ़कर 14.9% होने का अनुमान है।
  • केरल में वृद्धजन जनसंख्या वर्ष 2011 के 13% से बढ़कर वर्ष 2036 तक 23% होने की संभावना है। इससे केरल सर्वाधिक वृद्ध जनसंख्या वाला राज्य बन सकता है।
  • इसके विपरीत, अनेक उत्तरी और पूर्वी राज्यों में वर्तमान में वृद्धजनों की संख्या अपेक्षाकृत कम है, लेकिन उनकी संख्या तीव्रता से बढ़ रही है।

वृद्धजनों के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ

  • स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियाँ: मनोभ्रंश और अल्जाइमर जैसे मानसिक स्वास्थ्य संबंधी रोगों से जुड़ा सामाजिक कलंक।
    • दिव्यांगता के मामलों में वृद्धि।
    • वृद्धावस्था संबंधी स्वास्थ्य सेवाओं के लिए पर्याप्त आधारभूत सुविधाओं का अभाव।
    • चिकित्सा सेवाओं तक पहुँच में शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों के बीच असमानता।
  • आर्थिक चुनौतियाँ: सामाजिक सुरक्षा की अपर्याप्त व्यवस्था।
    • जीवनयापन एवं चिकित्सा व्यय में वृद्धि।
    • सीमित वित्तीय संसाधन।
  • सामाजिक चुनौतियाँ: पारिवारिक सहायता व्यवस्था का कमजोर होना।
    • सामाजिक अलगाव एवं उपेक्षा।
    • साथ और भावनात्मक सहयोग का अभाव।
  • डिजिटल विभाजन: प्रौद्योगिकी अपनाने में कठिनाइयाँ।
    • प्रशिक्षण तथा सुगम उपकरणों की उपलब्धता का अभाव।
  • आधारभूत संरचना संबंधी चुनौतियाँ: वृद्धजनों की आवश्यकताओं के अनुरूप सुविधाओं एवं जागरूकता का अभाव।
    • आपातकालीन सहायता व्यवस्था में वृद्धजनों को संवेदनशील वर्ग के रूप में पर्याप्त प्राथमिकता न मिलना।
    • भारत में सार्वजनिक स्थान और परिवहन व्यवस्था अत्यंत सीमा तक वृद्धजन-अनुकूल नहीं हैं, क्योंकि अनेक स्थानों पर ढलानयुक्त मार्ग, सहारा देने वाली रेलिंग और सुगम शौचालय उपलब्ध नहीं हैं।

देखभाल कार्य क्या है?

  • देखभाल कार्य मुख्यतः दो परस्पर संबंधित गतिविधियों से मिलकर बनता है:
    • प्रत्यक्ष देखभाल कार्य: इसमें व्यक्तिगत एवं पारस्परिक संबंधों पर आधारित गतिविधियाँ शामिल हैं, जैसे शिशु को भोजन कराना।
    • अप्रत्यक्ष देखभाल कार्य: इसमें भोजन पकाना, सफाई करना और घरेलू व्यवस्था बनाए रखना जैसी गतिविधियाँ शामिल हैं।
  • अवैतनिक देखभाल एवं घरेलू कार्य: बीमार जीवनसाथी की देखभाल करना या परिवार के किसी सदस्य के लिए भोजन पकाना जैसे कार्य, जिनके बदले कोई मौद्रिक पारिश्रमिक नहीं मिलता।
  • वैतनिक देखभाल कार्य: घरेलू कामगारों द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं जैसे कार्य, जिनके बदले देखभाल कर्मियों को किसी न किसी रूप में पारिश्रमिक मिलता है।
  • भविष्य के अनुमान: अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के साक्ष्यों के अनुसार, देखभाल सेवाओं के क्षेत्र में निवेश बढ़ाने से वर्ष 2030 तक वैश्विक स्तर पर 47.5 करोड़ रोजगार सृजित होने की संभावना है।
    • भारत में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 2% के बराबर प्रत्यक्ष सार्वजनिक निवेश से लगभग 1.1 करोड़ रोजगार उत्पन्न हो सकते हैं, जिनमें से लगभग 70% रोजगार महिलाओं को मिलने की संभावना है।

औपचारिक वृद्धजन देखभाल व्यवस्था का महत्त्व

  • वृद्ध होती जनसंख्या की आवश्यकताओं की पूर्ति: भारत में 60 वर्ष और उससे अधिक आयु की जनसंख्या में अनुमानित वृद्धि के कारण वृद्धजन देखभाल की माँग बढ़ेगी। इसके लिए व्यवस्थित एवं सुदृढ़ देखभाल व्यवस्था आवश्यक है।
  • अवैतनिक देखभाल कार्य को मान्यता: औपचारिक प्रशिक्षण के माध्यम से परिवार के ऐसे सदस्य, जो अनौपचारिक रूप से देखभाल करते हैं, मान्यता प्राप्त एवं कुशल देखभाल पेशेवरों के रूप में विकसित हो सकते हैं।
  • रोजगार सृजन: एक सुव्यवस्थित देखभाल अर्थव्यवस्था विशेष रूप से महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर उत्पन्न कर सकती है और स्वास्थ्य सेवाओं की सहायक व्यवस्था को सुदृढ़ कर सकती है।
  • देखभाल की गुणवत्ता में सुधार: आपातकालीन सहायता, औषधि प्रबंधन, वृद्धजन देखभाल और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी प्रशिक्षण से वृद्धजनों तथा दिव्यांग व्यक्तियों के स्वास्थ्य एवं जीवन की गुणवत्ता में सुधार हो सकता है।

देखभाल अर्थव्यवस्था के विकास में प्रमुख चुनौतियाँ

  • लैंगिक असमानता: महिलाएँ पुरुषों की तुलना में अवैतनिक घरेलू कार्यों और देखभाल संबंधी गतिविधियों पर अधिक समय व्यतीत करती हैं। इससे उनके रोजगार के अवसर एवं आर्थिक स्वतंत्रता सीमित होते हैं।
  • प्रशिक्षित देखभाल कर्मियों की कमी: राष्ट्रीय कौशल योग्यता ढाँचे के अंतर्गत 1.5 लाख देखभाल कर्मियों को प्रशिक्षित करने की प्रस्तावित योजना, वर्तमान एवं भविष्य की देखभाल संबंधी आवश्यकताओं की तुलना में सीमित है।
  • प्रशिक्षण का सीमित विस्तार: केरल की के-4 केयर योजना और आशा कार्यकर्ताओं के लिए वृद्धजन देखभाल प्रशिक्षण जैसी पहलों का अभी तक व्यापक स्तर पर विस्तार नहीं हो पाया है।
  • मानकीकरण का अभाव: प्रमाणन, गुणवत्ता सुनिश्चित करने और पेशेवर मान्यता प्रदान करने के लिए पर्याप्त रूप से विकसित राष्ट्रीय ढाँचे का अभाव इस क्षेत्र के विस्तार को सीमित करता है।
  • जटिल देखभाल संबंधी आवश्यकताएँ: अल्जाइमर और पार्किंसन जैसे रोगों में संज्ञानात्मक क्षमताओं में गिरावट, व्यवहार प्रबंधन तथा भावनात्मक सहयोग से संबंधित विशेष ज्ञान की आवश्यकता होती है।

सरकारी पहलें

  • केंद्रीय बजट 2026–27: राष्ट्रीय कौशल योग्यता ढाँचे (NSQF) के अंतर्गत 1.5 लाख देखभाल कर्मियों को प्रशिक्षित करने का प्रावधान किया गया है।
  • कुडुंबश्री की के-4 केयर योजना: यह केरल आधारित कार्यक्रम है।
    • इसके अंतर्गत स्वयं सहायता समूहों के सदस्यों को वृद्धजन देखभाल, रोगी देखभाल तथा दिव्यांगजन देखभाल के लिए प्रमाणित कार्यकारी कर्मियों के रूप में प्रशिक्षित किया जाता है।
  • आशा कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण: राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणाली संसाधन केंद्र ने आशा कार्यकर्ताओं के लिए वृद्धजन देखभाल संबंधी प्रशिक्षण पुस्तिका विकसित की है।
    • प्रशिक्षण आयुष्मान भारत स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों के माध्यम से प्रदान किया जाता है।
  • वरिष्ठ नागरिकों के लिए एकीकृत कार्यक्रम (IPSrC): इस कार्यक्रम के अंतर्गत पंजीकृत समितियों के माध्यम से विभिन्न कार्यान्वयन एजेंसियों, जिनमें राज्य सरकारें और केंद्रशासित प्रदेशों के प्रशासन शामिल हैं, को अनुदान-सहायता प्रदान की जाती है।
  • वरिष्ठ नागरिकों के लिए राज्य कार्ययोजना (SAPSrC): प्रत्येक राज्य एवं केंद्रशासित प्रदेश से स्थानीय परिस्थितियों और आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण के लिए अपनी राज्य कार्ययोजना तैयार करने की अपेक्षा की जाती है।
    • इस योजना का क्रियान्वयन वित्त वर्ष 2019–20 से किया जा रहा है।
  • राष्ट्रीय वयोश्री योजना (RVY): इस योजना का उद्देश्य गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले तथा ऐसे परिवारों के वरिष्ठ नागरिकों को शारीरिक सहायक उपकरण और सहायक जीवन-यापन उपकरण उपलब्ध कराना है, जिनकी मासिक पारिवारिक आय 15,000 रुपये से अधिक नहीं है।
  • एल्डरलाइन: वरिष्ठ नागरिकों के लिए राष्ट्रीय हेल्पलाइन संख्या 14567 है।
    • इसका उद्देश्य वरिष्ठ नागरिकों से संबंधित अधिनियमों, योजनाओं और केंद्र तथा राज्य सरकारों के कार्यक्रमों के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना है।
    • यह देशभर में वरिष्ठ नागरिकों की शिकायतों के निवारण के लिए एक मंच भी प्रदान करती है।

आगे की राह

  • अनौपचारिक देखभालकर्ताओं को मान्यता एवं कौशल प्रशिक्षण: वर्तमान में परिवार के सदस्यों की देखभाल करने वाले व्यक्तियों के लिए सुलभ प्रशिक्षण, प्रमाणन और औपचारिक रोजगार प्राप्त करने के अवसर उपलब्ध कराए जाने चाहिए।
  • प्रशिक्षण नेटवर्क का विस्तार: के-4 केयर और आशा कार्यकर्ताओं पर आधारित प्रशिक्षण कार्यक्रमों का विस्तार किया जाना चाहिए। प्रशिक्षित देखभाल कर्मियों को अन्य व्यक्तियों को प्रशिक्षित करने में सक्षम बनाकर प्रशिक्षण की पहुँच बढ़ाई जा सकती है।
  • राष्ट्रीय देखभालकर्ता परिषद की स्थापना: नीति आयोग द्वारा प्रस्तावित राष्ट्रीय देखभालकर्ता परिषद के माध्यम से भारत में निम्नलिखित कार्य किए जा सकते हैं:
    • प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों का मानकीकरण।
    • देखभाल की गुणवत्ता के मानदंड निर्धारित करना।
    • देखभाल कर्मियों के प्रमाणन की निगरानी करना।
    • राष्ट्रीय देखभालकर्ता पोर्टल विकसित करना।
  • लैंगिक समानता को बढ़ावा देना: पारिवारिक प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से पुरुषों की देखभाल संबंधी गतिविधियों में भागीदारी को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, ताकि देखभाल का दायित्व अधिक समान रूप से साझा हो सके।
  • विशिष्ट देखभाल सेवाओं का समावेश: राष्ट्रीय प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों में वृद्धावस्था संबंधी मानसिक स्वास्थ्य, मनोभ्रंश की देखभाल, आपातकालीन सहायता तथा व्यवहार प्रबंधन को शामिल किया जाना चाहिए। इससे जटिल स्वास्थ्य आवश्यकताओं वाले वृद्धजनों को बेहतर देखभाल उपलब्ध कराई जा सकेगी।

स्रोत: TH

 

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