भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा रेपो दर 5.25 प्रतिशत पर स्थिर 

पाठ्यक्रम: GS3/ अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • भारतीय रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने रेपो दर को 5.25% पर अपरिवर्तित रखने का निर्णय लिया।

परिचय 

  • स्थायी जमा सुविधा (SDF) दर 5 प्रतिशत पर यथावत है।
  • सीमांत स्थायी सुविधा (MSF) दर और बैंक दर 5.5 प्रतिशत पर बनी हुई है।
  • वर्ष 2026-27 के लिए वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) वृद्धि दर 6.9% अनुमानित है, जिसमें प्रथम तिमाही 6.8%, द्वितीय तिमाही 6.7%, तृतीय तिमाही 7.0% और चतुर्थ तिमाही 7.2% रहने का अनुमान है।
  • वित्त वर्ष 2026-27 के लिए मुद्रास्फीति का अनुमान 4.6% है, जिसमें प्रथम तिमाही 4.0%, द्वितीय तिमाही 4.4%, तृतीय तिमाही 5.2% और चतुर्थ तिमाही 4.7% रहने का अनुमान है।

रेपो दर क्या है?

  • रेपो दर वह दर है जिस पर भारतीय रिज़र्व बैंक वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक ऋण प्रदान करता है। यह RBI का प्रमुख नीतिगत उपकरण है, जिसका उपयोग तरलता, मुद्रास्फीति और आर्थिक वृद्धि को नियंत्रित करने हेतु किया जाता है।
  • कम रेपो दर का अर्थ है कि बैंक RBI से सस्ते दर पर ऋण ले सकते हैं।
  • इससे बैंकों को ऋण दरें घटाने के लिए प्रोत्साहन मिलता है।
  • उपभोक्ताओं और व्यवसायों के लिए ऋण तक आसान पहुँच होती है।
  • निवेश, उपभोग और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है।
  • तरलता और मुद्रा आपूर्ति में वृद्धि होती है।
  • यह विशेषकर आर्थिक मंदी के समय वृद्धि को प्रोत्साहित कर सकता है।

मौद्रिक नीति समिति (MPC) क्या है?

  • MPC एक वैधानिक निकाय है, जिसे RBI अधिनियम, 1934 (2016 में संशोधित) के अंतर्गत स्थापित किया गया है।
  • इसका कार्य मूल्य स्थिरता बनाए रखते हुए वृद्धि को ध्यान में रखते हुए बेंचमार्क ब्याज दर (रेपो दर) तय करना है।
  • इसमें 6 सदस्य होते हैं:
    • 3 RBI से (जिसमें गवर्नर अध्यक्ष होते हैं),
    • 3 बाहरी सदस्य जिन्हें सरकार नियुक्त करती है।
  • कार्यप्रणाली: यह समिति कम से कम वर्ष में चार बार (सामान्यतः द्विमासिक) बैठक करती है। निर्णय बहुमत से लिए जाते हैं और प्रत्येक सदस्य का एक मत होता है। बराबरी की स्थिति में RBI गवर्नर का निर्णायक मत होता है।

लचीला मुद्रास्फीति लक्ष्य निर्धारण ढाँचा (FITF)

  • भारत ने 2016 में लचीला मुद्रास्फीति लक्ष्य निर्धारण ढाँचा अपनाया। इसके अंतर्गत सरकार, RBI से परामर्श कर प्रत्येक पाँच वर्ष में मुद्रास्फीति लक्ष्य तय करती है।
    • वर्तमान अधिदेश, जो 31 मार्च 2026 तक प्रभावी है, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) मुद्रास्फीति का लक्ष्य 4% निर्धारित करता है, जिसमें ±2% की सहनशीलता सीमा है, अर्थात 2% से 6% के बीच।

भारत में मौद्रिक नीति उपकरण

RBI द्वारा मुद्रा आपूर्ति को नियंत्रित करने हेतु प्रयुक्त उपकरण दो श्रेणियों में बाँटे जाते हैं:

  • मात्रात्मक उपकरण – ऋण की लागत और मात्रा को नियंत्रित करने हेतु।
  • गुणात्मक उपकरण – ऋण के उपयोग और दिशा को नियंत्रित करने हेतु।
  • मात्रात्मक उपकरण
    • रेपो दर
    • रिवर्स रेपो दर
    • नकद आरक्षित अनुपात (CRR)
    • वैधानिक तरलता अनुपात (SLR)
    • खुला बाज़ार परिचालन (OMO)
    • सीमांत स्थायी सुविधा (MSF)
    • तरलता समायोजन सुविधा (LAF)
    • बाज़ार स्थिरीकरण योजना (MSS)
  • गुणात्मक उपकरण
    • मार्जिन आवश्यकता
    • उपभोक्ता ऋण विनियमन
    • ऋण का राशनिंग
    • नैतिक आग्रह
    • प्रत्यक्ष कार्रवाई

हालिया नीति निर्णय के पीछे कारण

  • भूराजनीतिक अनिश्चितता: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता को बढ़ाया है।
  • आपूर्ति-पक्षीय आघात: ऊर्जा और वस्तु बाज़ारों में व्यवधान से भारतीय अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई है।
  • लक्ष्य सीमा में मुद्रास्फीति: खुदरा मुद्रास्फीति 2–6% लक्ष्य सीमा में है और कोर मुद्रास्फीति नियंत्रित है।
  • व्यापार समझौतों का प्रभाव: भारत ने हाल ही में अमेरिका, यूरोपीय संघ, ओमान और न्यूज़ीलैंड के साथ व्यापार समझौते किए हैं, जिनसे निर्यात एवं निवेश को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

  • उधारकर्ताओं और परिवारों पर प्रभाव: स्थिर ब्याज दरें मध्यमवर्गीय परिवारों और गृह ऋण लेने वालों के लिए वित्तीय अनिश्चितता कम करती हैं।
  • निवेश और ऋण वृद्धि पर प्रभाव: स्थिर दरें, सुदृढ़ मांग और व्यापार समझौते निजी निवेश के लिए अनुकूल वातावरण बनाते हैं।
  • सामान्य आर्थिक स्थिरता: यह निर्णय भारत के लचीले मुद्रास्फीति लक्ष्य निर्धारण ढाँचे की विश्वसनीयता को सुदृढ़ करता है।

आगे की राह

  • बाह्य क्षेत्रीय स्थिरता की रक्षा: सक्रिय तरलता प्रबंधन, विवेकपूर्ण विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग और वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों की निगरानी आवश्यक है।
  • राजकोषीय-मौद्रिक समन्वय को सुदृढ़ करना: सतत राजकोषीय समेकन और लक्षित सार्वजनिक व्यय मौद्रिक नीति को पूरक करेंगे तथा दीर्घकालिक वृद्धि को बनाए रखेंगे, बिना मुद्रास्फीति दबाव उत्पन्न किए।

Source: TH

 

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