पाठ्यक्रम: GS3/कृषि
संदर्भ
- प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना ने सतत जल प्रबंधन तथा सिंचाई कवरेज के विस्तार के माध्यम से सिंचाई-आधारित कृषि परिवर्तन को प्रोत्साहन देते हुए अपने 10 वर्ष से अधिक सफलतापूर्वक पूर्ण कर लिए हैं।
प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) के बारे में
- प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) वर्ष 2015 में “हर खेत को पानी” तथा “प्रति बूंद अधिक फसल “ के दृष्टिकोण के साथ प्रारंभ की गई एक प्रमुख सिंचाई योजना है।
- इसका उद्देश्य जल स्रोतों के सृजन से लेकर खेत स्तर पर जल के कुशल उपयोग तक जल संसाधनों का समेकित विकास एवं प्रभावी प्रबंधन सुनिश्चित करना है।
- यह योजना अभिसरण दृष्टिकोण पर आधारित है, जिसके अंतर्गत जल शक्ति मंत्रालय, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय तथा ग्रामीण विकास मंत्रालय संयुक्त रूप से कार्य करते हैं।

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) के प्रमुख घटक
- त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम (AIBP): इसका उद्देश्य प्रमुख एवं मध्यम सिंचाई परियोजनाओं को समयबद्ध रूप से पूर्ण करना है।
- यह सिंचाई अवसंरचना के विकास तथा जल की उपलब्धता में सुधार सुनिश्चित करता है।
- वर्ष 2016-17 से अब तक इस कार्यक्रम के अंतर्गत 21,023 करोड़ रुपये से अधिक की केंद्रीय सहायता प्रदान की जा चुकी है।
- इससे लगभग 1.73 करोड़ किसानों को लाभ प्राप्त हुआ है।
- हाल ही में स्वीकृत कमांड क्षेत्र विकास एवं जल प्रबंधन का आधुनिकीकरण (M-CADWM) का उद्देश्य दाबयुक्त पाइप नेटवर्क तथा सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों के माध्यम से खेतों तक जल पहुँचाना है।
- हर खेत को पानी (HKKP): इसका उद्देश्य लघु सिंचाई परियोजनाओं एवं भू-जल विकास के माध्यम से सुनिश्चित सिंचाई का विस्तार करना है।
- यह पारंपरिक जलाशयों के मरम्मत, नवीनीकरण एवं पुनर्स्थापन (RRR) को भी प्रोत्साहित करता है।
- अब तक 3,462 से अधिक सतही लघु सिंचाई एवं RRR योजनाओं का क्रियान्वयन किया जा चुका है।
- जलागम विकास घटक : यह वर्षा-आधारित एवं अवनत क्षेत्रों में समेकित जलागम प्रबंधन को प्रोत्साहन देता है।
- इसके माध्यम से मृदा में आर्द्रता संरक्षण, भू-जल पुनर्भरण तथा जलवायु अनुकूलन क्षमता को सुदृढ़ किया जाता है।
- प्रति बूंद अधिक फसल (PDMC): इसका उद्देश्य ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को प्रोत्साहन देना है।
- वर्ष 2022-23 से इस घटक को प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (PM-RKVY) में समाहित कर दिया गया है।
- इसके अंतर्गत वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है—
- लघु एवं सीमांत किसानों को 55% अनुदान।
- अन्य किसानों को 45% अनुदान।
भारत की सिंचाई अवसंरचना से संबंधित प्रमुख समस्याएँ
- मानसून पर अत्यधिक निर्भरता भारत के शुद्ध बोए गए क्षेत्र का लगभग आधा भाग वर्षा-आधारित कृषि पर निर्भर है, जिससे कृषि अत्यधिक मानसून-निर्भर बनी रहती है।
- जल का अकुशल उपयोग: भारतीय कृषि में बाढ़ सिंचाई का व्यापक उपयोग होता है, जिसके कारण वाष्पीकरण, बहाव तथा रिसाव से जल की पर्याप्त हानि होती है।
- क्षेत्रीय असमानताएँ: पंजाब एवं हरियाणा जैसे राज्यों में सिंचाई कवरेज अपेक्षाकृत अधिक है, जबकि पूर्वी एवं मध्य भारत के अनेक क्षेत्र अब भी सिंचाई सुविधाओं से वंचित हैं।
- भू-जल का क्षरण: अनियोजित एवं अत्यधिक दोहन के कारण अनेक क्षेत्रों में भू-जल स्तर लगातार नीचे जा रहा है।
- अपूर्ण सिंचाई परियोजनाएँ: वित्तीय संसाधनों की कमी एवं प्रशासनिक विलंब के कारण अनेक प्रमुख एवं मध्यम सिंचाई परियोजनाएँ दशकों से अधूरी पड़ी हैं।
- जलवायु परिवर्तन: सूखे की बढ़ती आवृत्ति, अनियमित वर्षा तथा चरम मौसमीय घटनाएँ कृषि की स्थिरता एवं उत्पादकता के लिए गंभीर चुनौती बन रही हैं।
PMKSY किस प्रकार समाधान प्रस्तुत करती है?
- समेकित जल संसाधन प्रबंधन: PMKSY जल स्रोतों के सृजन से लेकर खेत स्तर पर जल के कुशल उपयोग तक संपूर्ण सिंचाई मूल्य श्रृंखला का समग्र प्रबंधन सुनिश्चित करती है।
- सूक्ष्म सिंचाई को प्रोत्साहन: ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणालियाँ जल की न्यूनतम हानि सुनिश्चित करती हैं तथा सिंचाई दक्षता में उल्लेखनीय वृद्धि करती हैं।
- सुनिश्चित सिंचाई का विस्तार: AIBP तथा HKKP के माध्यम से सिंचाई सुविधाओं से वंचित क्षेत्रों में सिंचाई अवसंरचना का विस्तार किया जा रहा है।
- जलागम आधारित विकास: वर्षा जल संचयन, भू-जल पुनर्भरण तथा मृदा संरक्षण जैसे उपाय वर्षा-आधारित क्षेत्रों की जलवायु अनुकूलन क्षमता को सुदृढ़ बनाते हैं।
- अभिसरण एवं विकेंद्रीकृत योजना निर्माण: यह योजना विभिन्न मंत्रालयों एवं राज्यों के मध्य बेहतर समन्वय एवं संसाधनों के प्रभावी उपयोग को प्रोत्साहित करती है।
- जलवायु अनुकूल कृषि: जल संसाधनों के कुशल एवं वैज्ञानिक प्रबंधन के माध्यम से किसान जलवायु परिवर्तन, सूखा एवं अन्य प्रतिकूल परिस्थितियों के प्रभावों के प्रति अधिक सक्षम एवं अनुकूल बनते हैं।
विगत 10 वर्षों में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) की प्रमुख उपलब्धियाँ
- सिंचाई कवरेज का विस्तार: प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) को वर्ष 2021-26 की अवधि तक 93,068.56 करोड़ रुपये के कुल परिव्यय के साथ जारी रखा गया है।
- अगस्त 2025 तक इस योजना से 2.7 करोड़ (27 मिलियन) से अधिक किसानों को लाभ प्राप्त हो चुका है।
- विभिन्न हस्तक्षेपों के माध्यम से 2.461 करोड़ हेक्टेयर (24.61 मिलियन हेक्टेयर) से अधिक क्षेत्र को सिंचाई सुविधाओं के अंतर्गत लाया गया अथवा विकसित किया गया है।
- सिंचाई क्षमता में वृद्धि: हर खेत को पानी (HKKP) घटक के अंतर्गत किए गए हस्तक्षेपों से लगभग 5.93 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त सिंचाई क्षमता का सृजन किया गया है।
- भू-जल विकास संबंधी हस्तक्षेपों के माध्यम से लगभग 88.55 हजार हेक्टेयर अतिरिक्त सिंचाई क्षमता जोड़ी गई है।
- सूक्ष्म सिंचाई को प्रोत्साहन: लगभग 110.92 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को सूक्ष्म सिंचाई के अंतर्गत लाया गया है।
- इस योजना के माध्यम से प्रतिवर्ष लगभग 9.3 लाख किसानों को सहायता प्रदान की जाती है।
- जल उपयोग दक्षता में वृद्धि: स्प्रिंकलर एवं ड्रिप सिंचाई प्रणालियों के उपयोग से जल, उर्वरक, विद्युत तथा श्रम की खपत में उल्लेखनीय कमी आई है।
- इससे सिंचाई दक्षता में वृद्धि के साथ-साथ कृषि उत्पादन की लागत में भी कमी आई है।
- किसानों की आय में वृद्धि: उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के किसानों के अनुभवों से ज्ञात होता है कि—
- फसल उत्पादकता में 25–30% तक वृद्धि हुई है।
- जल एवं अन्य कृषि निवेशों के उपयोग में लगभग 50% की कमी आई है।
- किसानों को प्रति हेक्टेयर लगभग 60,000 से 70,000 रुपये तक का लाभ प्राप्त हो रहा है।
- प्राकृतिक संसाधनों का सतत प्रबंधन: जलागम आधारित हस्तक्षेपों के माध्यम से मृदा स्वास्थ्य, भू-जल पुनर्भरण तथा पारिस्थितिकीय सततता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।
- इन प्रयासों ने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के साथ-साथ कृषि की दीर्घकालिक स्थिरता एवं जलवायु अनुकूलन क्षमता को भी सुदृढ़ किया है।


आगे की राह
- सूक्ष्म सिंचाई का सार्वभौमिक विस्तार: वर्तमान में भारत के शुद्ध बोए गए क्षेत्र का केवल एक छोटा भाग ही सूक्ष्म सिंचाई के अंतर्गत आता है।
- जल उपयोग दक्षता बढ़ाने तथा कृषि की उत्पादकता में सुधार के लिए सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को व्यापक स्तर पर अपनाने की आवश्यकता है।
- सहभागी सिंचाई प्रबंधन का सुदृढ़ीकरण: जल के समुचित वितरण, कुशल प्रबंधन तथा सिंचाई अवसंरचना के प्रभावी रखरखाव के लिए जल उपयोगकर्ता संघों को अधिक सशक्त एवं सक्षम बनाया जाना आवश्यक है।
- अपूर्ण सिंचाई परियोजनाओं को समयबद्ध रूप से पूर्ण करना: लंबित सिंचाई परियोजनाओं का समयबद्ध क्रियान्वयन एवं नियमित निगरानी सुनिश्चित की जानी चाहिए, जिससे सिंचाई क्षमता का शीघ्र विस्तार हो सके।
- फसल विविधीकरण को प्रोत्साहन: जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में अधिक जल-गहन फसलों के स्थान पर कम जल की आवश्यकता वाली फसलों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, ताकि जल संसाधनों का सतत एवं विवेकपूर्ण उपयोग सुनिश्चित हो सके।
- प्रौद्योगिकी के उपयोग का विस्तार: रिमोट सेंसिंग , भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS), कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित सिंचाई परामर्श, तथा इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) समर्थित परिशुद्ध कृषि जैसी उन्नत प्रौद्योगिकियों का व्यापक उपयोग सिंचाई प्रबंधन को अधिक प्रभावी एवं दक्ष बना सकता है।
- भू-जल शासन में सुधार: दीर्घकालिक जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए वैज्ञानिक भू-जल बजट तथा जलभृतों के वैज्ञानिक प्रबंधन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
- विभिन्न योजनाओं के मध्य अधिक अभिसरण : प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) का महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (MGNREGS), प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (PM-RKVY) तथा अटल भूजल योजना जैसी योजनाओं के साथ प्रभावी अभिसरण सुनिश्चित किया जाना चाहिए, ताकि संसाधनों का अधिकतम एवं समन्वित उपयोग हो सके।
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