पाठ्यक्रम: GS2/ स्वास्थ्य
संदर्भ
- भारत में रक्ताल्पता का भार अत्यधिक है, जिसके कारण लौह तत्त्व और आयोडीन युक्त दोहरे पोषक तत्त्वों से समृद्ध नमक (DFS) की शुरुआत का प्रस्ताव किया गया है। हालाँकि, इसकी प्रभावशीलता, सुरक्षा और नमक की खपत कम करने के लक्ष्यों के साथ इसकी अनुकूलता को लेकर चिंताएँ बनी हुई हैं।
दोहरे पोषक तत्त्वों से समृद्ध नमक (DFS)
- DFS खाद्य नमक है, जिसे लौह तत्त्व (हीमोग्लोबिन के निर्माण के लिए) और आयोडीन (थायरॉइड ग्रंथि के कार्य के लिए) से समृद्ध किया जाता है।
- लगभग प्रत्येक परिवार नमक का उपयोग करता है। इसलिए, खान-पान की आदतों में परिवर्तन किए बिना इसके माध्यम से बड़ी जनसंख्या तक पोषक तत्त्व पहुँचाए जा सकते हैं।
सार्वभौमिक रूप से DFS लागू करने से जुड़ी चिंताएँ
- नमक की खपत कम करने के लक्ष्य से टकराव: WHO प्रतिदिन 5 ग्राम से कम नमक के सेवन का परामर्श देता है, जबकि भारत में उच्च रक्तचाप और गैर-संचारी रोगों (NCDs) के मामले बढ़ रहे हैं। DFS से लौह तत्त्व की प्राप्ति नमक के सेवन पर निर्भर करती है। अतः सोडियम का सेवन कम करने से लौह तत्त्व का सेवन भी घट जाता है।
- असमान वितरण: वयस्क पुरुष, महिलाओं और बच्चों की तुलना में अधिक नमक का सेवन करते हैं। परिणामस्वरूप, लौह तत्त्व उन संवेदनशील समूहों तक सबसे कम पहुँचता है जिन्हें इसकी अधिक आवश्यकता है, जबकि रक्ताल्पता के कम जोखिम वाले समूहों को इसकी अधिक मात्रा प्राप्त होती है।
- लौह तत्त्व की अधिकता का जोखिम: शरीर अतिरिक्त लौह तत्त्व को आसानी से बाहर नहीं निकाल सकता, जिससे ऑक्सीडेटिव तनाव उत्पन्न हो सकता है। थैलेसीमिया से पीड़ित व्यक्तियों में लौह तत्त्व के अत्यधिक संचय का जोखिम रहता है। इसके अतिरिक्त, मलेरिया-प्रभावित और अपर्याप्त स्वच्छता वाले क्षेत्रों में लौह तत्त्व का सेवन अन्य चिंताएँ उत्पन्न करता है।
- संचयी सेवन: सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS), पीएम पोषण (PM POSHAN), एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS) और लौह-फोलिक अम्ल (IFA) अनुपूरण के माध्यम से पहले से ही लौह तत्त्व उपलब्ध कराया जा रहा है। DFS को इसमें जोड़ने से बच्चों और किशोरों में लौह तत्त्व का सेवन आवश्यकता से अधिक हो सकता है।
- अपर्याप्त अवशोषण: DFS में गैर-हीम लौह तत्त्व होता है, जिसका अवशोषण फाइटेट्स (अनाज, मोटे अनाज और दालों में पाए जाने वाले), चाय एवं कॉफी के पॉलीफेनॉल तथा कैल्शियम के कारण कम हो जाता है। संक्रमण और सूजन की स्थिति में हेप्सिडिन का स्तर बढ़ जाता है, जो लौह तत्त्व के अवशोषण को बाधित करता है। इसलिए, जहाँ रोगों का भार अधिक है, वहाँ DFS के लाभ सीमित हो जाते हैं।
रक्ताल्पता (Anaemia) क्या है?
- रक्ताल्पता एक ऐसी स्थिति है, जिसमें रक्त में हीमोग्लोबिन का स्तर सामान्य सीमा से कम हो जाता है, जिससे रक्त की ऑक्सीजन वहन करने की क्षमता घट जाती है। लौह तत्त्व की कमी रक्ताल्पता का एक प्रमुख कारण है, लेकिन यही इसका एकमात्र कारण नहीं है।
- WHO के अनुसार, प्रजनन आयु वर्ग की वे महिलाएँ, जिनके रक्त में हीमोग्लोबिन का स्तर 12 ग्राम प्रति डेसीलीटर (g/dL) से कम है, तथा 5 वर्ष से कम आयु के वे बच्चे, जिनमें हीमोग्लोबिन का स्तर 11.0 g/dL से कम है, रक्ताल्पता से पीड़ित माने जाते हैं।
- राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5), 2019–21 के अनुसार, 6–59 माह आयु वर्ग के 67.1% बच्चे और 15–49 वर्ष आयु वर्ग की 59.1% महिलाएँ रक्ताल्पता से पीड़ित थीं। (NFHS-6, 2023–24 में रक्ताल्पता संबंधी आँकड़ों को शामिल नहीं किया गया था।)
प्रभाव
- स्वास्थ्य संबंधी प्रभाव: थकान, कमजोरी तथा मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों में वृद्धि।
- संज्ञानात्मक प्रभाव: सीखने की क्षमता, स्मृति और बाल विकास पर प्रतिकूल प्रभाव।
- आर्थिक प्रभाव: कार्यक्षमता और श्रम उत्पादकता में कमी।
- सामाजिक प्रभाव: पीढ़ी-दर-पीढ़ी कुपोषण का संचरण तथा जीवन की गुणवत्ता में गिरावट।
- मानव विकास पर प्रभाव: जनसांख्यिकीय लाभांश तथा सतत विकास लक्ष्य (SDG) 2 (शून्य भुखमरी) और SDG 3 (अच्छा स्वास्थ्य एवं कल्याण) की प्राप्ति में बाधा।
भारत की रणनीति: एनीमिया मुक्त भारत (AMB)
- AMB छह लाभार्थी समूहों, छह हस्तक्षेपों और छह संस्थागत तंत्रों पर आधारित 6×6×6 रूपरेखा का अनुसरण करता है।
- इसके प्रमुख उपायों में लौह एवं फोलिक अम्ल (IFA) अनुपूरण, कृमिनाशन, व्यवहार परिवर्तन संचार, जाँच एवं उपचार तथा पोषण और स्वच्छता पर विशेष ध्यान देना शामिल है।

भारत की रक्ताल्पता नियंत्रण रणनीति के समक्ष चुनौतियाँ
- जठरांत्र संबंधी दुष्प्रभावों के कारण IFA अनुपूरकों का नियमित सेवन कम है।
- नैदानिक जाँच प्रायः हीमोग्लोबिन के स्तर तक ही सीमित रहती है तथा फेरिटिन, विटामिन B12 और सूजन संबंधी जाँचें सीमित रूप से की जाती हैं।
- अनेक परिवारों के लिए पौष्टिक एवं विविधतापूर्ण आहार अब भी वहनीय नहीं है।
- संचयी सेवन का पर्याप्त आकलन किए बिना अनेक कार्यक्रमों के माध्यम से लौह तत्त्व उपलब्ध कराया जा रहा है।
- निगरानी व्यवस्था में प्रायः स्वास्थ्य संबंधी परिणामों के बजाय वितरित गोलियों और की गई जाँचों की संख्या पर अधिक ध्यान दिया जाता है।
आगे की राह
- साक्ष्य-आधारित खाद्य सुदृढ़ीकरण: राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार करने से पहले निगरानी सहित जिला-स्तरीय प्रायोगिक परियोजनाएँ संचालित की जानी चाहिए। इनमें हीमोग्लोबिन, फेरिटिन और सूजन संबंधी संकेतकों की निगरानी की जानी चाहिए। लौह तत्त्व के संचयी सेवन का आकलन किया जाए तथा मलेरिया-प्रभावित और हीमोग्लोबिन संबंधी आनुवंशिक विकारों की अधिकता वाले क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जाए।
- लक्षित हस्तक्षेप: संवेदनशील समूहों और जाँच के माध्यम से पुष्टि की गई पोषक तत्त्वों की कमियों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। स्थानीय आहार के अनुकूल लौह यौगिकों का चयन किया जाए तथा अनावश्यक सेवन से बचा जाए।
- सुदृढ़ नैदानिक जाँच: फेरिटिन और विटामिन B12 की जाँच तक पहुँच का विस्तार किया जाए तथा अंतर्निहित कारणों के आधार पर उपचार संबंधी प्रोटोकॉल विकसित किए जाएँ।
- सामाजिक निर्धारक: खाद्य पदार्थों की वहनीयता और आहार की विविधता में सुधार किया जाए। साथ ही, स्वच्छता, कृमिनाशन और मलेरिया नियंत्रण को सुदृढ़ बनाया जाए। किशोरों में अल्पपोषण, बाल विवाह और मातृ स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का समाधान किया जाए।
- परिणाम-आधारित निगरानी: हीमोग्लोबिन और लौह तत्त्व की स्थिति में सुधार तथा प्रतिकूल प्रभावों का आकलन किया जाए। इसके लिए जिला स्तर पर जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए।
स्रोत: TH
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