भारत का आगामी दशक में 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता जोड़ने का लक्ष्य

पाठ्यक्रम: GS3/ऊर्जा और बुनियादी ढांचा

संदर्भ

  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की कि भारत का लक्ष्य आगामी 10–11 वर्षों में 500 गीगावाट की नई गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित विद्युत उत्पादन क्षमता जोड़ना है।

नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की प्रगति

  • भारत ने लगभग 308 गीगावाट की स्थापित गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता प्राप्त कर ली है, जो देश की कुल 558.89 गीगावाट स्थापित विद्युत क्षमता का लगभग 55.1% है।
  • IRENA के नवीकरणीय ऊर्जा सांख्यिकी 2026 के अनुसार, वैश्विक स्तर पर भारत सौर ऊर्जा की स्थापित क्षमता में तीसरे, पवन ऊर्जा क्षमता में चौथे और कुल नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में तीसरे स्थान पर है।
  • भारत ने वर्ष 2025 में गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से 50% स्थापित विद्युत क्षमता प्राप्त करने का पेरिस समझौते के अंतर्गत निर्धारित लक्ष्य, वर्ष 2030 की समय-सीमा से पाँच वर्ष पहले ही हासिल कर लिया।
  • देश का लक्ष्य वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट की गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित स्थापित ऊर्जा क्षमता प्राप्त करना है।

राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) क्या हैं?

  • राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) पेरिस समझौते के अंतर्गत देशों द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली देश-विशिष्ट जलवायु कार्ययोजनाएँ हैं।
    • इनमें ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने और जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन से संबंधित लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं।
    • महत्त्वाकांक्षा के स्तर को बढ़ाने के लिए NDCs की समय-समय पर समीक्षा एवं संशोधन किया जाता है।
  • भारत का NDC समान लेकिन विभेदित उत्तरदायित्वों और संबंधित क्षमताओं (CBDR-RC) के सिद्धांत पर आधारित है। यह दृष्टिकोण समानता और जलवायु न्याय पर बल देता है।

NDC 3.0 (2031–2035) के अंतर्गत लक्ष्य

  • उत्सर्जन तीव्रता में कमी: भारत ने वर्ष 2005 के स्तर की तुलना में वर्ष 2035 तक अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की उत्सर्जन तीव्रता (GDP की प्रति इकाई पर CO₂ उत्सर्जन) में 47% की कमी लाने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है।
  • गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित क्षमता का विस्तार: भारत ने वर्ष 2035 तक अपनी कुल स्थापित विद्युत उत्पादन क्षमता का 60% गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से प्राप्त करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है।
  • कार्बन सिंक का निर्माण: भारत ने वर्ष 2035 तक वन एवं वृक्ष आवरण के माध्यम से 3.5 से 4 अरब टन CO₂ समतुल्य कार्बन सिंक का निर्माण करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है।

नवीकरणीय ऊर्जा की ओर संक्रमण का महत्त्व

  • ऊर्जा सुरक्षा: इससे आयातित जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता और विशेष रूप से पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक व्यवधानों के प्रति संवेदनशीलता कम होती है।
  • जलवायु संबंधी प्रतिबद्धताएँ: यह पेरिस समझौते के अंतर्गत भारत के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) और वर्ष 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन प्राप्त करने के दीर्घकालिक लक्ष्य को समर्थन प्रदान करता है।
  •  निवेश एवं रोजगार: विगत दशक में नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में 164 अरब डॉलर से अधिक का निवेश आकर्षित हुआ है।
    • वर्ष 2030 तक लगभग 220 अरब डॉलर (₹20 लाख करोड़) के निवेश अवसर उपलब्ध होने की अपेक्षा है।
  • तकनीकी विकास: यह सौर सेल, बैटरी, हरित हाइड्रोजन और ऊर्जा भंडारण के क्षेत्र में घरेलू विनिर्माण, नवाचार तथा तकनीकी क्षमताओं को बढ़ावा देता है।

नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन में बाधाएँ

  • कम क्षमता उपयोग कारक (CUF): स्वच्छ ऊर्जा स्रोत रुक-रुककर उपलब्ध होते हैं और मौसम पर निर्भर रहते हैं। इसलिए, उच्च स्थापित क्षमता होने के बावजूद इनका वास्तविक ऊर्जा उत्पादन अपेक्षाकृत कम होता है।
    • उदाहरण:
      • सौर ऊर्जा CUF: लगभग 20%
      • पवन ऊर्जा CUF: लगभग 25–30%
      • कोयला आधारित ऊर्जा CUF: लगभग 60%
      • परमाणु ऊर्जा CUF: लगभग 80%
  • आधारभूत विद्युत माँग के लिए कोयले पर निर्भरता: भारत की 75% से अधिक विद्युत माँग की पूर्ति अब भी कोयले से होती है, विशेषकर रात के समय, जब सौर ऊर्जा उपलब्ध नहीं होती।
    • भारत का विद्युत ग्रिड चौबीसों घंटे (RTC) विद्युत की आपूर्ति के लिए अब भी तापीय ऊर्जा स्रोतों पर अत्यंत सीमा तक निर्भर है।
  • भंडारण एवं पारेषण संबंधी सीमाएँ: बड़े स्तर पर ग्रिड से जुड़ी बैटरी भंडारण प्रणालियों की कमी के कारण दिन के समय उत्पादित अतिरिक्त सौर ऊर्जा का भंडारण संभव नहीं हो पाता।
    • पारेषण संबंधी नियोजन नवीकरणीय ऊर्जा (RE) की स्थापना की गति के अनुरूप नहीं है।
  • भूमि अधिग्रहण: भूमि की उपलब्धता और पर्यावरण संबंधी चिंताओं के कारण नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं में विलंब हो सकता है।

स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देने हेतु सरकारी पहलें

  • हरित ऊर्जा गलियारा (GEC): इसका उद्देश्य उत्पादन केंद्रों से माँग केंद्रों तक नवीकरणीय ऊर्जा के कुशल पारेषण के लिए पारेषण अवसंरचना को सुदृढ़ करना है।
  • पीएम-कुसुम योजना: यह ग्रामीण क्षेत्रों में सौर पंपों और ग्रिड से जुड़े सौर ऊर्जा संयंत्रों की स्थापना को बढ़ावा देती है, जिससे डीजल की खपत कम करने और किसानों को सहायता प्रदान करने में सहायता मिलती है।
  • राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन: इसका उद्देश्य शोधन, इस्पात और उर्वरक जैसे क्षेत्रों में जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने के लिए हरित हाइड्रोजन के उत्पादन एवं उपयोग को बढ़ावा देना है।
  • उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन (PLI) योजना: इसके अंतर्गत उच्च दक्षता वाले सौर फोटोवोल्टिक (PV) मॉड्यूल और उन्नत बैटरी भंडारण प्रणालियों के घरेलू विनिर्माण को वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान किया जाता है।
  • नवीकरणीय ऊर्जा हाइब्रिड नीति: यह एक ही स्थान पर सौर और पवन ऊर्जा को संयोजित करने वाली परियोजनाओं की स्थापना को प्रोत्साहित करती है, जिससे क्षमता उपयोग और विश्वसनीयता में वृद्धि होती है।
  • राष्ट्रीय सौर मिशन (NSM): इसे वर्ष 2010 में शुरू किया गया था। इसके अंतर्गत ग्रिड से जुड़े और ग्रिड से स्वतंत्र सौर ऊर्जा परियोजनाओं सहित सौर ऊर्जा क्षमता की स्थापना के लिए महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं।
  • नवीकरणीय ऊर्जा क्रय दायित्व (RPO): इसके अंतर्गत विद्युत वितरण कंपनियों और बड़े विद्युत उपभोक्ताओं के लिए अपनी विद्युत आवश्यकता का एक निश्चित प्रतिशत नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से प्राप्त करना अनिवार्य है। इससे नवीकरणीय ऊर्जा की माँग को प्रोत्साहन मिलता है।

आगे की राह

  • बैटरी एवं ऊर्जा भंडारण अवसंरचना: व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण (VGF) या उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन (PLI) के माध्यम से बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों (BESS) की स्थापना में तीव्रता लाई जानी चाहिए।
    • बैटरी भंडारण प्रणालियों के साथ सौर-पवन-जलविद्युत को संयोजित करने वाली हाइब्रिड परियोजनाओं को प्राथमिकता के आधार पर शीघ्र पूरा किया जाना चाहिए।
  • विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा: आधारभूत विद्युत आपूर्ति पर दबाव कम करने के लिए छतों पर सौर संयंत्रों, सौर पंपों और लघु विद्युत ग्रिडों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
    • उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन (PLI) योजना जैसी पहलों के अंतर्गत घरेलू विनिर्माण का विस्तार किया जाना चाहिए।
  •  ग्रिड का आधुनिकीकरण एवं स्मार्ट प्रबंधन: माँग और आपूर्ति के बीच वास्तविक समय में संतुलन बनाए रखने के लिए स्मार्ट ग्रिड में निवेश किया जाना चाहिए।
    • विशेष रूप से दिन के समय सौर ऊर्जा के उपयोग को प्रोत्साहित करने के लिए समय-आधारित विद्युत मूल्य निर्धारण प्रणाली लागू की जानी चाहिए।
  • रणनीतिक स्तंभ के रूप में परमाणु ऊर्जा: स्थिर एवं कम कार्बन उत्सर्जन वाली आधारभूत विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए परमाणु ऊर्जा क्षमता का चरणबद्ध और वित्तीय रूप से टिकाऊ तरीके से विस्तार किया जाना चाहिए।

स्रोत: IE

 

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