पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- सरकार द्वारा साझा किए गए आँकड़ों के अनुसार, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSBs) द्वारा राइट-ऑफ कुल खराब ऋण की राशि प्रत्येक वर्ष घट रही है, जबकि इन ऋणों से ऋण-प्राप्ति में निरंतर वृद्धि हो रही है।
राइट-ऑफ ऋण (Write-off loan) की प्रमुख प्रवृत्तियाँ
- राइट-ऑफ ऋणों में कमी: सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा राइट-ऑफ खराब ऋण वर्ष 2021-22 में ₹1.15 लाख करोड़ से घटकर वर्ष 2025-26 में ₹70,528 करोड़ रह गए, जो लगभग 40% की कमी है।
- वर्ष 2022-23 में राइट-ऑफ ऋण लगभग ₹1.30 लाख करोड़ के उच्चतम स्तर पर पहुँच गए थे। इसका एक कारण कोविड-19 के बाद उत्पन्न वित्तीय दबाव भी था।
- ऋण-प्राप्ति में सुधार: राइट-ऑफ ऋणों से प्राप्त राशि वर्ष 2021-22 में ₹24,739 करोड़ से बढ़कर वर्ष 2025-26 में ₹42,889 करोड़ हो गई।
- परिणामस्वरूप, इसी अवधि में ऋण-प्राप्ति और राइट-ऑफ ऋण का अनुपात 21.4% से बढ़कर 60.8% हो गया।
- PSBs द्वारा राइट-ऑफ ऋणों में भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की हिस्सेदारी सबसे अधिक रही। इसके राइट-ऑफ ऋण वर्ष 2022-23 में ₹24,061 करोड़ से घटकर वर्ष 2025-26 में ₹17,803 करोड़ रह गए।

राइट-ऑफ ऋण
- राइट-ऑफ ऋण (Loan Write-off) एक लेखांकन प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत बैंक आवश्यक प्रावधान करने के बाद किसी खराब ऋण को अपनी पुस्तकों से हटा देता है।
- यह केवल एक लेखांकन प्रक्रिया है और इससे ऋणी को कोई राहत नहीं मिलती। ऋण को बट्टे खाते में डालने के बाद भी बैंक ऋण-प्राप्ति की कार्रवाई जारी रख सकते हैं।
ऋण-प्राप्ति में सुधार के कारण
- दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC), 2016: IBC कंपनियों की दिवाला प्रक्रिया के समाधान तथा तनावग्रस्त ऋणग्रस्त उधारकर्ताओं से बकाया राशि की प्राप्ति के लिए समयबद्ध व्यवस्था प्रदान करती है।
- इसने बैंकों को ऋणदाताओं की समिति (CoC) के माध्यम से समाधान प्रक्रिया पर नियंत्रण रखने की शक्ति प्रदान की है।
- ऋण वसूली अधिकरण (DRTs): DRTs बैंकों और वित्तीय संस्थानों के बकाया ऋणों की प्राप्ति के लिए एक विशेष न्यायिक व्यवस्था प्रदान करते हैं।
- इन अधिकरणों को ऋणों की वसूली और दिवाला अधिनियम, 1993 के अंतर्गत कानूनी आधार प्रदान किया गया है।
- तनावग्रस्त परिसंपत्तियों की बेहतर पहचान एवं समाधान: वर्ष 2015 में RBI द्वारा किए गए परिसंपत्ति गुणवत्ता समीक्षा (AQR) के बाद बैंकों ने तनावग्रस्त परिसंपत्तियों तथा गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPAs) की व्यवस्थित पहचान और समाधान की दिशा में बेहतर क्षमता विकसित की है।
- बैंकिंग प्रावधान: बैंकों को तनावग्रस्त ऋणों से उत्पन्न संभावित नुकसान के लिए आवश्यक प्रावधान करना पड़ता है।
- बैंकों ने अपेक्षित हानि के एक बड़े हिस्से के लिए पहले ही पर्याप्त प्रावधान कर लिया है। इसलिए ऋण का समाधान या उसे बट्टे खाते में डालना बैंकों की बैलेंस शीट पर अपेक्षाकृत कम प्रतिकूल प्रभाव डालता है।
चिंताएँ
- ऋण-प्राप्ति अभी भी पूर्ण नहीं है: 60.8% का ऋण-प्राप्ति एवं राइट-ऑफ ऋण का अनुपात यह नहीं दर्शाता कि अब तक राइट-ऑफ सभी ऋणों में से 60.8% की राशि प्राप्त कर ली गई है।
- व्यक्तियों, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) तथा किसानों के मामलों में राइट-ऑफ ऋणों की बढ़ती हिस्सेदारी को देखते हुए वास्तविक वित्तीय कठिनाई और जानबूझकर ऋण न चुकाने (Wilful Default) के बीच अंतर करने के लिए सावधानीपूर्वक निगरानी आवश्यक है।
- यदि बड़े पैमाने पर ऋण राइट-ऑफ को बड़े ऋण-चूककर्ताओं के लिए लाभकारी माना जाता है, तो इससे बैंकिंग संस्थानों के प्रति जनविश्वास कमजोर हो सकता है।
- न्यायिक एवं दिवाला संबंधी प्रक्रियाओं में देरी होने से वसूली योग्य परिसंपत्तियों का मूल्य कम हो जाता है।
- यदि उभरते वित्तीय दबाव की उचित निगरानी नहीं की जाती है, तो ऋणों के बार-बार पुनर्गठन अथवा एवरग्रीनिंग के माध्यम से वास्तविक स्थिति छिपी रह सकती है।
आगे की राह
- ऋण-प्राप्ति संस्थानों का सुदृढ़ीकरण: IBC, DRTs तथा अन्य ऋण-प्राप्ति तंत्रों की क्षमता एवं दक्षता में सुधार करने की आवश्यकता है।
- ऋण मूल्यांकन में सुधार: तनावग्रस्त ऋणग्राहियों की समय रहते पहचान करने के लिए बेहतर डेटा विश्लेषण तथा प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों का उपयोग किया जाना चाहिए।
- ऋण-प्राप्ति और पुनर्वास के बीच संतुलन: व्यवहार्य MSMEs तथा अस्थायी वित्तीय कठिनाइयों का सामना कर रहे छोटे ऋणग्राहियों के लिए तत्काल परिसमापन के बजाय उपयुक्त ऋण पुनर्गठन की व्यवस्था की जानी चाहिए।
स्रोत: TH
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संक्षिप्त समाचार 13-08-2026